ज़िंदगी के लिए तैर कर पहुंची ओलंपिक

  • 3 अगस्त 2016
यूसरा मर्दीनी

कुछ ही लोग ऐसे होंगे जिनके पदचिह्नों पर आप नहीं चलना चाहेंगे, जिनके जूतों में आप अपने पैर नहीं डालना चाहेंगे.

फिर भी हम उनके चरित्र, उनकी शक्ति, उनके दृढ़ संकल्प और उनके साहस को अपनी ज़िन्दगी में अपनाना चाहेंगे. ऐसे ही लोगों से हम सीखते हैं कि मानवीयता का सबसे ख़राब पहलू आपके अंदर की इंसानियत को बाहर ला सकती है.

युसरा मर्दीनी किसी भी साधारण टीनेजर की ही तरह थीं. हाथ में स्मार्टफोन, दोस्तों से गप्प लड़ाना और खूब हंसना.

तीन बहनों में मंझली युसरा अपने माता-पिता के साथ रहती थीं. वो जिमनास्टिक्स क्लब जातीं और तैराकी से बेहद प्रेम करती थीं.

वो एक बेहतरीन तैराक बन सकती थीं. फिर भी उनकी एक आम ज़िन्दगी थी, शायद जिसके बारे में कोई पत्रकार लिखना नहीं चाहे.

फिर आया सीरिया का गृहयुद्ध, संघर्ष के दौरान निर्दयता, बमों के साथ, तक़लीफें, और मौत.

हंसी-मज़ाक अब सामान्य नहीं रहा था और जैसे-जैसे साल बीतते गए - एक के दो, तीन के चार - घर किसी नरक से कम नहीं रहा. देश बर्बाद हो गया.

वो जीवित थीं लेकिन जी नहीं रही थीं. उनके घर में भी आग लग गई और परिवार को वहां से भागना पड़ा.

सीरिया की राजधानी दमिश्क के जिस स्विमिंग पूल में वो ट्रेनिंग लेती थीं उसकी छत बम से उड़ गई थी. वो पानी देख सकती थीं, लेकिन अब उसके अंदर नहीं जा सकती थीं. ये किसी अत्याचार से कम नहीं था.

18 साल की युसरा मर्दीनी ने बताया, "मैं इसे और नहीं सह पा रही थी."

एक तैराकी कोच की बेटी मर्दीनी के पास दो विकल्प थे, बिना उम्मीद के अपने देश में रहना या आज़ादी के लिए भागना ताकि सपने देख सकें.

उन्होंने बताया, "शायद मैं रास्ते में मर जाती, लेकिन अपने देश में मैं करीब-करीब मर ही चुकी थी. मैं कुछ नहीं कर सकती थी."

अज्ञात की तरफ यात्रा

12 अगस्त, 2015, सीरिया में गृहयुद्ध शुरू हुए साढ़े चार साल हो गए थे. ये वो दिन था जब मर्दीनी ने अपनी बड़ी बहन सारा के साथ सीरिया छोड़ा था, पिता के दो कज़न्स और दूसरे शरणार्थियों के साथ.

दोनों अपने रोते हुए माता-पिता और छोटी बहन को अलविदा कहकर निकल पड़ीं, जिन्होंने उनकी यात्रा पर जीपीएस के ज़रिए नज़र रखी.

सीरिया से वो अपने पहले पड़ाव बेरूत पहुंचीं जहां से और 25 दिनों तक उन्हें आगे बढ़ना था.

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शरणार्थियों का ये समूह जानता था कि उन्हें क्या करना था, उन्हें अपने जैसे 40 लाख देशवासियों की राह पर ही चलना था.

किसी को पता नहीं था कि सीरिया के गृहयुद्ध में कितने लोगों की मौत हो चुकी थी. 2014 में जब मरने वालों की संख्या 2 लाख 50 हज़ार पार कर गई थी तब संयुक्त राष्ट्र ने आंकड़े इकट्ठा करना बंद कर दिया था.

हाल की रिपोर्टें बताती हैं कि ये संख्या दोगुनी हो गई है. देश के 11.5 फ़ीसदी जनसंख्या की मौत हो गई है या वो घायल हैं.

ज़िन्दगी जीने की संभावना जो 2010 में 70 फ़ीसदी थी वो 2015 तक 55.4 रह गई.

मर्दीनी ने बीबीसी को बताया, "मैं अपनी और अपनी बहन की ज़िन्दगी को लेकर बेहद डरी हुई थी. मुझे इस बात का भी डर सता रहा था कि कहीं मैं पहुंच गई और मेरी बहन को कुछ हो गया या हममें से किसी एक के साथ कुछ हो गया तो मेरी मां पर क्या बीतती."

डर और बढ़ गया जब वो दक्षिण तुर्की की ऊंची चोटी और गहरी घाटियों तक पहुंचे.

उन लोगों ने चार रातें एक जंगल में बिताईं, जो बंदूकधारियों का ठिकाना था. वहां न तो खाना था और न ही पानी.

उनका भविष्य बंदूकधारी तस्करों के हाथों में था, इन्हीं तस्करों में से एक विवाद और धमकी के बाद शरणार्थियों को अच्छी-खासी रकम के एवज़ में भूमध्यसागर पार कराकर ग्रीस ले जाने के लिए तैयार हो गया.

ज़िन्दगी के लिए तैरना

दोनों बहनें गहरे पानी में थीं. लहरें उनसे टकरा रही थीं, खारा पानी उनकी आंखों को जला रहा थी. हर स्ट्रोक एक संघर्ष था.

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जो तैराकी भविष्य में एक दिन उनकी ज़िन्दगी बदलने वाली साबित होने वाली थी, वही तैराकी उनके बचने का सहारा थी.

लेसबास द्वीप के लिए रवाना हुए अभी 30 ही मिनट हुए थे कि 20 यात्रियों से भरी कश्ती का इंजन रुक गया. ये कश्ती एक बार में छह से सात लोगों को ही ले जाने की क्षमता रखती थी.

नाव में पानी घुस आया, सामान पानी में गिरा दिया गया. भगदड़ मच गई. नाव को हल्का करना था नहीं तो वो डूब जाती.

तीन साल की उम्र से तैराकी सीख रही मर्दीनी ने बताया, "मैंने सोचा कि समुद्र में डूब जाना मेरे लिए शर्म की बात होती क्योंकि मैं एक तैराक हूं."

कुछ शरणार्थी तैर सकते थे, तो पहले सारा कूद गईं और अपनी बहन की इच्छाओं के विरुद्ध युसरा उनके पीछे कूदीं.

अगले साढ़े तीन घंटे वो और एक अन्य युवा महिला ने टूटी नाव को एक रस्सी के सहारे तट की ओर खींचा.

तट आने के तीस मिनट पहले ही वो थक गए, वो और तैर नहीं पा रहे थे. इस दिन के बाद से मर्दीनी खुले पानी से नफ़रत करने लगीं.

उन्होंने बताया, "रास्ते में सभी हताश थे. ये ऐसे था मानो मेरी आंखों के सामने से मेरी ज़िन्दगी गुज़र रही हो. हम लोगों ने अपने हाथों में रस्सी बांध रखी थी क्योंकि मैं भी समुद्र में ऐसी लहरों के बीच तैर नहीं सकती थी."

"मैं और मेरी बहन नाव को पकड़े हुए थे और दूसरे हाथ और एक पैर से ब्रेस्टस्ट्रोक कर रहे थे. आखिरी के आधे घंटे मैं पूरी तरह थक चुकी थी. इसलिए मैं नाव में वापिस चली गई. पानी कितना ठंडा था. मैं अब जब भी समुद्र की तरफ़ देखती हूं तो मुझे बेहोशी सी महसूस होती है."

कांपते हुए तट पर पहुंचने के बाद वो सीधे ज़मीन पर गिर पड़ीं. फिर उन्होंने प्रार्थना की.

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1000 मील की यात्रा को पूरा किया

मर्दीनी ने बताया, "जब हम ग्रीस पहुंचे हमने एक रेस्तरां देखा. हम खाना खरीदना चाहते थे लेकिन उन लोगों ने कहा नहीं, उन लोगों को लगा कि हम उनसे चोरी करने जा रहे थे. हम लोगों ने कहा कि हमारे पास पैसे थे और वो हमें पीने के लिए कुछ दें."

मर्दीनी भूखी और प्यासी थीं. उनके पास जूते नहीं थे. केवल भीगी हुई जीन्स और टी-शर्ट.

उन्होंने अपने पासपोर्ट, मोबाइल फ़ोन और पैसे एक वॉटरप्रूफ़ बैग में लपेटकर रखे थे, किसी तरह सब बच गया.

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उन्होंने बताया, "आखिरकार उन लोगों ने हमें पानी खरीदने दिया और फिर किसी लड़की ने हमें देखा, उन्होंने मुझे जूते दिए और छोटे बच्चों की पतलून दी."

"बहुत से लोगों को लगता है कि शरणार्थियों के पास घर नहीं था, कि उनके पास कुछ भी नहीं था. कभी-कभी वो मेरे पास आईफ़ोन देखकर चौंक जाते थे. उन्हें लगता था कि हम किसी रेगिस्तान में रहते थे. पर नहीं, हमारे पास तुम्हारी तरह सब कुछ था."

यहां से हम सब ने 1000 मील की यात्रा शुरू की जर्मनी के लिए.

ग्रीस से उन लोगों ने मेसिडोनिया, सर्बिया, हंगरी और ऑस्ट्रिया का सफ़र पैदल, ट्रेन और बस से पूरा कर म्यूनिख शहर पहुंचे जहां से बर्लिन गए. वो बच गए थे.

25 दिनों की जद्दोजहद के बाद एक बार फिर उम्मीद जागी. मर्दीनी ने बताया, "मैं सिर्फ़ जानती थी कि मेरी यात्रा पूरी हो गई थी और मैं अब शांति में थी."

जर्मनी में शरणार्थी शिविर मर्दीनी का पहला अस्थाई घर बना. दोनों बहनों ने बर्लिन के सबसे पुराने स्विमिंग क्लब में से एक में जगह बना ली.

यहां तैराकी कोच दोनों बहनों से काफ़ी प्रभावित हुए, ख़ासतौर पर युसरा से.

चार हफ़्तों की ट्रेनिंग के बाद मर्दीनी के कोच स्वेन स्पैनरक्रेब्स ने 2020 टोक्यो ओलंपिक के लिए प्लान बनाना शुरू कर दिया.

लेकिन इस साल मार्च में अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक कमेटी (आईओसी) ने घोषणा की कि इस साल के रियो खेलों में शरणार्थियों की एक टीम होगी. ये सभी शरणार्थियों के लिए उम्मीदों का पैगाम था.

बर्लिन में एक टीनेजर बहुत तेज़ी से आगे बढ़ रही थीं, जिनके पास टीम में शामिल होने का पूरा मौका था.

मार्च में ही आईओसी ने मर्दीनी का नाम 43 शरणार्थियों की सूचि में शामिल कर लिया जिसके बाद से दुनियाभर के पत्रकारों के फ़ोन आने शुरू हो गए इंटरव्यू के लिए.

रियो ओलंपिक शुरू होने के दो महीने पहले मर्दीनी को आईओसी से एक ईमेल मिला. डरते हुए उन्होंने उसे पढ़ा तो पता चला कि वो ओलंपिक खेलों के लिए मुकाबले में भाग लेंगी.

खुशी से वो रो पड़ीं. वो कहती हैं कि चार साल बाद टोक्यो में होने वाले ओलंपिक खेलों में उनके पदक जीतने का पूरा मौका होगा.

मर्दीनी, बर्लिन में अपने पिता और पूरे परिवार के साथ रहती हैं. उनके कोच का कहना है कि उनका अपने लक्ष्य के प्रति पूरी तरह से ध्यान केंद्रित है.

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