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सोमवार, 26 मार्च, 2007 को 08:38 GMT तक के समाचार
 
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क्या भारत की हार क्रिकेट के लिए फ़ायदेमंद है?
 

 
 
खिलाड़ियों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन
क्रिकेट प्रेमी हार के बाद बेकाबू हो खिलाड़ियों के घर तोड़फोड़ करने लगे हैं
विश्वकप क्रिकेट के शुरुआती दौर में भारतीय टीम के बाहर होने से उसके दीवानों में गहरी निराशा का माहौल है लेकिन शायद ऐसा होने में क्रिकेट की बेहतरी ही है.

क्रिकेट जगत के इन दोनों दिग्गज़ काग़जी शेर के बाहर होने से अब क्रिकेट प्रेमियों का ध्यान असली क्रिकेटरों और क्रिकेट खेल पर जा सकेगा.

शुक्रवार को श्रीलंका के हाथों मिली हार से टेलीविज़न चैनलों को भी भारी वित्तीय घाटा हुआ है.

अभी दक्षिण एशिया का प्रतिनिधित्व करते हुए श्रीलंका और बांग्लादेश टूर्नामेंट में बने हुए हैं.

1987 में भारत में हुए रिलायंस विश्वकप के बाद से दक्षिण एशिया देश एकदिवसीय क्रिकेट के प्रशासनिक मामलों में बहुत प्रभावशाली बनकर उभरे.

 भारत और पाकिस्तान के विश्वकप से बाहर होने से वेस्टइंडीज़ में खेल का माहौल ख़ुशनुमा और बेहतर बन सकेगा.
 

टूर्नामेंट के आयोजन के साथ-साथ दक्षिण एशियाई देशों को खेल में मिली जीत भी इनके बढ़ते प्रभाव की एक बड़ी वज़ह थी.

भारत ने 1983, पाकिस्तान ने 1992 और श्रीलंका ने 1996 का क्रिकेट विश्वकप जीता.

हालांकि दक्षिण एशियाई देशों के पक्ष में शक्ति संतुलन बनने की सबसे मुख्य वज़ह व्यावसायिक थी. अब ये मान लिया गया था कि क्रिकेट देखने वाली सबसे अधिक जनता भारत में ही रहती है.

क्रिकेट भारत में हमेशा से लोकप्रिय था लेकिन ये संयोग ही था कि 1983 के विश्वकप में मिली जीत और 1980 के दशक में टेलीविज़न दर्शकों का उभार एक साथ होने से क्रिकेट का भारत में तेज़ी से फ़ैलाव हुआ और इसके प्रशंसकों में भारी बढ़ोत्तरी हुई.

एकदिनी मैच

इस नए दर्शक वर्ग में क्रिकेट के लघु संस्करण में ख़ासा रुझान देखने को मिला. इसके पीछे कई कारण थे.

सीमित ओवरों के मैच एक दिन में ख़त्म हो जाते थे, इनमें परिणाम लगभग निश्चित था और सबसे ख़ास बात इनमें रोमांच ज़्यादा था जो टेस्ट क्रिकेट में कम देखने को मिलता था.

भारत और पाकिस्तान में लंबे समय के बाद 1978 में क्रिकेट संबंध फ़िर से बहाल हुए और लगभग उसी समय क्रिकेट का छोटा संस्करण यानी एक दिनी क्रिकेट भी शुरू हो रहा था.

भारत और पाकिस्तान के दर्शकों में क्रिकेट का रोमांच और बढ़ गया जब रेगिस्तानी शहर शारज़ाह में दोनों टीमों में घमासान होने लगा.

उग्रराष्ट्रवाद के इस प्रकटीकरण और टेलीविज़न के मिलन से क्रिकेट की बढ़ती लोकप्रियता के कुछ नकारात्मक प्रभाव भी हुए.

खिलाड़ियों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन
हार के बाद सचिन जैसे महानायक को भी नहीं बख़्शा जाता

दर्शक वर्ग अपनी टीम की हार के बाद बेकाबू होने लगे और सट्टेबाज़ों ने इस खेल में अपने हाथ आज़माने शुरू कर दिए.

हार और ख़ासकर अपने पुराने दुश्मनों से मिली हार से देशों के क्रिकेट संबंध प्रभावित होने लगे (भारत ने शारज़ाह में होने वाले मैचों में बेईमानी का आरोप लगाते हुए पाकिस्तान के साथ खेलना बंद कर दिया).

खिलाड़ियों के घरों और संपत्तियों को नुकसान पहुँचाया जाने लगा. (2003 में मोहम्मद कैफ़ के घर पर हमला हुआ और अभी हाल के विश्वकप में बांग्लादेश के हाथों मिली हार के बाद महेंद्र सिंह धोनी के घर को हानि पहुँचाने की कोशिश की गई).

भ्रष्टाचार

क्रिकेट में सट्टेबाज़ों और मैच फ़िक्सिंग के पाँव पसारने से एक प्रतिस्पर्धी खेल के रूप में क्रिकेट की विश्वसनीयता का कम होना दक्षिण एशिया में एकदिनी मैच देखने वाले नए दर्शक वर्ग के उभार के नकारात्मक प्रभाव का नतीज़ा थी.

जिन दिनों टेस्ट मैच प्रभावी हुआ करते थे तब ऐसा देखने का नहीं मिला था.

टेस्ट क्रिकेट को फ़िक्स करना बहुत ही मुश्किल है. टेस्ट क्रिकेट में ऐसी उत्तेजना, दबाव पैदा ही नहीं हो सकता जैसा एकदिनी क्रिकेट में देखने को मिलता है.

सट्टेबाज़ मूलतः दक्षिण एशियाई मूल के होते हैं और भारत और पाकिस्तान में रहते हैं जहाँ भूमिगत होकर ये सट्टेबाज़ी उद्योग का संचालन करते हैं.

सट्टेबाज़ी के इस भ्रष्ट खेल में पूर्व दक्षिण अफ़्रीकी कप्तान हैंसी क्रोनए जैसे लोग भी शामिल हो गए थे लेकिन फ़िर भी ये दक्षिण एशियाई अभिशाप ही है.

बॉब वूल्मर की मौत के पीछे भी इसी मैचफ़िक्सिंग और सट्टेबाज़ी के घिनौने धंधे का हाथ होने के कयास लगाए जा रहे हैं.

ऐसा माना जा रहा है कि वूल्मर अपनी आने वाली किताब में इस काले धंधे पर से पर्दा उठाने वाले थे.

क्रिकेट में भारत और पाकिस्तानी क्रिकेटप्रेमियों के इस हठी और कमज़ोर राष्ट्रवाद से क्रिकेट का बहुत नुकसान हो रहा है.

भारत और पाकिस्तान के विश्वकप से बाहर होने से वेस्टइंडीज़ में खेल का माहौल ख़ुशनुमा और बेहतर बन सकेगा और इससे इन देशों के क्रिकेटप्रेमियों को क्रिकेट खेलने का अधिक समय मिल सकेगा.

वैसे ये लोग इस समय का इस्तेमाल अपनी प्रतिबद्धता किसी और खेल के पक्ष में बदलने के लिए भी कर सकते हैं जो उन्हें बुरा बनाने से रोके. टेस्ट क्रिकेट, कोई है?

(मुकुल केशवन लेखक हैं, इस साल क्रिकेट पर उनकी किताब 'मेन इन व्हाइट' पेंगविन से प्रकाशित होने वाली है.)

 
 
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