एक करिश्माई क्रिकेट आवाज़ का गुम होना

टॉनी कोज़ियर

वेस्टइंडीज़ क्रिकेट ही नहीं बल्कि क्रिकेट की दुनिया के अज़ीम कमेंटेटरों में शुमार टोनी कोज़ियर का बुधवार को 75 साल की उम्र में बारबेडस में निधन हो गया. दो मई, को गले के संक्रमण के चलते उन्हें अस्पताल में दाख़िल कराया गया, जहां से वे वापस नहीं लौटे.

लेकिन कोज़ियर की आवाज़, क्रिकेट की तकनीकी जानकारी और ख़ास कैरेबियाई अंदाज़ लोगों के ज़ेहन में हमेशा बने रहेंगे. क़रीब छह दशक के लंबे समय अंतराल में कोज़ियर ने कम से कम 300 टेस्ट मैचों को देखा था और उसकी रिपोर्टिंग की.

कभी प्रिंट मीडिया के पत्रकार के तौर पर कभी रेडियो ब्रॉडकास्टर के तौर पर कभी टीवी कमेंटेटर के तौर पर. बिना टेस्ट खेले वे क्रिकेट के सबसे सम्मानित एक्सपर्ट में अपनी जगह बनाने में कामयाब हुए.

लेकिन कोज़ियर की जिस बात की सबसे ज़्यादा तारीफ़ होती है वो उनकी रेडियो ब्रॉडकॉस्टिंग की शैली थी. क्रिकेट की कमेंट्री को जानदार बनाने वाले कुछ चुनिंदा कमेंटेटरों में उनका नाम गिना जाता है.

क्रिकेट से कोज़ियर का जुड़ाव आठ साल की उम्र में हुआ था. जब उनके पिता ने आठवें जन्मदिन के मौक़े पर उन्हें विज़डन ईयर बुक तोहफ़े में दी थी. पिता कैरिबियाई द्वीप सेंट लूसिया से निकलने वाले छोटे से अख़बार वाइस ऑफ़ सेंट लूसिया के संपादक थे.

वे ख़ुद क्रिकेट पत्रकार रह चुके थे और 1950 में जब वेस्टइंडीज़ ने पहली बार इंग्लैंड को उनके मैदान पर हराया था, तब वे उसे कवर करने वाले कैरेबियाई पत्रकार थे. तो बेटे पर भी असर होना ही था. 14 साल की उम्र में ही स्कूली पढ़ाई के दौरान कोज़ियर अपने पिता के अख़बार के लिए रिपोर्टिंग करने लगे.

बाद में पिता बारबेडस के एक अख़बार के संपादक हो गए तो कोज़ियर बारबेडस पहुंच गए, जो कैरिबियाई क्रिकेट का गढ़ रहा है. बारबेडस में क्रिकेट की तकनीक से जुड़ी उनकी समझ बेहतर हुई और उभरते हुए क्रिकेटरों से दोस्ती भी हुई.

वेस्ली हाल, गैरी सोबर्स और क्लाइव लायड जैसे क्रिकेटरों से उनकी दोस्ती यहीं से शुरू हुई और इसका फ़ायदा उन्हें अपने पेशेवर करियर में हमेशा मिला. बहरहाल बेहद कम उम्र में त्रिनिडाड के रेडियो 610 से उन्हें काम करने का मौक़ा मिलने लगा.

लेकिन तब क्रिकेट की कमेंट्री और रिपोर्टिंग इतनी आसान भी नहीं थी. 1963 में जब वेस्टइंडीज़ की टीम इंग्लैंड का दौरा कर रही थी, तब उनके पिता के अख़बार बारबेडस डेली न्यूज़ के पास बजट नहीं था कि कोज़ियर रिपोर्टिंग के लिए जा सकें. ऐसे में वे ख़ुद अपने पैसे से रिर्पोटिंग करने निकले. स्कूली दिनों में पढ़ने वाले कई साथी इंग्लैंड के कॉलेजों में पढ़ रहे थे और उन सबके यहां रहते हुए कोज़ियर ने ये असाइनमेंट पूरे किए.

इसी दौरान कोज़ियर बीबीसी से जुड़े. उनके पिता के एक दोस्त बीबीसी के कैरिबियन सर्विस में काम करते थे, कोज़ियर उनसे मिले और उन्हें पार्ट टाइम कुछ काम करने का मौक़ा मिल गया.

इमेज कॉपीरइट

इस शुरुआत के बाद कोज़ियर ज़िंदगी भर के लिए फ्रीलांसर पत्रकार बन गए. वेस्टइंडीज़ के तमाम दौरों पर उन्हें जिस अख़बार ने लेख लिखने को कहा उसके लिए लेख लिखने लगे, जिस रेडियो ने कमेंट्री करने को कहा, उसके साथ जुड़े और जिस टीवी चैनल से अनुबंध मिला, उसके लिए काम किया. इसके चलते उनके काम करने का दायरा लगातार बढ़ता गया.

वे बाद में बीबीसी, चैनल 9 और स्काई स्पोर्ट्स के क्रिकेट पैनल के नियमित सदस्य बन गए. वेस्टइंडीज़ क्रिकेट एनूयल का उन्होंने 1970 से 1991 तक लगातार संपादन किया, बाद में वित्तीय संकट के चलते इसका प्रकाशन थम गया.

1978 में उन्होंने वेस्टइंडीज क्रिकेट के सुनहरे दौर पर द वेस्टइंडीज़- 50 ईयर्स ऑफ़ टेस्ट क्रिकेट की बहुचर्चित किताब लिखी. इस दौरान उन्होंने भारत के ऑल इंडिया रेडियो के लिए भी क्रिकेट कमेंट्री की. उन्हें वेस्टइंडीज़ में भारत और भारतीय क्रिकेट के दोस्त के तौर पर देखा जाता रहा.

कई लोगों को तो सालों तक यक़ीन नहीं होता था कि कोज़ियर श्वेत थे, लेकिन उनका दिल पूरी तरह से कैरेबियाई गोल्ड ही था.

कोज़ियर ने एक ब्रिटिश अख़बार हफिंगटन पोस्ट को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, ''दुनिया उन्हें केवल इस बात के लिए याद रखे कि उन्होंने अपनी क्षमता के मुताबिक पूरी ईमानदारी से वेस्टइंडीज़ क्रिकेट के इतिहास को देखा और संजोया.'' अलविदा कोज़ियर.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार