एक दिन मैं हरभजन के ख़िलाफ़ खेलूंगा: ईश

  • 21 मार्च 2016
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Image caption ईश सोढ़ी, न्यूज़ीलैंड क्रिकेट टीम के खिलाड़ी

वे लेग स्पिन गेंद डालते हैं, पर मैदान के बाहर उन्हें रैप करना पसंद है.

उनके ट्विटर हैंडल पर तो यही लिखा है. ट्विटर पर यह भी लिखा है कि वे खाने-पीने के शौक़ीन हैं. उन्हें मसालेदार खाना पसंद नहीं, पर वे पेस्ट्री समेत दूसरी चीज़ें खा लेते हैं.

ये हैं भारतीय मूल के 23 साल के क्रिकेट खिलाड़ी ईश सोढ़ी. वे न्यूज़ीलैंड की टीम से खेलते हैं. इस समय वे टी-20 वर्ल्ड कप खेलने भारत आए हुए हैं.

वे सिर्फ़ अपनी गेंदबाज़ी नहीं, बल्कि भारत की ज़मीन पर भारत के ख़िलाफ़ खेलने के लिए भी सुर्ख़ियों में हैं.

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उन्होंने कुछ दिन पहले ही भारत के चोटी के बल्लेबाज़ विराट कोहली को अपनी पहली ही गेंद पर चलता कर दिया था और अंत में अपनी टीम न्यूज़ीलैंड को जीत के रास्ते पर बढ़ा ले गए.

ईश सोढ़ी का जन्म लुधियाना शहर में हुआ था. तब उनका नाम इंदरबीर सिंह होता था. वे सिर्फ़ चार साल के थे, जब उनके माता-पिता देश छोड़ न्यूज़ीलैंड जा बसे थे.

ऑकलैंड शहर के पास भारतीय मूल के लोगों के उपनगर पापाटोएटोए में वे पले-बढ़े. उन्होंने क्रिकेट का सफ़र इसी उपनगर के पापाटोएटोए क्रिकेट क्लब से नौ साल की उम्र में शुरू किया था.

सोढ़ी कहते हैं, "मेरे जीवन में बड़ा मोड़ तब आया, जब मैं 12 साल का था."

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उनके कोच दीपक पटेल उन्हें हाविक पाखूरंगा उपनगर के क्रिकेट क्लिनिक ले गए और उन्हें स्पिन गेंदबाज़ी के गुर सिखाए. दुबले-पतले लंबे छरहरे किशोर को यह काफ़ी अच्छा लगा.

सोढ़ी याद करते हैं, "यह मुझे सबसे स्वाभाविक काम लगा. यह बिल्कुल अलग क़िस्म का काम था और इसे करना सबसे आरामदायक भी था. मुझे तुरंत इसके प्रति लगाव हो गया."

इसी समय उनके भीतर का भारतीय भी जगने लगा था. उनके पसंदीदा खिलाड़ी अनिल कुंबले और शेन वॉर्न थे.

उन्होंने कहा, "मैं कुंबले का खेल देखते हुए बड़ा हुआ. मुझे आज भी वह दिन याद है, जब उन्होंने एक इनिंग्स में 10 विकेट लिए थे."

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वे आगे जोड़ते हैं, "न्यूज़ीलैंड में पिच अमूमन सपाट होते हैं और साफ़ गेंदबाज़ी को ध्यान में रखकर तैयार किए जाते हैं. ये पिच लेग स्पिनर्स के लिए बहुत मददगार नहीं होते."

अपने पसंदीदा मौजूदा भारतीय खिलाड़ियों के बारे में सोढ़ी ने कहा, "भारतीय बल्लेबाज़ हमेशा ही अच्छे और चुनौतीपूर्ण होते हैं. यह भारतीय क्रिकेट ही था, जिसे बचपन में देखकर मैं इस खेल से प्रेम करने लगा."

वे थोड़ा रुककर कहते हैं, "मैं हरभजन सिंह के ख़िलाफ़ खेलना पसंद करूंगा. मुझे उम्मीद है कि यह मौका ज़रूर मिलेगा. यह मज़ेदार रहेगा."

जब सोढ़ी 15 साल के थे, वे पैपाटोटो क्लब के मौजूदा कोच साइमन पॉल से प्रशिक्षण लेने लगे.

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Image caption हरभजन सिंह के ख़िलाफ़ खेलना चाहते हैं ईश सोढ़ी

पॉल सोढ़ी को बल्लेबाज़ के बजाय गेंदबाज़ के रूप में याद करते हैं. उस उम्र के खिलाड़ी ऐसे ही होते हैं, पर साइमन को सोढ़ी के गाना गाने की क़ाबिलियत आज भी अच्छी तरह याद है.

वे कहते हैं, "आप उन्हें पिछले 30 साल का कोई भी गाना गाने को कहें और वे गाएंगे. रेट्रो से लेकर ब्लूज़ और पॉप तक, वे हर क़िस्म के गाने की जानकारी रखते हैं और उनकी आवाज़ भी अच्छी है."

लेकिन सोढ़ी कहते हैं कि वे पॉल की गाड़ी की पिछली सीट पर सफ़र करते हुए अस्सी के दशक के गाने सुनते थे और यहीं से गाना सीखा.

क्या किशोर उम्र में बॉलीवुड के संगीत ने उन पर कोई प्रभाव छोड़ा?

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सोढ़ी कहते हैं, "मेरी मां और दीदी सीरत घर पर बॉलीवुड फ़िल्में देखा करती थीं. मैं उनके बगल से गुज़रता हुआ कुछ दृश्य देख लेता था, कुछ गाने सुन लेता था. पर दरअसल मुझे पश्चिमी संगीत पसंद है."

जिस समय वे क्रिकेट नहीं खेलते, उस समय क्या करते हैं? बकौल सोढ़ी, "दोस्तों के साथ मछली पकड़ता हूँ, गाने सुनता हूँ. न्यूज़ीलैंड के अद्भुत समुद्र तट मछली पकड़ने के लिए सबसे अच्छे हैं."

क्रिकेट के बाद मछली पकड़ना उनका सबसे प्रिय शौक़ है.

सोढ़ी के परिवार में खेल को पेशे के रूप में अपनाने के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था. उनके पिता राज सोढ़ी डॉक्टर और मां सिमरत सोढ़ी शिक्षक हैं.

अपने माता-पिता को खेल देखने उनके क्लब में आना उन्हें याद है. वे कहते हैं, "वे मेरे खेल से जुड़े हुए नहीं थे, पर उन्होंने हमेशा मेरा साथ दिया. मेरी मां मेरा खेल देखने आया करती थीं."

अपने परिवार के बारे में सोढ़ी बताते हैं, "कोई दूसरा पेशा चुनने का कोई दवाब मेरे परिवार ने मुझ पर नहीं डाला. यह सौ फ़ीसदी मेरा फ़ैसला था कि मुझे क्या करना है."

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बीबीसी से बातचीत में वह कहते हैं, "मैं न्यूज़ीलैंड के बहुसांस्कृतिक समाज में पला-बढ़ा. भारतीय मूल का होने से मुझे किसी चुनौती का सामना नहीं करना पड़ा. मैं ख़ुद को भाग्यशाली समझता हूँ."

सोढ़ी न्यूज़ीलैंड के भारतीय मूल के युवा वर्ग से कहते हैं कि वे किसी की नक़ल न करें और वही करेें जो वे सबसे अच्छे तरीक़े से कर सकते हैं.

वह कहते हैं, "भारतीय होने पर मुझे गौरव है. पर जैसे-जैसे मेरी उम्र बढ़ी है, मुझे इसका अहसास हुआ कि मैं भारतीय से ज़्यादा कीवी (न्यूज़ीलैंडवासी) हूँ. यह मेरे लिए बड़ी उपलब्धि है कि मैं अपने देश के लिए कुछ कर सका हूँ और वह भी भारत में. पर मुझे अभी बहुत आगे जाना है."

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