'काश कुर्सी से चिपके नहीं होते श्रीनिवासन!'

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भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के पूर्व अध्यक्ष एन श्रीनिवासन आख़िर किस तरह के शख़्स हैं, उनके आलोचकों के साथ-साथ आम आदमी के लिए भी ये कौतूहल का विषय है.

मैं ये दावा तो नहीं कर सकता कि मैं उन्हें अच्छी तरह जानता हूँ, लेकिन पिछले कुछ सालों के उनके सफ़र को देखते हुए कह सकता हूँ कि वे विरोधाभासों से भरी शख़्सियत हैं.

बाहर से देखने पर वह चुप और शर्मीले लगते हैं. बहुत कम बोलते हैं और बातचीत को छोटा रखते हैं. कुल मिलाकर वित्त और मानव संसाधन के बेहद क्षमतावान प्रबंधक हैं.

उनकी कंपनी और फ्रेंचाइज़ी के लिए काम करने वाले कई लोग या बीसीसीआई के उनके सहयोगी प्रशासनिक मामलों को समझने और समस्याओं को सुलझाने की उनकी क्षमता से बेहद प्रभावित हैं.

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यह भी कि वे क्रिकेट की ज़रूरतों को लेकर बेहद धुनी हैं. उन्होंने क्रिकेट और खिलाड़ियों का निचले स्तर से लेकर ऊपर तक समर्थन किया. उनकी कंपनी ने युवा और बुजुर्ग खिलाड़ियों को रोज़गार दिया, ख़ासकर तब जब उनमें से कई बुरे दौर से गुज़र रहे थे.

मेरा श्रीनिवासन से सीधा-सीधा साबक़ा तब पड़ा जब बीसीसीआई ने मुझे 2011 और 2012 के प्रतिष्ठित सीके नायडू पुरस्कारों के लिए पैनल में आमंत्रित किया था.

श्रीनिवासन ख़ुद दूसरे कुछ लोगों के साथ इस पैनल में शामिल थे, इसके लिए वो पूरी तरह से तैयार होकर आते थे.

उनके पास पूरे तथ्य और वजहें होती थी कि कौन इस पुरस्कार के योग्य है. वह बहस करने के लिए तैयार रहते थे, लेकिन आपको अपने तर्कों से उन्हें संतुष्ट करना होता था कि आप कैसे सही हैं.

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मुझे याद है कि 2012 में मैंने उन्हें बताया था कि किस तरह से एक खिलाड़ी की सीके नायडू पुरस्कार के लिए उपेक्षा की गई थी. उन्होंने कुछ मिनट के लिए सोचा और पिछले विजेताओं की सूची पर नज़र दौड़ाई. फिर उन्होंने माना कि कुछ खिलाड़ियों के साथ पहले नाइंसाफ़ी हुई है.

ऐसे उपेक्षित क्रिकेटरों या उनके परिवारों, क्योंकि उनमें से कुछ का निधन हो चुका था, को नक़द पुरस्कार पाने वालों की सूची में शामिल किया गया.

साल 2012 में उन्होंने आईपीएल से हुए मुनाफ़े में पूर्व और वर्तमान खिलाड़ियों के लिए एकमुश्त राशि की घोषणा भी की.

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इससे बीसीसीआई के ख़ज़ाने पर क़रीब 100 करोड़ रुपए का बोझ पड़ा, लेकिन उनका तर्क था कि इस रक़म के बीसीसीआई के ख़ज़ाने में पड़े रहने से बेहतर है कि यह राशि खिलाड़ियो के बैंक खाते में जाए, जिन्होंने इसे कमाने में मदद की है.

आईपीएल में स्पॉट फ़िक्सिंग का मामला सुर्खियों में आने के बाद हालात अब अचानक बदल गए हैं. फिर जो कुछ हुआ उसे दोहराने का कोई फ़ायदा नहीं.

दूर से देखने पर साफ़ है कि ताक़त की हेकड़ी श्रीनिवासन के भारतीय क्रिकेट की सियासत से फिसलने की सबसे बड़ी वजह थी. इसके अलावा भी कुछ कारण थे, जिन्होंने उनकी फिसलन को बढ़ाया.

आईपीएल की टीम ख़रीदना हमेशा से ही हितों से टकराव से जुड़ा मामला था. इसे इस बात से नहीं झुठलाया जा सकता कि इस नियम को बदलने वालों में सिर्फ़ श्रीनिवासन ही नहीं, बल्कि बीसीसीआई के कई शीर्ष पदाधिकारी शामिल थे. श्रीनिवासन को पता होना चाहिए था कि बीसीसाआई में रिश्ते कितने नाजु़क होते हैं.

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श्रीनिवासन जैसे ही बोर्ड अध्यक्ष बने उन्हें आईपीएल में चल रही मैच और स्पॉट फ़िक्सिंग की सुगबुगाहट को ख़त्म कर देना चाहिए था.

आईपीएल की शुरुआत से ही इस पर फ़िक्सिंग का साया मंडरा रहा था. तरह-तरह की अफ़वाहें उड़ने लगी थीं. लेकिन बीसीसीआई ने ढुलमुल रवैया अपनाया.

श्रीनिवासन के पास इन्हें सुधारने का मौक़ा था, ख़ासकर 2012 में जब एक ख़बरिया चैनल ने स्टिंग ऑपरेशन किया था, लेकिन श्रीनिवासन ने इसकी अनदेखी की.

जब 2013 में स्पॉट फ़िक्सिंग का मामला सामने आया तो उन्हें इसकी पूरी ज़िम्मेदारी उठानी चाहिए थी, ख़ासकर तब जब उनके ख़ुद के दामाद सवालों के घेरे में थे.

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अगर वो तब बीसीसीआई से हट गए होते और इसकी निष्पक्ष जांच के आदेश दे दिए होते तो उन्हें किरकिरी नहीं झेलनी पड़ती.

बल्कि उन्हें बीसीसीआई में लोगों का समर्थन मिल रहा होता. कुर्सी से चिपके रहने का नतीजा ये हुआ कि न सिर्फ़ सार्वजनिक तौर पर बल्कि कोर्ट में भी उनकी छवि ख़राब हुई.

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