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सोमवार, 07 जनवरी, 2008 को 03:46 GMT तक के समाचार

'भारतीय टीम कैच बेन्सन बोल्ड बकनर'

भारतीय अख़बारों में हरभजन सिंह पर नस्लवादी टिप्पणी के लिए तीन मैचों की पाबंदी और ख़राब अंपायरिंग की ख़बर छाई हुई है.

इस मामले में भारतीय अख़बार उद्वेलित नज़र आते हैं.

अख़बारों के न केवल पहले पन्ने के साथ खेल के पन्ने सिडनी बवाल से भरे पड़े हैं.

उन्होंने ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों और मैच रेफ़री किसी को नहीं बख्शा है.

साथ ही भारतीय कप्तान कुंबले का बयान हर अख़बार में है- ‘सब जानते हैं कि हम क्यों हारे...’

दैनिक जागरण लिखता है कि भारत में क्रिकेट खेल नहीं धर्म के रूप में जाना जाता है, उसी क्रिकेट को धर्मराजों यानी अंपायरों ने कलंकित कर दिया है.

अख़बार कहता है कि भारत दूसरे टेस्ट में साजिश के तहत हारा तो स्टार स्पिनर हरभजन को बिना सबूत के दोषी क़रार दिया गया.

अमर उजाला का शीर्षक है- क्रिकेट कलंकित.

अख़बार लिखता है कि क्रिकेट अब भद्रजनों का खेल नहीं रहा. कम से कम सिडनी के मैदान पर इस खेल को कलंकित होते देख तो ऐसा ही लगता है.

अमर उजाला में पूर्व क्रिकेट खिलाड़ी मदनलाल ने लिखा है कि इस विवाद से भारतीय टीम को एकजुट करने में मदद मिलेगी.

राष्ट्रीय सहारा की सुर्ख़ी है- क्रिकेट का काला दिन.

अख़बार लिखता है कि अंपायरों ने सिडनी में भारत को हराया. अंपायर बकनर और बेनसन ने दस फ़ैसले ग़लत दिए.

नवभारत टाइम्स का शीर्षक है- सिडनी में बेईमानी.

अख़बार लिखता है कि सिडनी में रविवार को ऐसा बहुत कुछ हुआ जिसने क्रिकेट पर काला धब्बा लगा दिया.

जानबूझकर की गई इन हरकतों से न सिर्फ़ भारतीय टीम को मैच हारने पर मजबूर किया बल्कि पूरी तरह अपमानित भी किया.

पंजाब केसरी ने शीर्षक लगाया है- क्रिकेट का बलात्कार.

अख़बार लिखता है कि सिडनी की धरती पर भद्रजनों के खेल क्रिकेट का बलात्कार हो गया.

अंपायर स्टीव बकनर और बेन्सन ने सारे कायदे क़ानून अपने बूटों तले रौंद डाले और भारत को ऑस्ट्रेलिया पर बढ़त लेने के बावजूद हरवा दिया.

अंग्रेज़ी अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया लिखता है कि सिडनी टेस्ट में मैन ऑफ़ द मैच अंपायर रहे.

अख़बार लिखता है कि 22 खिलाड़ियों में से मैन ऑफ़ मैच चुना जाता है लेकिन मैन ऑफ़ मैच के असली हक़दार अंपायर हैं.

यदि नियम सही हों तो बेन्सन ने बकनर को मात दे दी है.

इंडियन एक्सप्रेस का हेडिंग है- भारतीय टीम कैच बेन्सन बोल्ड बकनर.