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सोमवार, 07 जनवरी, 2008 को 18:26 GMT तक के समाचार
 
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गर्व करने के लिए कुछ तो है....
 

 
 
अनिल कुंबले
अनिल कुंबले ने मैदान पर संयम दिखाया
वे लोग जो अंध राष्ट्रभक्ति को स्वीकार नहीं करते और जो ये मानते हैं कि हर बात पर हाय-हाय करना अपने को हीन समझने जैसा है, उनके लिए भी सिडनी टेस्ट के पाँच दिन मन मसोसने वाले रहे हैं.

चाहे आप विपक्षी टीम के आक्रामक रुख़ से कितनी भी नफ़रत करते हों या फिर उस समय भारतीय टीम पर फ़ब्ती कसते हों कि वह अपनी कमज़ोरी छुपाने के लिए बेईमानी का बहाना बनाती है. इन सबके बावजूद जिस तरह ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट खेलते हैं, आप उनकी सराहना भी करते हैं.

भारतीय टीम की हार के बाद जब आप सुबह उठते हैं और उम्मीद के मुताबिक़ अख़बार भी उन टीवी चैनलों की बात का समर्थन करते हुए नज़र आते हैं कि अंपायरिंग निष्पक्ष नहीं थी, तो आपके दिल के एक कोने से यह सवाल भी उठता है कि सिर्फ़ अंपायरों को ज़िम्मेदार क्यों ठहराया जाए?

ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को ज़िम्मेदार क्यों कहा जाए? हमारी टीम सिडनी टेस्ट के आख़िरी दिन क्यों नहीं खेल पाई. यह सही है कि अंपायरों के कुछ फ़ैसले ग़लत थे लेकिन इसके बावजूद हमें मैच बचा लेना चाहिए था.

हमारी मीडिया भले ही अंध राष्ट्रभक्ति के दिखावे में कई चीज़ें जोड़ दे, लेकिन यह तथ्य तो अपनी जगह क़ायम है कि टेस्ट मैच बचाने के लिए हम 72 ओवर बल्लेबाज़ी भी नहीं कर पाए.

अनुचित हुआ

इन सबके बावजूद आपके अंदर ऐसी बात भी उठती है कि आपके साथ उचित नहीं हुआ. एक ऐसी टीम के साथ न्याय नहीं हुआ जो पहला टेस्ट बुरी तरह हारने के बावजूद सिडनी टेस्ट के पहले दिन दृढ़ निश्चय के साथ लड़ी.

बकनर के कई फ़ैसलों की आलोचना हुई

अगर अंपायरों के कुछ फ़ैसले ग़लत नहीं होते, तो भारतीय टीम दुनिया की सर्वश्रेष्ठ टीम को पहली पारी में 250 रन पर समेट सकती थी. अंपायरों ने अपने फ़ैसले से पहली पारी में भारतीय टीम का काफ़ी नुक़सान किया.

लेकिन इसके बावजूद अपनी पहली पारी में भारतीय टीम ऑस्ट्रेलिया पर भारी पड़ी. भारतीय बल्लेबाज़ों ने ज़बरदस्त प्रदर्शन किया. अगर अंपायरिंग निष्पक्ष रहती तो भारत को पहली पारी के आधार पर कम से कम 150 रनों की बढ़त मिलती.

यहाँ हम ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को ज़िम्मेदार नहीं ठहरा सकते क्योंकि अंपायरों की नियुक्ति अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) करती है. अंपायर निष्पक्ष थे या वे पक्षपात कर रहे थे- आप ये आरोप नहीं लगा सकते कि ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी भारत की ऐसी-तैसी करने के लिए अंपायरों के साथ साज़िश कर रहे थे.

अंपायरिंग के मामले पर आईसीसी को ज़िम्मेदार ठहराया जाना चाहिए. आईसीसी को इस बात पर भी चिंतन-मनन करना चाहिए कि कैसे अयोग्य अंपायरों के कारण एक टेस्ट मैच बर्बाद हो जाता है.

गर्व की बात....

दूसरी ओर तमाम ग़लत फ़ैसलों के बावजूद भारतीय टीम ड्रॉ कर सकती थी और ऐसा करके वे नैतिक आधार पर और मज़बूत होते. साथ ही वे अंपायरों और ऑस्ट्रेलिया को ये जवाब भी दे सकते थे कि आप उनके बारे में ग़लत सोचते हो.

रिकी पोंटिंग ने खेल भावना नहीं दिखाई

ये सब बातें अपनी जगह हैं और इनमें दम भी है. लेकिन अब जो तस्वीरें दिमाग़ में छाई हुई हैं, उसमें हैं रिकी पोंटिंग की अकड़ जिसमें वे ग़लत कैच की अपील करते हैं, माइकल क्लार्क का स्लिप में साफ़ कैच आउट होने के बाद भी पिच पर खड़ा रहना और अंपायरों का पोंटिंग से ये पूछ कर गांगुली को आउट देना कि कैच ठीक से लपका गया.

गांगुली का कैच लपकने के बाद पोंटिंग का ये कहना कि क्लार्क ने ठीक से कैच लपका है या द्रविड़ के पैड से लगकर गई गेंद को लपकने के बाद गिलक्रिस्ट का ख़ुशी से उछलना- आप कह सकते हो कि इसमें ग़लत क्या है. ऐसा सिर्फ़ ऑस्ट्रेलियाई नहीं करते बल्कि सभी खिलाड़ी करते हैं.

फिर भी आपके अंदर कुछ चटक जाता है......यह क्रिकेट नहीं है....इस तरह किसी चैम्पियन टीम को अपना खेल नहीं खेलना चाहिए. दुनिया की सर्वश्रेष्ठ टीम के कप्तान को उस टीम के कप्तान से शिष्टता और सम्मान की सीख लेनी चाहिए जिसकी टीम उसे हराने को बेताब थी.

जिस तरह अनिल कुंबले ने क्रिकेट खेला उस पर गर्व करने के लिए निश्चित रूप से कुछ है....और अगर आप ऑस्ट्रेलिया के हैं तो जिस तरह पोंटिंग ने क्रिकेट खेला उस पर शर्म करने के लिए भी कुछ है.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स स्पोर्ट्स के सलाहकार हैं)

 
 
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