सचिन से पहले दोहरा शतक बनाने वाली क्रिकेटर

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क्या आप जानते हैं कि वनडे क्रिकेट में सबसे पहला दोहरा शतक किसने लगाया था? बहुतों का जवाब होगा, सचिन तेंदुलकर.

सचिन तेंदुलकर ने 2010 में वनडे मैच में 200 रन बनाए थे. यही नहीं, वीरेंदर सहवाग, रोहित शर्मा (दो बार), मार्टिन गप्टिल और क्रिस गेल ये कारनामा कर चुके हैं.

लेकिन हक़ीक़त ये है कि वनडे क्रिकेट में सबसे पहला दोहरा शतक किसी पुरुष खिलाड़ी ने नहीं बल्कि एक महिला खिलाड़ी ने लगाया था.

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ऑस्ट्रेलिया की बेलिंडा क्लार्क ने 1997 में हुए विश्व कप में भारत में नाबाद 229 रन बनाए थे.

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ये रिकॉर्ड बताता है कि महिला क्रिकेट खिलाड़ियों को लेकर जागरूकता और टीवी कवरेज अभी काफ़ी कम है.

महिला खिलाड़ियों को किन मुश्किलों का सामना करना पड़ता है इसकी मिसाल हैं भारत की पूर्व क्रिकेटर डायना एडुलजी. डायना 80 के दशक में भारत की स्टार खिलाड़ी थीं.

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डायना बताती हैं, "भारतीय टीम को वर्ल्ड कप के लिए न्यूज़ीलैंड जाना था. महिला खिलाड़ियों को ख़ुद से 10 हज़ार रुपए देने थे. महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री एंतुले ने कुछ खिलाड़ियों को चेक दिए तब जाकर हम वर्ल्ड कप में जा सके. फ़ीस तो मिलती ही नहीं थी."

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उन्होंने बताया, "मैदान पर पुरुष खिलाड़ी मज़ाक़ अकसर उड़ाते थे. मैच के लिए हम बिना रिज़र्वेशन के रेलवे में सफ़र करते थे, कई बार ज़मीन पर सोते थे."

तब से हालात तो बदले हैं लेकिन चुनौतियाँ बरक़रार हैं. अलमोड़ा की रहने वाली भारत की युवा गेंदबाज़ एकता बिष्ट वर्ल्ड कप टीम का हिस्सा हैं.

वे बताती हैं, "बचपन में गली मोहल्ले में ही खेलती थी. फिर बाद में मैं ग्राउंड पर जाने लगी तो लड़के कमेंट पास करते थे. लेकिन मेरे कोच लियाक़त अली ख़ान ने मुझसे कहा कि इन लोगों की मत सुनो. जब कुमाऊँ यूनिवर्सिटी की टीम खेलती थी, तो टीम में लड़कों के साथ मैं भी टीम का हिस्सा होती थी. लड़कों का विकेट लेकर अच्छा लगता था. जब मैं किसी लड़के का विकेट लेती थी, तो सब उसे चिढ़ाते थे कि देख लड़की ने आउट कर दिया."

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भारतीय महिला टीम ने अपना पहला टेस्ट मैच 1976 में वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ खेला था जबकि पहला वनडे मैच 1978 में भारत में ही खेला.

इसाबेल डंकन की किताब स्कर्टिंग द बाउंडरी- ए हिस्ट्री ऑफ़ वुमेन्स क्रिकेट में महिला क्रिकेट के उतार-चढ़ाव के बारे में दिलचस्प क़िस्से हैं. किताब में बताया गया है कि कैसे 50 के दशक में आज़ाद भारत में महिलाएँ भी बड़े शहरों में खेलने लगीं.

1969 में मुंबई का पहला महिला क्रिकेट क्लब बना, जिसमें सुनील गवास्कर की बहन नूतन गवास्कर भी आती थीं. 70-80 के दशक में डायना एडुलजी, शांता रंगास्वामी और संध्या अग्रवाल जैसी महिला क्रिकेटरों ने ख़ूब नाम कमाया.

उस दौरान पत्रिका धर्मयुग ने इन महिला क्रिकेटरों को कवर पेज पर जगह दी थी. हालांकि तब महिला खिलाड़ियों की हालत बहुत बेहतर नहीं थी.

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1973 मेें वुमेन क्रिकेट एसोसिएशन बनी, जो बीसीसीआई के तहत नहीं थी. लेकिन 2006 में आईसीसी के निर्देश के बाद इसे बीसीसीआई में मिला दिया गया.

उसके बाद से भारत में महिला क्रिकेट में कुछ बदलाव आए हैं. पुरुषों के बड़े मुक़ाबलों से पहले उसी वेन्यू पर महिलाओं के मैच होने से उन्हें लेकर जागरूकता बढ़ी है.

भारत की महिला टीम की बात करें, तो इन दिनों वो ज़बरदस्त फ़़ॉर्म में चल रही है. इस साल जहाँ ऑस्ट्रेलिया में भारत की पुरुष टीम ने एतिहासिक जीत दर्ज की, तो महिला टीम ने भी ऑस्ट्रेलिया को टी-20 सिरीज़ में मात देकर इतिहास रचा. फिर फ़रवरी में घरेलू मैदान पर श्रीलंका को टी-20 और वनडे सिरीज़ में धो डाला.

वरिष्ठ पत्रकार सुनंदन लेले कहते हैं, "बीसीसीआई ने महिला क्रिकेट के लिए क़दम तो उठाए हैं, लेकिन देर से. टॉप पुरुष खिलाड़ी को अगर 100 रुपए फ़ीस मिलती है तो महिलाओं को 10 या 15 रुपए. आपको देखना होगा कि अगर राँची से उठकर धोनी क्रिकेट में छा गए, तो ऑस्ट्रेलिया में सांगली जैसे छोटे गाँव से आई खिलाड़ी मंदाना ने अपने दम पर मैच जितवा दिया. महिला क्रिकेट को स्कूल स्तर से ही बढ़ावा देने की ज़रूरत है."

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हर बार की तरह विश्व टी-20 वर्ल्ड कप में पुरुष और महिला की फ़ीस में अंतर है. आईसीसी के मुताबिक़ पुरुष प्रतियोगिता का कुल प्राइज़ 56 लाख डॉलर होगा, वहीं महिलाओं की प्रतियोगिता का कुल इनाम चार लाख डॉलर होगा.

ज़ाहिर है महिला और पुरुष क्रिकेट में लेवल प्लेइंग फ़ील्ड जैसी स्थिति अभी कोसों दूर है.

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