क्या क्रिकेट के 'सुल्तान' की वापसी होगी?

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आईसीसी चेयरमैन पद से जबरन हटाए जाने के कुछ दिनों बाद एन श्रीनिवासन ने कहा है कि वे बोर्ड के इस फ़ैसले से निराश या मायूस नहीं हैं.

अंग्रेज़ी समाचार पत्र टाइम्स ऑफ़ इंडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा कि उन्होंने जो कुछ भी हासिल किया है वे उससे संतुष्ट हैं.

एन श्रीनिवासन का कहना है, “ठीक है. मैं अपना काम कर रहा था. आप जानते हैं, मैं एक उत्साही गोल्फ़र हूँ और अब मेरे पास अपने लिए कुछ वक़्त होगा.”

जो उन्हें अच्छी तरह से जानते हैं, वे मानेंगे कि ये श्रीनिवासन के व्यक्तित्व का हिस्सा है. उन्हें मुश्किल से मुश्किल हालात से लड़ने के लिए जाना जाता है.

फिर सवाल ये उठता है कि क्या श्रीनिवासन वाक़ई अपने गोल्फ़ के शौक़ को लेकर गंभीर हैं. या फिर वो गोल्फ़ कोर्स का इस्तेमाल भी अपनी छीनी गई ताक़त को हासिल करने के लिए करेंगे.

बेशक ये सवाल देश में क्रिकेट को चलाने वालों ही नहीं इसमें दिलचस्पी रखने वालों में भी खीज पैदा कर रहा होगा.

70 साल की उम्र बेशक उनके ख़िलाफ़ हो, लेकिन इतिहास बताता है कि ताक़त से बढ़कर कोई कामोत्तेजना नहीं है. और भारतीय क्रिकेट की राजनीति के संदर्भ में तो साफ़ तौर पर कहा जा सकता है कि लोग इसके लिए लालायित रहते हैं.

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मिसाल के तौर पर, हाल ही में दिवंगत बीसीसीआई प्रमुख जगमोहन डालमिया ने 75 साल की उम्र में भी अपनी महत्वाकांक्षाओं को ज़िंदा रखा था. यही नहीं, पूर्व अध्यक्ष शरद पवार भी एक बार फिर इस दौड़ में इसलिए शामिल नहीं हुए ताकि शशांक मनोहर के लिए रास्ता बनाया जा सके.

ये सब पेचीदा लग रहा है क्योंकि ये है. बीसीसीआई में भले ही अभी माहौल उनके ख़िलाफ़ चल रहा है, लेकिन श्रीनिवासन मान सकते हैं कि उनका भविष्य उतना अंधकारमय नहीं है, जितना कि अभी लग रहा है.

याद दिला दें कि पिछले एक साल में श्रीनिवासन को तीन बड़े झटके लगे. उन्हें बीसीसीआई अध्यक्ष का पद छोड़ना पड़ा, उनकी आईपीएल की फ्रेंचाइज़ी चेन्नई सुपर किंग्स निलंबित हो गई और फिर उन्हें आईसीसी चेयरमैन पद से भी हटा दिया गया.

क्रिकेट की दुनिया का सबसे ताक़तवर शख़्स इन दिनों संघर्ष कर रहा है. हालाँकि वो अब भी तमिलनाडु क्रिकेट संघ के अध्यक्ष हैं और इसीसे उनकी पुरानी ताक़त हासिल करने की उम्मीदें भी जुड़ी हुई हैं.

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जो बीसीसीआई की राजनीति को करीब से जानते हैं कि उन्हें पता होगा कि यहां कुछ भी संभव है. लेकिन अगर श्रीनिवासन अपने कार्यकाल के कुछ पन्ने को उलटने का समय निकालें तो उन्हें पता चलेगा कि अगर उन्होंने अपनी ताक़त का दुरुपयोग, घमंड और सीधे बैट से नहीं खेला होता तो हालात बिल्कुल अलग हो सकते थे.

आईपीएल के छठा संस्करण से पहले श्रीनिवासन का करियर बेदाग़ था और बेशक वे बीसीसीआई के सबसे प्रभावशाली प्रशासकों में से थे. 2003 में एक और उद्योगपति एसी मुथैया को 2003 में तमिलनाडु क्रिकेट संघ से हटाने के बाद श्रीनिवासन सफलता की सीढ़ियां चढ़ने लगे.

विडंबना है कि मुथैया ही श्रीनिवासन को क्रिकेट की राजनीति में लाए थे, लेकिन एक बार जब श्रीनिवासन ने क्रिकेट की सियासत मे क़दम रखा तो वे आगे बढ़ते ही गए.

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कई पदों पर रहने के बाद, 2011 में वो शशांक मनोहर के बाद बीसीसीआई प्रमुख बने. लेकिन इसके साथ ही डालमिया को हटाने वाली पवार, मनोहर, ललित मोदी और श्रीनिवासन की चौकड़ी में भी दरार पड़ने लगी.

आईपीएल के सूत्रधार ललित मोदी को 2010 में वित्तीय और प्रशासनिक गड़बड़ियों का आरोप लगाते हुए लीग और बीसीसीआई से बाहर कर दिया गया. उस वक़्त तक मनोहर और श्रीनिवासन साथ-साथ थे. पवार की मोदी के प्रति सहानुभूति ज़रूर थी, लेकिन उन्होंने ख़ुद को सिर्फ़ सलाह-मशविरे तक ही सीमित रखा.

मोदी के ख़िलाफ़ आरोप इतने गंभीर थे कि गिरफ़्तारी से बचने के लिए उन्हें विदेश भागना पड़ा. वहाँ से मोदी ने श्रीनिवासन के ख़िलाफ़ ख़ासकर अभियान चलाया और दावा किया कि श्रीनिवासन और चेन्नई सुपर किंग्स के हितों में टकराव का मामला है.

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हालाँकि इस तरह के आरोप श्रीनिवासन पर 2008 से ही लग रहे थे, जब उनकी कंपनी इंडिया सीमेंट ने फ्रेंचाइज़ी को ख़रीदा था. लेकिन वो ये मानते हुए निश्चिंत थे कि उन्हें या उनकी टीम को कोई नुक़सान नहीं हो सकता.

हालाँकि बीसीसीआई के नियमों में पहले ही ये प्रावधान था कि बोर्ड द्वारा आयोजित मैचों या स्पर्धाओं में बीसीसीआई के किसी अधिकारी का प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कोई हित जुड़ा हुआ नहीं होना चाहिए.

लेकिन श्रीनिवासन को फ्रेंचाइजी ख़रीदने का रास्ता देने के लिए 2008 में इस नियम में संशोधन कर दिया गया.

क्योंकि इस नियम को संशोधित करने में बीसीसीआई के शीर्ष पदाधिकारियों ने उनका साथ दिया था, इसलिए श्रीनिवासन मानने लगे कि उन्हें किसी तरह का कोई ख़तरा नहीं है. यही वजह है कि 2008 में टीम नीलामी के बाद जब ललित मोदी से हितों के टकराव की संभावनाओं पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा, “श्रीनिवासन टीम में सिर्फ़ एक हिस्सेदार हैं, टीम के मालिक नहीं. इसलिए यहाँ हितों के टकराव का मामला नहीं है.”

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श्रीनिवासन के लिए हालात तब बदलने लगे जब 2013 में स्पॉट फ़िक्सिंग का मामला सामने आया. उन्होंने सत्ता में बने रहने के लिए हर दांव आजमाया, पर इससे हालात सुधरने के बजाय और बिगड़ने लगे.

श्रीनिवासन के लिए सबसे बड़ा झटका था स्पॉट फ़िक्सिंग में उनके दामाद गुरुनाथ मयप्पन का नाम आना. सुप्रीम कोर्ट ने भी मयप्पन को इस दाग़ से बरी नहीं किया.

हालाँकि श्रीनिवासन ख़ुद भ्रष्टाचार के दोषी नहीं पाए गए, लेकिन आग उनके आंगन तक पहुँच गई थी और इतने सालों की मेहनत से उन्होंने अपने लिए जो महल बनाया उसे बर्बाद करने लगी थी.

श्रीनिवासन ने भारतीय क्रिकेट और खिलाड़ियों का कितना भला किया...आप पढ़ेंगे दूसरी और अंतिम कड़ी में.

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