'श्रीनिवासन के ख़िलाफ़ पवार और डालमिया ने मदद की'

  • 17 जुलाई 2015
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दो साल पहले आईपीएल मैचों में फिक्सिंग के खिलाफ जनहित याचिका दायर करने वाले बिहार क्रिकेट संघ के सचिव आदित्य वर्मा आज भी बिहार क्रिकेट एसोसिएशन को मान्यता दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

बीबीसी संवाददाता पंकज प्रियदर्शी ने आदित्य वर्मा से बीसीसीआई और भारतीय क्रिकेट की वर्तमान स्थितियों पर बात की और यह भी पूछा कि उनका संघर्ष आगे किस दिशा में जाएगा.

पढ़िए आदित्य वर्मा से बातचीत के प्रमुख अंश.

आपकी लड़ाई कहाँ से शुरू हुई?

बीसीसीआई 1928 में बनी संस्था है और बिहार क्रिकेट एसोसिएशन 1935 से ही इससे जुड़ा हुआ है. बीसीसीआई के सबसे प्रतिष्ठित टूर्नामेंट रणजी का फ़ाइनल भी बिहार 1975-76 में खेल चुका था.

बिहार से खेलकर रमेश सक्सेना, रणधीर सिंह, सुब्रतो बैनर्जी, सबा क़रीम जैसे अनेक खिलाड़ी निकले हैं.

जब 2000 में नए राज्य झारखंड का गठन हुआ तो 13 ज़िलों वाले नए राज्य को बिहार क्रिकेट संघ के रूप में मान्यता दे दी गई, जिसका नाम बदल कर बाद में झारखंड क्रिकेट एसोसिएशन कर दिया गया और 30 ज़िलों वाले बिहार को क्रिकेट एसोसिएशन के उसके अधिकार से वंचित कर दिया गया.

मैं 2006 से ही बिहार क्रिकेट की पहचान के लिए बीसीसीआई से संघर्ष कर रहा हूं. आईपीएल में बड़ा फैसला आने के बाद 2013 में याचिका दायर करने का मकसद पूरा होता दिखता है.

लेकिन उस समय भारतीय क्रिकेट के सबसे ताकतवर शख़्स के ख़िलाफ़ संघर्ष में श्रीनिवासन विरोधी गुट ने क्या उनकी मदद की थी?

एक कहावत है कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है. इसलिए बीसीसीआई में श्रीनिवासन के विरोधियों ने मेरी मदद की थी.

बोर्ड के कई सदस्यों ने कई मौकों पर मुझे ऐसे काग़ज़ात उपलब्ध करवाए, जो एक ग़ैर-मान्यता प्राप्त संगठन होने के नाते मुझे नहीं मिल सकते थे. इनसे संघर्ष में बहुत मदद मिली.

इन लोगों में आईएस बिंद्रा थे, जिन्होंने बहुत मदद की. इसके अलावा शरद पवार, जगमोहन डालमिया, एसी मुथैया ने काफ़ी मदद की.

ललित मोदी का भी नाम आता है....

जब मैंने संघर्ष शुरू किया था तो न तो मुझे स्थानीय मीडिया जानता था और न ही राष्ट्रीय मीडिया.

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लेकिन मेरी पीआईएल पर मुंबई हाईकोर्ट में बीसीसीआई के ख़िलाफ़ फ़ैसला आने के बाद और सुप्रीम कोर्ट में एक स्तर पर जीत के बाद लोगों का ध्यान मेरी तरफ़ गया.

फिर एक चैनल पर ललित मोदी ने कहा, "बिहार के बच्चों के लिए मुझे दर्द है और बिहार के बच्चों के लिए मैं कुछ कर सकूं तो मुझे बहुत ख़ुशी होगी."

इसके अलावा मेल से भी उन्होंने संपर्क किया था, मुझे बहुत प्रोत्साहित किया और कहा कि आप असली लड़ाके हैं. उन्होंने कहा, "मैंने भी यहां करप्शन अगेंस्ट क्रिकेट नाम की एक संस्था बनाई है, कभी इंग्लैंड आना तो मुझसे मिलना."

लेकिन ललित मोदी पर खुद इतने आरोप हैं. उसमें उनकी निजी लड़ाई हावी नहीं थी?

ललित मोदी पर जो भी आरोप हैं वह क्रिकेट से जुड़े हुए हैं. यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि किसी संस्था में जब कोई आदमी काम करता है तो वो फ़ैसले अकेले नहीं करता, फ़ैसले सामूहिक होते हैं.

फिर ललित मोदी बोर्ड के अध्यक्ष तो थे नहीं.

आईपीएल के समर्थन में हैं या विरोध में?

आईपीएल चले, लेकिन ऐसे न चले. उसके लिए एक अलग संस्था बने.

आईपीएल क्रिकेट तो है ही लेकिन यह बहुत बड़ा मार्केटिंग का भी ज़रिया बन गया है.

ललित मोदी आईपीएल के गॉडफ़ादर हैं. उन्हें हिंदुस्तान में रहना चाहिए था. उनका अपराध बस यही है कि उन्हें भारत के कानून से बचकर लंदन जाना पड़ा.

आर्थिक सहायता कहां से मिलती है और किस आधार पर?

सुबोध कांत सहाय हमारी बहुत मदद करते हैं, मैं उन्हें बड़े भाई की तरह मानता हूं.

वह क्रिकेट के नाते हमारी मदद करते हैं और कहते हैं कि 'मैंने ज़िंदगी में तुम्हारे जैसा जिगर वाला लड़ाका नहीं देखा.'

लोढ़ा समिति के फ़ैसले के बाद अब यह लड़ाई किस स्तर पर है?

बीसीसीआई को अभी तक होश नहीं आया है.

लोढ़ा समिति का फ़ैसला 14 जुलाई को आया था. लेकिन इतने बड़े फ़ैसले के बाद भी जो होना चाहिए था वह नहीं हुआ.

समिति ने अपने फ़ैसले में कई बार इस बात को दोहराया है कि इन लोगों ने अपने ग़लत आचरण से बीसीसीआई जैसी संस्था का नाम ख़राब किया.

देश में धर्म की तरह माने जाने वाले क्रिकेट को कलंकित किया. आईपीएल के साथ धोखा किया.

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