रन देकर विकेट ख़रीदते थे प्रसन्ना

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Image caption मद्रास टेस्ट में वेस्ट इंडीज़ को हराने के बाद. (बाएं से) बिशन सिंह बेदी, प्रसन्ना, चंद्रशेखर और विश्वनाथ.

1975 का मद्रास टेस्ट. वेस्ट इंडीज़ की दूसरी पारी चल रही थी. क्लाइव लॉयड क्रीज़ पर थे. प्रसन्ना ने गेंद फ़्लाइट की और उसे थोड़ा रोक सा लिया.

लॉयड ने उछल कर उस पर लॉफ़्टेड शॉट मारना चाहा. वो इतना आगे आ गए कि प्रसन्ना उनसे हाथ मिला सकते थे. बाकी का काम फ़ारूख़ इंजीनियर ने किया.

क्लाइव लॉयड स्टंप इंजीनियर, बोल्ड प्रसन्ना.

सुनिएः क्यों था बल्लेबाजों में प्रसन्ना का ख़ौफ़

इसी तरह तीन साल पहले मद्रास में ही प्रसन्ना ने माइक डेनेस को आगे आने पर मजबूर किया. उन्होंने अपना शॉट पूरा किया. गेंद उसके बाद गिरी. वो हवा में बीट हुए.

गेंद बैट पैड लेती हुई फ़ार्वर्ड शॉर्ट लेग पर खड़े एकनाथ सोल्कर के हाथों में चिपक गई. प्रसन्ना के ‘डिप’ ने उनका कबाड़ा किया, जबकि माइक उस समय दुनिया में स्पिन के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में से एक थे.

पढ़िए विवेचना विस्तार से

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प्रसन्ना ने अपना पहला टेस्ट 1961 मे इंग्लैंड के ख़िलाफ़ खेला था. उसके बाद वो 1962 में वेस्ट इंडीज़ गए थे.

लेकिन इसके बाद उन्होंने चार साल तक क्रिकेट नहीं खेली क्योंकि उन्होंने अपने पिता से वादा किया था कि वो तब तक क्रिकेट नहीं खेलेंगे, जब तक वो अपनी इंजीनयरिंग की डिग्री नहीं हासिल कर लेते.

प्रसन्ना कहते हैं, "मेरे पिता को मेरे खेलने से इसलिए डर हुआ क्योंकि उस समय क्रिकेट में बहुत कम पैसे मिलते थे. उन्हें लगा कि अगर मैं क्रिकेट में अपना करियर नहीं बना पाया तो सड़क पर आ जाऊंगा. मैंने उन्हें आश्वस्त किया कि मैं इंजीनियरिंग की डिग्री लेने का बाद ही दोबारा क्रिकेट खेलना शुरू करूँगा."

आजकल एक साल बाद भी टेस्ट क्रिकेट में वापसी बहुत मुश्किल होती है. प्रसन्ना ने चार साल बाद टेस्ट क्रिकेट में वापसी की और वो भी क्या शान से!

पटौदी ने दिया आत्मविश्वास

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Image caption भारत क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान नवाब पटौदी.

वेस्ट इंडीज़ और इंग्लैंड के ख़िलाफ़ अच्छा प्रदर्शन करने के बाद वो आस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड गए, जहाँ उन्होंने आठ टेस्ट मैचों में 49 विकेट लिए.

प्रसन्ना मानते थे कि टाइगर पटौदी उनके सबसे अच्छे कप्तान थे. उनके जाने के बाद वाडेकर उनके कप्तान बने.

'हिंदू' अख़बार के वरिष्ठ संवाददाता विजय लोकपल्ली कहते हैं, "प्रसन्ना की आत्मकथा में एक अध्याय है, 'पैट गोज़ एंड आई एम वरीड.' उन्हें शुरू से ही अंदेशा था कि वाडेकर उनका साथ देंगे कि नहीं, क्योंकि वाडेकर का शुरू से ही झुकाव वेंकट राघवन की तरफ़ था. वो चाहते नहीं थे कि कोई मैच हारें."

Image caption बीबीसी स्टूडियो में विजय लोकपल्ली के साथ रेहान फ़ज़ल.

"प्रसन्ना बहुत दिलेर गेंदबाज़ थे. वो फ़्लाइट करते थे. बेशक उस पर छक्का पड़ जाए. बल्लेबाज़ के लिए वो ताली भी बजाते थे, लोकिन हो सकता है कि अगली गेंद में वो उनको आउट भी कर दें. पटौदी की ख़ासियत ये थी कि वो गेंदबाज़ों को जो फ़ील्ड चाहिए, वही दिया करते थे."

"वाडेकर थोड़ा सा रक्षात्मक थे क्योंकि उन्हें पहली बार कप्तानी मिली थी और वो नहीं चाहते थे कि हार से उनके करियर की शुरुआत हो."

प्रसन्ना सर्वश्रेष्ठ

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Image caption 1971 में इंग्लैंड को हराने वाली भारतीय टीम. प्रसन्ना बाएं से दूसरे खड़े हुए.

1971 के इंग्लैंड दौरे में वाडेकर ने प्रसन्ना पर वेंकट राघवन को तरजीह दी... हांलाकि उस समय प्रसन्ना दुनिया के सबसे अच्छे ऑफ़ स्पिनर थे.

बीबीसी से बात करते हुए वाडेकर ने कहा, "वेंकट राघवन ने पहले दस काउंटी मैचों में बहुत बढ़िया गेंदबाज़ी की. उनकी फील्डिंग भी बहुत अच्छी थी और वो बैंटिंग भी बेहतर कर लेते थे."

वाडेकर बताते हैं, "प्रसन्ना वैसे तो अच्छे गेंदबाज़ थे, लेकिन 71 के दौरे में अभ्यास मैचों में उनकी गेंदबाज़ी अच्छी नहीं हो रही थी, इसलिए मैंने सोचा कि वेंकट को ज़्यादा मौका देना चाहिए."

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लेकिन इसके बावजूद अजित वाडेकर स्वीकार करते हैं कि उन्होंने प्रसन्ना से अच्छा ऑफ़ स्पिनर अपनी ज़िंदगी में नहीं देखा.

वो कहते हैं, "कुछ लोग कहते थे कि ग़ुलाम अहमद उनसे बेहतर थे, लेकिन जब मैंने खेलना शुरू किया कि तो पाया कि प्रसन्ना ही सबसे अच्छे हैं और थे. पटौदी ने उन्हें बहुत सपोर्ट किया जिससे उनका आत्मविश्वास बहुत बढ़ गया था. उनके पास ग़ज़ब की विविधता थी. मैंने इलिंगवर्थ को खेला है, ऐशले मैलेट को खेला है, वेंकट को भी खेला है, लेकिन मेरी राय में प्रसन्ना इन सब में सबसे बेहतर थे."

इयन चैपल थे मुरीद

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1967 के आस्ट्रेलिया दैरे में उन्होंने बाक़ायदा योजना बनाकर उस समय दुनिया में स्पिन के सबसे अच्छे खिलाड़ी और बाद में ऑस्ट्रेलिया के कप्तान बने इयन चैपल को चंदू बोर्डे के हाथों कैच कराया था.

चैपल अपनी आत्मकथा 'चैपेली' में लिखते हैं, "एक बार प्रसन्ना ने मुझे आउट किया. शाम को हम लोग बियर पी रहे थे. मैंने उनसे कहा जब तुम गेंद फेंक रहे थे तो ऐसा लग रहा था कि तुमने उससे एक डोर बाँध रखी है."

"जैसे ही गेंद तुम्हारे हाथ से निकलती थी, मैं सोचता था कि मैं इसे मैदान से बाहर मारने वाला हूँ. मैं उस गेंद की पिच तक पहुंचने की कोशिश करता था, लेकिन तभी तुम उसकी डोर खींच लेते थे और गेंद पहले गिर जाती थी."

प्रसन्ना का बारिश में भीगना

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Image caption ओवल की बालकनी पर अजीत वाडेकर, चंद्रशेखर और दिलीप सरदेसाई.

वाडेकर याद करते हैं कि 1967 के इंग्लैंड दौरे में बंगलौर के एक खिलाड़ी सुब्रमण्यम भी थे जो तरह तरह की शरारतें करने के लिए मशहूर थे.

उन्होंने देखा कि वेंकटराघवन की एक लड़की के साथ कुछ ज़्यादा ही दोस्ती हो रही है. उन्होंने एक लड़की बनकर प्रसन्ना को एक ख़त लिखा कि वो उनकी बॉलिंग से बहुत प्रभावित है. ख़त में लिखा कि 'क्या तुम लॉर्ड्स मैच के दौरान मुझसे मिलने लंदन में मारबेल आर्च के पास आ सकते हो?'

उस दिन इंग्लैंड की महारानी ने दोनों टीमों को रात के खाने पर बुलाया था. प्रसन्ना ने जब अपनी समस्या पटौदी को बताई तो उन्होंने सलाह दी कि तुम मेज़ के कोने पर बैठना और जब भाषण शुरू हो जाए तो वहाँ से चुपके से निकल जाना.

दो घंटे बाद जब डिनर ख़त्म हो गया सुब्रमण्यम ने कहा कि मार्बल आर्च होते हुए अपने होटल चलते हैं. जब वो वहाँ पहुंचे तो देखा कि प्रसन्ना वहीं खड़े हैं. ज़बरदस्त बारिश हो रही है और प्रसन्ना अभी तक उस लड़की की राह देख रहे हैं.

बेदी को गले लगाने की अदा

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Image caption बिशन सिंह बेदी

भारत के मशहूर स्पिन चौगड्डे के सदस्य चंद्रशेखर कहते हैं कि प्रसन्ना, बेदी और वेंकट एक एक विकेट लेने के लिए बाक़ायदा योजना बनाते थे.

प्रसन्ना तो रन देकर विकेट ख़रीदने में यक़ीन रखते थे. उन्होंने 49 टेस्ट मैचों में 189 विकेट लिए.

सुनील गावसकर ने अपनी किताब 'आइडल्स' में प्रसन्ना का दिलचस्प चित्रण खींचा है, "प्रसन्ना की ख़ासियत थी, बल्लेबाज़ को चकमा देने के बाद मुस्कराते हुए अपने बॉलिंग रन अप की तरफ़ जाना. उनकी ये मुस्कान बल्लेबाज़ के लिए सबसे ज़्यादा खीज का सबब होती थी. वो बल्लेबाज़ को बीट करने के बाद उछलते थे और आश्चर्य से अपना हाथ ऊपर ले जाते ते, मानो पूछ रहे हों कि तुम बच कैसे गए?"

"प्रसन्ना की दूसरी ख़ासियत थी कि जैसे ही वो विकेट लेते थे, दौड़कर मिड ऑन पर खड़े होकर बिशन बेदी को गले लगाते थे और फिर दोनों मिल कर ज़ोर का ठहाका लगाते थे, मानो कह रहे हों कि उन्होंने बल्लेबाज़ को किस तरह बेवकूफ़ बनाया."

जब गावसकार को आउट किया

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एक बार वेटरन्स क्रिकेट के एक मैच के दौरान प्रसन्ना ने सुनील गावसकर को भी अपनी मशहूर फ़्लाइट और लूप का शिकार बनाया था.

विजय लोकपल्ली कहते हैं कि एक बार अंशुमान गायकवाड़ ने उन्होंने बताया था कि वेटरन्स क्रिकेट में बड़ी जद्दोजहद होती है, क्योंकि इनके पैर तो चलते नहीं, लेकिन दिमाग़ बहुत तेज़ी से चलता है.

उस स्टेज में भी ये चाहते नहीं कि इनके प्रभुत्व में कोई कमी आए. प्रसन्ना और गायकवाड़ एक टीम में थे. गावसकर बैटिंग करने आए.

प्रसन्ना ने अंशुमान से कहा कि 'मैं सनी को आउट करूंगा'. अंशुमान शॉर्ट लेग पर खड़े होकर हर गेंद की ट्रैजेक्टरी देख रहे थे. हर गेंद पर प्रसन्ना ने गावस्कर को आगे खींचा. आखिरी गेंद पर उन्होंने अंशुमान को इशारा किया और जो गावस्कर भी समझ गए कि प्रसन्ना कुछ ख़ास करने वाले हैं.

वो गेंद ज़्यादा घूमी, बाउंस भी हुई और गावस्कर का बैट पैड लेती हुई अंशुमान गायकवाड़ के हाथ में जा पहुंची.

रिटायर होने के बाद भी प्रसन्ना में कितनी प्रतिस्पर्धा की भावना थी, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि गावस्कर का विकेट लेने के बाद प्रसन्ना उछले, सिर्फ़ ये बताने के लिए कि उन्होंने सनी जैसे खिलाड़ी को ग़लत स्ट्रोक खेलने पर मज़बूर कर दिया.

शेन वार्न से मुलाक़ात

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1996 के विश्व कप के दौरान जब शेन वार्न नेट्स में गेंदबाज़ी कर रहे थे तो एक बुज़ुर्ग शख़्स उनके पास आकर बोला, "वेल डन सन, तुम्हारे पास बहुत प्रतिभा है. मैं उम्मीद करता हूँ कि तुम इसी तरह अच्छी गेंदबाज़ी करते रहोगे."

वार्न उस शख़्स को पहचान नहीं पाए. बगल में खड़े इयन चैपल ने उस बुज़ुर्ग शख़्स का परिचय कराया, "शेन तुम इरापल्ली प्रसन्ना से बात कर रहे हो.... मेरी पीढ़ी के महानतम ऑफ़ स्पिनर !"

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