हर किसी ने माना है 'क्रिकेटर कुंबले' का लोहा

  • 23 जून 2016
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भारत के सबसे कामयाब गेंदबाज़ अनिल कुंबले के कंधों पर अब नई जिम्मेदारी है. ये ज़िम्मेदारी है भारतीय क्रिकेटर को संवारने की और नई ऊंचाइयों पर ले जाने की.

बीसीसीआई को लगता है कि अनिल कुंबले इस ज़िम्मेदारी के लिए सबसे उपयुक्त शख्स हैं.

क्रिकेट के प्रति उनकी प्रतिबद्धता की एक झलक दुनिया ने 14 साल पहले तब देखी थी, जब एंटिगा में टूटे हुए जबड़े के साथ वे गेंदबाज़ी करने उतरे थे. उन्होंने न केवल 14 ओवर की लगातार गेंदबाज़ी की बल्कि ब्रायन लारा को पवेलियन भी भेजा.

दरअसल, इस टेस्ट में मर्व ढिल्लन की गेंद कुंबले के जबड़े पर लगी थी और उसके बाद भी वे 20 मिनट तक बल्लेबाज़ी करते रहे. बाद में जबड़े में बैंडेज लगाकर गेंदबाज़ी की. वे चाहते तो पवेलियन में बैठ सकते थे. लेकिन उन्हें ये मंजूर नहीं था.

मैदान से बाहर आने के कुछ ही घंटे बाद उन्हें बंगलौर की उड़ान पकड़नी पड़ी, जबड़े की सर्जरी के लिए. लेकिन उनकी प्रतिबद्धता को देखकर विवियन रिचर्ड्स ने तब कहा था, खेल के मैदान पर इससे ज़्यादा बहादुरी की मिसाल मैंने नहीं देखी.

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यह एक वाकया बताता है कि कुंबले किस मिट्टी के बने हैं. हालांकि इससे तीन साल पहले फिरोजशाह कोटला के मैदान पर पाकिस्तान के खिलाफ एक पारी में सभी 10 विकेट चटकाकर वे इतिहास में अपना नाम दर्ज करा चुके थे. सहज सुलभ और आम भारतीय मिडिल क्लास के नौजवान की तरह दिखने वाले अनिल कुंबले 1990 में टीम इंडिया में शामिल हुए.

इसके बाद अगले 18 साल तक भारतीय गेंदबाज़ी की कमान उनके मज़बूत कंधों पर रही. 132 टेस्ट में 619 विकेट और 271 वनडे में 337 विकेटों के इस सफ़र के दौरान समय के साथ अनिल कुंबले भी बदले.

आंखों पर चश्मा और मूंछों वाले कुंबले कांटैक्ट लैंस वाले स्मार्ट क्रिकेटर के तौर पर बदले. लेकिन एक गेंदबाज़ के तौर पर विकेट झटकने की उनकी भूख कभी कम नहीं हुई.

उनके आलोचक उन्हें विशुद्ध रूप से स्पिन गेंदबाज़ मानने से इनकार करते रहे, लेकिन ये कुंबले ही थी जो लेगब्रेक के साथ साथ तेज़ गुगली का बेहतरीन इस्तेमाल करके सालों साल तक विकेट चटकाते रहे.

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उनके स्पिन गेंदबाज़ होने पर भले सवाल हों, लेकिन उनके मैच जिताऊ गेंदबाज़ होने पर किसी को संदेह नहीं रहा. करियर के आखिरी दिनों में उन्हें टीम इंडिया की कप्तानी करने का मौका भी मिला. उन्हें 2005 में पद्मश्री और 1995 में अर्जुन पुरस्कार मिल चुका है.

2008 में क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद भी उनका जुड़ाव क्रिकेट से बना रहा. 2010 में वे कर्नाटक क्रिकेट संघ के अध्यक्ष बने. जबकि 2012 में इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल की आईसीसी क्रिकेट समिति के चेयरमैन बनाए. उन्हें क्रिकेट में सुलझे दिमाग वाला क्रिकेटर माना जाता है. अब 46 साल की उम्र में वे भारतीय टीम के हेड कोच बनाए गए हैं.

वैसे कुंबले का निक नेम जंबो है. एक स्पिन गेंदबाज़ के तौर पर जंबो जेट जैसी तेजी वाली गेंद फेंकने के चलते उनका नाम जंबो नहीं पड़ा था, बल्कि अपने लंबे पैरों की वजह से कुंबले अपने साथियों के बीच जंबो नाम से मशहूर हैं. अब उनपर एक जंबो जिम्मेदारी है.

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