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बीसीसीआई ने निकाला बोतल का जिन्न
 

 
 
धोनी
धोनी पर सबसे ज़्यादा बोली लगाई गई है
क्या वो सब एक वास्तविकता थी? या फिर हम किसी कसीनो में बैठे मोटे रईसों को देख रहे थे जो अपने अहम की संतुष्टि के नाम पर स्टार क्रिकेटरों को ख़रीदने के लिए आसमान छूती क़ीमत दे रहे थे.

कोलकाता टीम के मालिक शाहरुख़ ख़ान को तो खिलाड़ियों की बोली लगाने की प्रक्रिया में इतना रोमांचित किया कि वे अब इसके अभ्यस्त होने लगे हैं.

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के अधिकारी और भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी आईएस बिंद्रा ने तो अपने जीवन में ऐसा दिन देखा ही नहीं था.

20 फरवरी 2008 को मुंबई में जो कुछ हुआ वह क्रिकेट की दुनिया का एक अहम मोड़ हो सकता है, जहाँ से किसी को ये पता नहीं कि यह खेल किस दिशा में जाएगा.

क्या इंडियन प्रीमियर लीग भारतीय क्रिकेट बोर्ड का खड़ा किया एक मायाजाल है, जिसने लोगों को बहुत लुभाया है और वे यहाँ तक सोचने लगे हैं कि हज़ारों करोड़ रुपए ख़र्च करवा कर उन्होंने ऐसी मुर्गी खोज निकाली है जो एक दिन उन्हें सोने के अंडे देगी.

सवाल

इन सबसे ज़्यादा अहम ये बात भी है कि क्या भविष्य में क्रिकेट उन उद्योगपतियों के हाथ में होगा और भारतीय बोर्ड भी एक दिन इन रईसों के रहमो-करम पर चलेगा?

बोली लगाने वालों में शाहरुख़ और प्रीति भी थे

क्या विजय माल्या और प्रीति जिंटा एक दिन बोर्ड का नियंत्रण अपने हाथ में लेकर ख़ुशी से बल्लियों उछलेंगे जैसा कि वे खिलाड़ियों की बोली लगाकर कर रहे थे. कौन जानता है...एक दिन ऐसा भी हो जाए.

लेकिन क्या ये भी हो सकता है कि यह उन लोगों की ओर से खड़ा किया गया एक बहुत बड़ा तमाशा बनकर रह जाए, जिन्होंने सत्ता और लालच के मद में चूर एक ख़ास तथ्य की अनदेखी की है.

तथ्य ये कि वे एक ऐसे इलाक़े में घुसने की कोशिश कर रहे हैं जहाँ से साफ़-सुथरा बच निकलना काफ़ी मुश्किल होगा.

एक ऐसा देश जहाँ खेल की पूरी की पूरी इमारत देश और राष्ट्रीय ध्वज के प्रति निष्ठा पर आधारित है, वहाँ शहरों के बीच की प्रतिद्वंद्विता जनता के दिलो-दिमाग़ पर कितना राज करेगी- ये भी देखने वाली बात होगी.

अगर ये प्रयोग नाकाम रहता है तो क्या कॉरपोरेट इंडिया भारत के अन्य खेलों के सुधार के लिए इतनी ही शिद्दत से लग पाएगा. वही कॉरपोरेट इंडिया जो सोशल सेक्टर में पैसा न लगाने के हज़ार बहाने ढूँढ़ लेता है और जिस देश में अमीर और ग़रीब के बीच की खाई बढ़ती ही जा रही है.

किस पर भरोसा

मोहाली टीम के मालिक नेस वाडिया चाहते हैं कि हम उनकी इस बात पर भरोसा करें कि वे भारत में निचले स्तर पर खेलों को बढ़ावा देना चाहते हैं. कितने नेक विचार हैं...लेकिन क्या नेस वाडिया ये बताएँगे कि पहले से ही करोड़ों के वारे-न्यारे करने वाले खिलाड़ियों पर धनवर्षा करके वे कैसे खेल का स्तर ठीक करेंगे. ये स्पष्ट नहीं है.

अगर एक धोनी को एक साल में अपने देश की ओर से मिलने वाली राशि का छहगुना सिर्फ़ 44 दिन में मिल जाएगा, तो इससे खेल का स्तर कैसे आगे बढ़ेगा. इस पर भी स्पष्टीकरण की आवश्यकता है.

क्रिकेट के आकाओं ने उद्योग जगत को बढ़ावा दिया

हाँ, धोनी और धोनी जैसे कई खिलाड़ी आईपीएल के कारण और धनी हो जाएँगे लेकिन इससे प्रथम श्रेणी के क्रिकेट और क्रिकेटरों को कैसे लाभ मिलेगा....मुझे तो भरोसा नहीं.

वास्तव में देखा जाए तो खिलाड़ियों की आसमान छूती इस बोली ने क्रिकेट में भी 'अमीर और ग़रीब' की खाई को और चौड़ा कर दिया है.

वैसे इंडियन प्रीमियर लीग के कारण एक चीज़ तो निश्चित रूप से दिखने लगा है- वह है ट्वेन्टी 20 क्रिकेट का वनडे और हो सकता है टेस्ट क्रिकेट के भी विकल्प के रूप में खड़ा किया जाना.

कैसे ट्वेन्टी 20 विश्व कप में भारत की जीत ने इस तरह के मैचों का विरोध करने वाले लोगों को इसका समर्थक बना दिया, ये बात भविष्य में लिखे जाने वाले क्रिकेट के इतिहास में ज़रूर स्वर्णाक्षरों में लिखी जाएगी जब वनडे क्रिकेट के ख़ात्मे का ज़िक्र होगा.

विरोधी अब समर्थक हैं

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड पिछले साल ट्वेन्टी 20 विश्व कप के लिए अपनी टीम को भेजना ही नहीं चाहता था. बोर्ड को ये डर था कि कहीं ट्वेन्टी 20 एक दिवसीय क्रिकेट का ख़ात्मा न कर दे.

जो प्रायोजक 50-50 विश्व कप से भारतीय के जल्दी बाहर हो जाने के बाद भागने लगे थे, उन्हें एकाएक धोनी और उनकी युवा टीम में नया अवसर दिखने लगा है.

कई टॉप क्रिकेटरों को आईपीएल ने आकर्षित किया है

ऐसा नहीं था कि वनडे मैचों में इन कंपनियों को विज्ञापन से लाभ नहीं हो रहा था, बल्कि वनडे मैचों में तो इन्हें अपने विज्ञापन दिखाने के लिए ज़्यादा समय मिल रहे थे और वे चाहते तो इसका लाभ भी उठा सकते थे.

धोनी और उनकी युवा टीम कई मायनों में इन कंपनियों के रक्षक बन गए और झारखंड के इस हीरो को ज़्यादा क़ीमत मिलने से कोई अचरज भी नहीं होना चाहिए. कई मायनों में कंपनियों ने इस रूप में अपने रक्षक का धन्यवाद किया है.

जहाँ तक क्रिकेट बोर्ड की बात है, तो उसने अनजाने में भारत के उद्योग जगत को क्रिकेट प्रशासन के सामने ला खड़ा किया है. वर्षों पहले कैरी पैकर ने क्रिकेट की दुनिया में बग़ावत का झंडा खड़ा किया था.

पैकर जैसी बग़ावत

क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया से प्रसारण अधिकार ना मिलने के कारण कैरी पैकर ने ख़ुद ही वर्ल्ड सिरीज़ क्रिकेट शुरू की. उस समय उन्होंने भारत को छोड़ सभी देशों के टॉप क्रिकेटरों को साइन किया और एक दिवसीय क्रिकेट का कायाकल्प कर दिया.

उन्होंने उस दौरान टीवी कवरेज़ को नई दिशा दी, दिन-रात के मैच करवाए, रंगीन पोशाक में क्रिकेटरों को उतरा, उजली गेंद का इस्तेमाल किया गया और खिलाड़ियों को भारी भरकम रक़म दी गई.

लेकिन उस समय भी वे टेस्ट क्रिकेट से टक्कर नहीं ले पाए. लेकिन एक बार जब उनका क्रिकेट प्रशासकों से समझौता हो गया, तो प्रशासकों ने भी अपने स्तर से क्रिकेट में बदलाव करना शुरू कर दिया. क्रिकेटरों को ज़्यादा पैसे मिलने लगे और वनडे क्रिकेट की लोकप्रियता भी बढ़ी.

लगता है आज भी कमोबेश वही स्थिति है. लेकिन इस बार इसका असर बहुत ज़्यादा होने वाला है. कैरी पैकर की तरह इस बार बग़ावत का झंडा उठाया है- ज़ी नेटवर्क के मालिक सुभाष चंद्रा ने.

किसको लाभ?

ज़ी नेटवर्क के सुभाष चंद्रा ने आईसीएल शुरू की है

उन्होंने भी ट्वेन्टी 20 क्रिकेट के स्वरूप का लाभ उठाने की कोशिश की और दुनिया के कई टॉप क्रिकेटरों को अपने पाले में किया. भारतीय क्रिकेट के आकाओं ने इससे निपटने के लिए अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया.

लेकिन इस प्रक्रिया में उन्होंने एक ऐसा दैत्य खड़ा कर दिया है जो एक दिन ना सिर्फ़ उन्हें बल्कि विश्व क्रिकेट को निगल जाएगा. आईपीएल में इतना पैसा लग चुका है अब इसे लोकप्रिय बनाने के लिए हरसंभव कोशिश होगी.

अगर ये सफल हुआ तो उद्योग जगत इसमें अपना हिस्सा मांगेगा और इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर का टूर्नामेंट बनाना चाहेगा. ट्वेन्टी 20 में पैसा और लोकप्रियता के पैमाने का मतलब है- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्रिकेट के स्वरूप का ख़ात्मा.

आज शाहरुख़ ख़ान जिसे लेकर रोमांचित हो रहे हैं और अभ्यस्त होने का दम भर रहे हैं, वो कल आम जनता के लिए नशा बन सकता है. इससे किसे लाभ होता है और किसका नुक़सान होता है- ये सवाल उनके लिए बेमानी है जिनके लिए अंतत: पैसा ही सब कुछ है.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स स्पोर्ट्स के सलाहकार हैं)

 
 
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