'मानों मुझे नया जन्म मिल गया हो'

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"इस फ़ैसले से मानों मुझे नया जन्म मिला गया हो." ये कहना है भारतीय महिला एथलीट दुती चंद का.

भारत की स्टार धाविका दुती चंद को एथलेटिक संगठनों के अंतरराष्ट्रीय संघ (आईएएफ़) ने जुलाई 2014 में ग्लासगो कॉमनवेल्थ खेलों के कुछ दिन पहले ही अयोग्य करार दिया था.

ये पाबंदी दुती के शरीर में टेस्टोस्टेरोन की मात्रा सामान्य से ज़्यादा पाए जाने के कारण लगाई गई थी.

धाविका दुती चंद ने आईएएफ़ के फ़ैसले को चुनौती देते हुए लड़ाई लड़ी. और अब वे लड़ाई जीत गई हैं.

कोर्ट ऑफ़ आरबिट्रेशन ऑफ़ स्पोर्ट्स (कास) ने दुती चंद के मामले में आईएएफ़ के पाबंदी के फ़ैसले को दो साल के लिए स्थगित कर दिया है.

दुती बताती हैं, "प्रतिबन्ध के बाद मैं पूरी तरह टूट गई थी और दोबारा अंतरराष्ट्रीय मुक़ाबलों में हिस्सा लेने की उम्मीद लगभग छोड़ चुकी थी. यही कारण है कि पाबंदी के बाद मेरा प्रदर्शन लगातार ख़राब होता गया और मैं चेन्नई में हुए नेशनल एथलेटिक्स में तीसरे नंबर पर आई."

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उन्होंने बताया, "लेकिन 'कास' के निर्णय के बाद एक बार फिर उम्मीद बंधी है कि मैं अपना पुराना प्रदर्शन वापस ला सकती हूं."

महिला एथलीट दुती का लक्ष्य अब अगले साल रियो डी जेनेरियो में होने वाले ओलिंपिक खेल हैं.

वे कहती हैं कि इस मुक़ाबले में हिस्सा लेने के लिए जो योग्यता रखी गई है (100 मीटर दौड़ के लिए 11.32 सेकंड और 200 मीटर के लिए 23.20 सेकंड) उसे हासिल करने के लिए वे एड़ी चोटी एक कर देंगी.

दुती चंद ने कहा, "मुझे पूरा विश्वास है की अंतिम फ़ैसला भी मेरे पक्ष में जाएगा. केवल मेरे पक्ष में ही नहीं, बल्कि उन तमाम खिलाडियों के पक्ष में जो इस नियम का शिकार बने हैं."

टेस्टोस्टेरोन हार्मोन

आईएएफ़ ने शरीर में टेस्टोस्टेरोन की मात्रा सामान्य से ज़्यादा पाए जाने के कारण दुती चंद को खेलों से बेदख़ल कर दिया था.

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टेस्टोस्टेरोन वो हार्मोन है जो पुरुषोचित गुणों को नियंत्रित करता है.

हारमोन टेस्ट में फेल होने के कारण 19 साल की दुती चंद कॉमनवेल्थ और एशियाई खेलों में हिस्सा नहीं ले सकी थीं.

वे ऐसी पहली एथलीट हैं जिन्होंने आईएएफ़ के लिंग परीक्षण से जुड़े नियम को चुनौती दी.

दो साल के लिए स्थगित

कोर्ट ऑफ़ आरबिट्रेशन ऑफ़ स्पोर्ट्स (कास) ने दुती चंद के मामले में आईएएफ़ के "हाइपरएंड्रोजेनिज़्म" से जुड़े फ़ैसले को दो साल के लिए स्थगित कर दिया है.

हाइपरएंड्रोजेनिज़्म वो स्थिति है जिसमें किसी महिला के शरीर में जीन विविधिताओं के कारण सामान्य से अधिक मात्रा में टेस्टोस्टेरोन बनता है.

यहां ये भी अहम है कि यदि आईएएफ़ भविष्य में नए सबूत नहीं ला सका तो उसे अपना फ़ैसला वापस लेना होगा.

आईएएफ़ ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि लिंग परीक्षण से जुड़े नियम-क़ायदों को अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी) के साथ 'लंबे और व्यापक विचार-विमर्श' के बाद अपनाया गया.

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भेदभाव से भरा फ़ैसला

कास ने अपने फ़ैसले में आईएएफ़ से अपील की है कि वो ऐसी प्रक्रिया अपनाए जिसमें एथलीट महिला या पुरुष श्रेणी में से किसी एक में हिस्सा ले सके और उन्हें उनके 'शरीर के क़ुदरती और स्थाई गुणों के कारण' प्रतियोगिता से दूर ना रखा जाए.

चांद को आईएएएफ़ के नियमों का पालन करते हुए भारतीय एथलेटिक संघ ने भी टेस्टोस्टेरोन का स्तर सामान्य से अधिक होने के कारण निलंबित कर दिया था.

फ़ैसले को चुनौती देते हुए दुती चांद के वकील ने मार्च में सुनवाई के दौरान इसे 'भेदभावपूर्ण' और 'दोषपूर्ण' कहा.

लिंग परीक्षण

आईएएफ़ और आईओसी की नीतियों के मुताबिक़, किसी एथलीट के शरीर में टेस्टोस्टेरोन की क्या सीमा हो, यह तय किया गया है.

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आईएएफ़ का मानना है कि हाइपरएंड्रोजेनिज़्म की वजह से खिलाड़ियों को अनुचित फ़ायदा मिलता है और यह सभी खिलाड़ियों को बराबर का मौक़ा दिए जाने के सिद्धांत का उल्लंघन करता है.

लिंग परीक्षण से जुड़े नियम की शुरुआत साल 2009 में कास्टर सेमेन्या प्रसंग के समय हुई थी.

दरअसल दक्षिण अफ़्रीका की एक किशोरी सेमेन्या को बर्लिन में 2009 के विश्व एथलेटिक्स चैंपियन में 800 मीटर की रेस के जीतने के ठीक पहले लिंग परीक्षण करवाने के लिए कहा गया था.

सेमेन्या ने बाद में लंदन 2012 ओलंपिक में रजत पदक जीता और खेलों में वापसी की.

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