कप्तान कोहली कैसे संभालेंगे धोनी की कमान?

  • 12 जून 2015
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विराट कोहली अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के बड़े सितारों में से एक हैं. अब वह भारत के टेस्ट क्रिकेट टीम कप्तान के रूप में नई पारी भी शुरू करने जा रहे हैं.

पिछले साल एडिलेड टेस्ट से उनकी कप्तानी की झलक मिल चुकी है और हाल ही में आए उनके बयान से भी यह पता चलता है वह पूरी तरह तैयार हैं.

लेकिन भारतीय टेस्ट क्रिेकेट के सबसे सफ़ल कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की विरासत को वह कितना आगे ले जा सकेंगे और क्या वह टेस्ट क्रिकेट में भारत की धाक छोटे फ़ॉर्मेट की तरह जमा सकेंगे.

धोनी और विराट

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Image caption विराट कोहली(बाएँ) और महेंद्र सिंह धोनी.

अच्छी किस्मत और उभार आपको बस यहीं तक पहुंचा सकते हैं. खेल के इतिहास में हर कप्तान ने ख़तरे उठाकर गेंदबाजी में कई बदलाव किए हैं और चौंकाने वाले बैटिंग लाइन-अप का इस्तेमाल किया और जीत हासिल की है. लेकिन कप्तानी का आधार यही नहीं हो सकता.

धोनी से सात साल छोटे 26 वर्षीय विराट कोहली रणनीतिक रूप से मज़बूत नहीं हैं लेकिन दो चीज़ें उनके हक़ में जाती हैं. एक पॉजिटिव एटीट्यूड और दूसरा ज़बरदस्त आत्मविश्वास.

टाइगर पटौदी के बाद से कोई भी भारतीय कैप्टन जीत की तलाश में हार का ख़तरा उठाने को तैयार नहीं रहा है लेकिन दिसंबर, 2014 में ऑस्ट्रेलिया के ख़िलाफ़ एडिलेड टेस्ट में कोहली ने ये किया.

भारतीय क्रिकेट के भूत और भविष्य में बड़ा फ़र्क यह है कि जहां कोहली साफ़ तौर पर गिरावट की ओर थे वहीं कोहली के लिए सिर्फ़ सुधार की ही गुंजाइश है.

आशावाद

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उन्हें उन बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ेगा जिनका धोनी ने किया था.

कमज़ोर गेंदबाज़ी - ख़ासकर विदेशों में, 50 ओवर से ज़्यादा समय तक मैदान में जमे रहने का दबाव और यह उम्मीद की क्रिकेट के छोटे फ़ॉर्मेट की जीत टेस्ट में भी आएगी.

ऑस्ट्रेलिया दौरे से पहले भारत को विदेशों में खेले गए 17 में 13 टेस्ट में हार मिली थी. एडिलेड में भारतीय टीम को 14वीं हार मिली, जहां कोहली ने पहली बार कप्तानी की थी, लेकिन इस बार इसकी रंगत अलग थी.

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जैसे तालस्तॉय ने अपने उपन्यास अन्ना कैरेनिना में लिखा है, "सभी ख़ुश परिवार एक जैसे थे. लेकिन हर दुखी परिवार अपने ढंग से दुखी था."

इसी तरह सभी जीत एक जैसी होती हैं लेकिन हर हार अलग होती हैं. भारत संघर्ष कर हारा - एक दिन 364 रन बनाने की कोशिश करते हुए और उसके काफ़ी करीब पहुंच कर.

कोहली ने कहा कि ड्रॉ के लिए खेलना विकल्प था ही नहीं. शायद वह जानते थे कि भारत को टेस्ट को जीतने के लिए बैटिंग करनी है ड्रॉ करने के लिए नहीं. फिर भी सामान्यतः कहा जाए तो इसमें बदलाव का वादा नज़र आता है.

आशावाद संक्रामक होता है और ऐसे कप्तान से यह मिलना और भी आसान है जो इससे भरा हुआ हो.

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कोहली ने यह आशावाद और भावना उस दिन से फैलानी जारी रखी है जब उन्होंने अंडर-19 विश्वकप में भारतीय टीम को जीत दिलाई थी. उन्हें भविष्य का कप्तान माना गया था.

आईपीएल की ट्रेनिंग

आईपीएल को लेकर कई सवाल उठते हैं लेकिन कोहली के मामले में, इसने दरअसल मदद ही की है.

शुरुआत में इसके कई प्रलोभन चखने के बाद कोहली ठहर गए. वह रॉयल चैलेंजर्स बैंगलोर के पाले में थे जहां उनके कोच रे जेनिंग्स ने उन्हें बताया कि अंडर-19 की जीत का जश्न जल्द ही भुला दिया जाएगा और एक वयस्क क्रिकेटर के रूप में उन्हें तौला जाएगा.

अनिल कुंबले ने उनकी ऊर्जा को दिशा देने और संकेंद्रित करने में मदद की और आगे मिलने वाले बड़े काम की आशा में उन्हें कप्तान बना दिया गया.

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जहां एक दिवसीय मैचों में विराट कोहली की कप्तानी आक्रामक और जीत पर केंद्रित होती है, टेस्ट में उन्हें और उनके गेंदबाज़ों को भी सीखने होंगे- धैर्य के गुण और दीर्घकालिक योजना बनाना.

भारतीय खिलाड़ियों को धोनी के चीज़ों को बहने देने के स्वभाव और घटनारहित ओवरों और स्पेल के दौरान कोहली की बेचैनी के बीच संतुलन बनाना होगा.

लंबे फॉर्मेट में मछली मारने जैसी रणनीति की ज़रूरत ही है. आप कांटा डाल देते हो और इंतजार करते हो. कोहली को भी इंतज़ार का खेल सीखना होगा.

छाप छोड़ पाएंगे?

यह समय की झलक हो या या फिर छोटे फॉर्मेट में बहुत सारे मैच खेलने का प्रभाव या स्वभाव की बात. भारतीय क्रिकेट की पहचान एक बेचैनी की वजह से की जाती है जिसकी वजह से वह अपनी क्षमता से कम प्रदर्शन कर पाती है.

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गेंदबाज़ विकेट लेने की जल्दी में होते हैं या फिर अपना ओवर पूरा करने की. ऐसा लगता है कि बल्लेबाज़ सेशन से सेशन खेलना भूल गए हैं. कोहली को टीम को बुरी आदतों से निकालना होगा.

कुछ लोग सोचते हैं कि कोई भी कप्तान उतना ही अच्छा होता है जितनी उसकी टीम, लेकिन सबसे अच्छे कप्तान अपनी टीम को खुद से ऊपर उठकर खेलने के लिए प्रेरित करते हैं. जैसे कि पटौदी, माइक बीयर्ली और कुछ अन्य भी.

कोहली को फ़ायदा ये है कि वह अपनी छोर के सबसे अच्छे बल्लेबाज़ हैं और उनकी जगह ले पाए ऐसा कोई अभी नहीं है.

दूसरे शब्दों में, उनके पास अपनी कप्तानी को निखारने का पूरा मौका है. उन्हें अपनी हालत की चिंता करने की चिंता नहीं है, जो दिक्कत पहले के भारतीय कप्तानों के साथ रहती थी.

उनमें वह बात है कि वह एक युग पर अपनी छाप छोड़ सकें.

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