तीरंदाज़ मंगल सिंह नहीं जाएंगे रियो

  • 27 जून 2016

तीरंदाज़ मंगल सिंह चाम्पिया रियो ओलंपिक में नहीं जा पाएंगे. दूसरे ट्रायल में फेल हो जाने के बाद, अब उनकी जगह अतानु दास को भेजा जाएगा.

झारखंड के तीरंदाज़ मंगल सिंह चाम्पिया ने दस महीने पहले हुए ट्रायल में क्वाालिफाई कर इस इवेंट में भारत की जगह पक्की की थी.

अर्जुन अवार्ड विजेता मंगल सिंह को मलाल है कि वो रियो ओलंपिक में भाग नहीं ले पाएंगे.

फ़ेडरेशन के दोबारा ट्रायल कराने के फैसले पर हैरानी जताते हुए उन्होने बीबीसी से कहा "हमें नहीं पता ऐसा क्यों किया गया. मेरी तबियत ख़राब थी. मैं मन एकाग्र नहीं कर पा रहा था. इसके बावजूद मैंने दोबारा ट्रायल के लिए हामी भरी क्योंकि लोग कहते कि मैं ट्रायल फ़ेस नहीं करना चाहता.''

इससे पहले 74 वर्ग किलोग्राम में क्वालीफाई करने के मुद्दे पर सुशील कुमार हाई कोर्ट गए थे और उन्होनें क्वॉलिफाई करने वाले नरसिंह यादव के ख़िलाफ़ ट्रॉयल कराने की मांग करते हुए याचिका दाख़िल की थी.

लेकिन एक बार क्वालीफाई कर चुके नरसिंह के ख़िलाफ दोबारा ट्रायल की मांग को कोर्ट ने भी नहीं माना.

मंगल सिंह के मामले पर पर आर्चरी एसोसिएशन आफ इंडिया (एएआइ) के जेनरल सेक्रेटरी अनिल कमिनेनी ने बीबीसी से कहा- ''यह सच है कि मंगल सिंह चाम्पिया का चयन रियो के लिए 10 महीने पहले हुआ था. लेकिन, दिसंबर 2015 में चेन्नई में संपन्न एसोसिएशन की बैठक के दौरान तय किया गया कि व्यक्तिगत स्पर्धा के लिए अलग से ट्रायल होगा. हमने उसी निर्णय के तहत उनका दोबारा ट्रायल कराया.''

ओलंपिक में चयन की प्रक्रिया पर वो बोले, ''अलग-अलग देशों में अलग-अलग प्रक्रिया है. हमें अपना बेस्ट खिलाड़ी भेजना था."

एएआइ के कार्यकारी अध्यक्ष सरदार त्रिलोचन सिंह ने बीबीसी से कहा, ''मंगल सिंह चाम्पिया का ट्रायल बहुत पहले हुआ था. लिहाज़ा, ज़रुरी था कि दोबारा ट्रायल हो. हमारी नज़र मेडल पर है, किसी इंडिविजुअल पर नहीं.''

वहीं दूसरी ओर तीरंदाज़ी के पूर्व नेशनल कोच हरेंद्र सिंह ने कहा है कि भारतीय तीरंदाज़ी के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि सेलेक्शन के बाद किसी को ट्रायल देना पड़े, यह दुखद है.

मंगल सिंह चाम्पिया झारखंड के अति पिछड़े पश्चिम सिंहभूम जिले के झींकपानी के हैं.

मंगल सिंह ने कहा ''हम राजनीति तो नहीं जानते. इतना पता है कि अगर दूसरे राज्य में होते तो सरकार पूरा दम लगा देती. टाटा स्टील से जुड़े होते तो उनके लोग भी दम लगा देते. लेकिन आदिवासियों के लिए बने झारखंड में मुझे उचित सपोर्ट नहीं मिला.''

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