दूधवाले के बेटे से गोल्फ़ वर्ल्ड चैम्पियन

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दिल्ली में रहने वाले शुभम ने इसी हफ़्ते अपना जन्मदिन मनाया है, वो 11 साल के हो गए हैं. 11वें साल में एंट्री उन्होंने बड़े स्टाइल में ली है.

अभी हाल में शुभम ने अमरीका में जूनियर गोल्फ़ वर्ल्ड चैम्पियनशिप जीती है. पिछले दो सालों में शुभम ने गोल्फ़ में कई ख़िताब जीते हैं. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की ओर से शुभम को ख़ास पत्र भी भेजा गया है.

शुभम से मेरी मुलाक़ात दिल्ली गोल्फ़ क्लब में हुई.

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मिलते ही पूछा क्या बीबीसी दुनिया भर में है? पर मेरे कुछ कहने से पहले ही कहा, "मुझे नहीं लगता कि चीन और उत्तर कोरिया में बीबीसी देखना आसान है." 10-11 साल के बच्चे के हिसाब से शुभम की बॉडी लैंग्वेज, आत्मविश्वास और जानकारी कमाल की है.

10 साल में वर्ल्ड चैम्पियन बनने का शुभम का सफ़र काफ़ी अलग रहा. कुछ साल पहले तक शुभम हरियाणा के गाँव इसराना में पहलवानों के एक परिवार में रहते थे.

शुभम बताते हैं, "मैं साढ़े पाँच साल का था जब एक एनआरआई कपूर सिंह ने गाँव में गोल्फ़ एकेडमी खोली जहाँ मैं जाने लगा. एकेडमी तो दो महीने में बंद हो गई, लेकिन कपूर अंकल ने मुझे कहा कि तुम गोल्फ़ मत छोड़ना."

"प्रैक्टिस करने के लिए पापा ने गाँव में ही 10 यार्ड का घास लगा दिया था. टेंट हाउस वाले मैट को उस पर रख देते थे क्योंकि आम घास पर खेलना मुश्किल होता था. घर की छत पर रेत डालकर मैं बंकर शॉट की प्रैक्टिस करता था. कोई सिखाने वाला नहीं था तो यूट्यूब पर मैं वीडियो देखकर सीखता."

'पानी पीकर पेट भर लेते थे'

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धीरे-धीरे शुभम आस-पास में होने वाली प्रतियोगिताएँ जीतने लगा. लेकिन पैसे की कमी और गाँव में रहकर गोल्फ़ में कुछ कर पाना मुमकिन नहीं था. तब शुभम के पिता जगपाल गाँव में दूध बेचने का काम करते थे.

उस वक्त शुभम के खेलने का खर्च उठाने का ज़िम्मा लिया दिल्ली गोल्फ़ फाउंडेशन के अमित लूथरा और पूर्व गोल्फ़र नोनिता लाल क़ुरैशी ने.

नन्हें शुभम को गाँव छोड़कर माँ-बाप के साथ आना पड़ा दिल्ली.

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महंगा शहर, उस पर से महंगा खेल. शुभम कई महीनों तक बिना स्कूल के थे, जब तक लक्ष्मण पब्लिक स्कूल ने उन्हें मुफ़्त पढ़ाने की पेशकश नहीं की.

शुरुआती संघर्ष को याद करते हुए पिता जगपाल बताते हैं, "शहर आकर पैसा-पैसा सोचकर खर्च करना पड़ता था. गोल्फ़र को एक कैडी की ज़रूरत होती है जो उसके बैग, किट उठाए उसे सलाह और समर्थन दे. हमारे पास इतने पैसे नहीं कि हम कोई बेहतरीन कैडी शुभम के लिए रखें."

"मैं ही गोल्फ़ कोर्स में शुभम का कैडी हूँ. इस वजह से मैं कोई नौकरी नहीं कर सकता. शुरू में ऐसा होता था कि हम तंदूर की रोटी खाकर खूब सारा पानी पी लेते थे ताकि पेट भर जाए."

'लगा तलाश पूरी हो गई'

पिता जगपाल कहते हैं कि एक वक़्त था जब पहलवानों के परिवार में सब शुभम के गोल्फ़ में जाने के ख़िलाफ़ थे सिवाय शुभम की माँ के.

हिमाचल प्रदेश से हरियाणा में ब्याह कर आईं अंजना ने गाँव के रूढ़िवादी माहौल में हर चीज़ पर आवाज़ उठाई.

अंजना बताती हैं, "हरियाणा में शादी के बाद जब मैं आई तो मेरे लिए अजीब माहौल था. बात करने की तमीज़, औरतों की आज़ादी सबमें फर्क था. मैंने भी सोच लिया था कि मुझे एक ही बच्चा पैदा करना है और मैं उसके लिए सब कुछ करूँगी. फिर गोल्फ़ इसकी ज़िंदगी में आई."

"मुझे लगा मेरी तलाश पूरी हो गई"...ये कहते-कहते अंजना भावुक हो जाती हैं.

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रोज़ाना कई घंटे गोल्फ़ खेलना और दुनिया भर में घूमने से शुभम की पढ़ाई पर असर पड़ता है.

जब शुभम लौटते हैं तो स्कूल में उनके लिए पढ़ाई का ख़ास इंतजाम किया जाता है.

अंग्रेज़ी नहीं आने से शुभम ने महसूस किया कि विदेश में वो अपनी बात कह नहीं पाते थे. गोल्फ़ के साथ अंग्रेज़ी सीखनी शुरू की. अब वो फर्रोटेदार और 'एक्सेंट' वाली अंग्रेज़ी बोलते हैं.

गोल्फ़ को लेकर शुभम का लक्ष्य साफ़ है, अगले चार साल में उन्होंने पूरी तैयारी करने का मन बनाया है ताकि 15 के होते होते एशिया पैसिफ़िक चैम्पियन बन सकें.

पूर्व गोल्फ़र अमित लूथरा कहते हैं कि उनकी संस्था में गोल्फ़ सीख रहे बच्चों में शुभम खास हैं.

'बॉर्न टू प्ले गोल्फ़'

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आम बच्चों से अलग उम्र से कहीं ज़्यादा परिपक्वता शुभम में दिखती है. फिर भी बच्चों वाली मासूमियत झलक ही जाती है.

खाने की बात हुई तो उत्साहित होकर बोले, "मैं जब पहली बार विदेश गया तो देखा कुछ बच्चे कीड़े खा रहे हैं. मुझे लगा छी. फिर मुझे बताया कि गया ये सी फूड है. अब मैं चिकन खाता हूँ."

और चटकारा लेते हुए कहते हैं, "मुझे तेज़ मसालेदार खाना पसंद है."

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गोल्फ़ और पढ़ाई के तालमेल पर शुभम ने हँसते हुए कहा, "बॉर्न टू गोल्फ़, फ़ोर्स्ड टू स्टडी. पढ़ाई करनी पड़ती है,."

जाते-जाते मुझ जैसे नौसिखिए को भी ‘मास्टर’ शुभम ने गोल्फ़ के दो चार टिप्स दिए.

दूसरी बारी मैं सफल हुई तो तपाक से बोले- "नॉट बैड फॉर अ बिगनर".

फिलहाल अगले कुछ महीने स्कूल जाने के लिए हैं पर नज़रें गोल्फ़ पर ही टिकी हैं. आखिर उन्हें फिर चैम्पियन जो बनना है.

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