...तो हॉकी में भारत मेडल कैसे जीतेगा?

  • 26 जुलाई 2015
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भारतीय हॉकी में पिछले कुछ सालों में दो बड़े परिवर्तन आए हैं. एक है खेल में पैसा और दूसरा है हॉकी का निरंतर गिरता स्तर.

अक्सर भारतीय खिलाड़ियों को पैसे की कमी खलती है. लेकिन कम से कम हॉकी खिलाड़ी यह शिकायत नहीं कर सकते.

विदेश में किसी भी टूर्नामेंट में जीत के बाद हॉकी इंडिया ने खिलाड़ियों को अच्छी खासी रकम देने का सिलसिला शुरू किया और राष्ट्रीय टीम के खिलाड़ियों को सुविधाओं की भी कोई कमी नहीं.

गिरता स्तर

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लेकिन विडंबना यह है कि हॉकी इंडिया के अध्यक्ष नरेंद्र बत्रा पर हॉकी के गिरते स्तर का ज़िम्मेदार होने के आरोप भी लगते हैं.

हॉकी इंडिया के अध्यक्ष नरेंद्र बत्रा एक कारोबारी हैं और पैसा इकट्ठा करना जानते हैं.

वो कॉलेज स्तर पर हॉकी खेले भी हैं लेकिन उनके करीबी मानते हैं कि बत्रा में औरों के पक्ष को समझने की सहनशीलता की कमी है.

कोच की छुट्टी

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शायद यही कारण है कि साल 2010 में उनके हॉकी इंडिया की कमान संभालने के बाद पांच सालों में चार विदेशी कोचों की छुट्टी हो चुकी है.

होज़े ब्रासा, माइकल नोब्स और टेरी वॉल्श के बाद कुछ दिन पहले पॉल वान एस को निलंबित किया गया.

बत्रा से पहले हॉकी महासंघ के अध्यक्ष केपीएस गिल के 14 साल के कार्यकाल में 16 कोच बर्खास्त हुए जिनमें ज़फर इक़बाल, भास्करन, परगट सिंह और महाराज किशन कौशिक जैसे मंझे हुए पूर्व खिलाड़ी भी शामिल रहे.

लेकिन बत्रा से खेल प्रेमी शिकायत ज्यादा करते हैं. उन्होंने भारत में कई बड़े टूर्नामेंट करवाए और सफल लीग भी लेकिन आरोप है कि वो सिर्फ अपने स्वभाव की वजह से मात खा गए.

स्वर्ण युग

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अगर देश की आज़ादी से पहले के भारतीय हॉकी के स्वर्ण युग को छोड़ भी दें तो भी 1948, 1952 और 1956 में भारत ने लगातार तीन ओलंपिक स्वर्ण पदक जीते.

1960 में रोम में पाकिस्तान से फाइनल में हारने के बाद 1964 में टोक्यो में भारत ने फिर गोल्ड मेडल पर कब्ज़ा किया था. तो कुल मिला कर इन 25 सालों को स्वतंत्र भारत की हॉकी का स्वर्ण युग कहा जा सकता है.

लेकिन उसके बाद देश की हॉकी पिछड़ती गई. तीसरे और चौथे स्थान पर सरकने के बाद सेमीफ़ाइनल में प्रवेश भी दूभर हो गया.

कितनी उम्मीद?

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साल 2006 में दोहा एशियाई खेलों में सेमीफाइनल में न पहुंचने के कारण भारतीय टीम बीजिंग ओलंपिक में भाग लेने से भी वंचित रह गई थी.

यह भारतीय हॉकी के लिए किसी काले दिन से कम नहीं था. इसके बाद तो स्तर लगातार गिरता ही गया.

जिस तरह बत्रा ने काम शुरू किया था उससे कुछ उम्मीद बंधी थी. लेकिन आज स्थिति यह है कि हिमाचल प्रदेश के शिलारू में टीम का कैंप लगा है लेकिन कोच पॉल वान एस निलंबित हो कर अपने घर चले गए हैं.

अगले साल रियो में ओलंपिक गेम्स हैं. अच्छी बात यह है कि भारत ने रियो के लिए क्वालीफ़ाई कर लिया है.

लेकिन भारतीय हॉकी के वर्तमान हालात देखते हुए यह कहना बहुत मुश्किल है कि भारतीय टीम से पदक की उम्मीद की जा सकती है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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