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रविवार, 02 मार्च, 2008 को 14:20 GMT तक के समाचार
 
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वो ख़ामोश रहते हैं, जिनके हुनर बोलते हैं
 

 
 
सचिन तेंदुलकर
सचिन ने दिखाया कि उनके बल्ले की धार अभी भी क़ायम है

सचिन रमेश तेंदुलकर, सचिन भगवान तेंदुलकर, मास्टर ब्लास्टर, लिटिल चैम्पियन और ना जाने क्या-क्या. ये तो ऐसे अलंकार हैं जो सचिन को वर्तमान में मिलते हैं.

जब क्रिकेट का ये भारतीय भगवान इतिहास के पन्नों में अंकित होगा, तो और कितने अलंकार उसके साथ जुड़ेंगे- इस पर अभी से विचार करने की शायद ज़रूरत नहीं.

क्योंकि सिडनी के मैदान पर सचिन के बल्ले का जौहर देखने के बाद क्या किसी को फ़िलहाल ये सवाल पूछने की आवश्यकता है. कुछ दिन पहले ही सचिन के प्रदर्शन और सचिन की निष्ठा पर एक बार फिर सवाल उठाए गए थे.

लेकिन श्रीलंका के ख़िलाफ़ आख़िरी लीग मैच में सचिन ने 63 रन की पारी खेलने के बाद स्पष्ट किया था कि उनका प्रदर्शन इतना ख़राब नहीं था कि उस पर सवाल उठाए जाए.

ऐसा बहुत कम हुआ है कि सचिन ने अपने आलोचकों को खुल कर जवाब दिया है. ज़्यादा मौके पर उनका बल्ला बोला है.

सचिन के आलोचक कई बार उन पर ये आरोप लगाते हैं कि सचिन की पारी भारत को जीत नहीं दिलाती, सचिन मौक़े पर नहीं चलते और लक्ष्य का पीछा करने के समय तो सचिन का बल्ला ख़ामोश ही रहता है.

गवाह

लेकिन सिडनी के पहले फ़ाइनल में विश्व चैम्पियन टीम के सामने सचिन की पारी इसकी गवाह है कि मौक़े पर सचिन चलते हैं और टिकते हैं और टीम को जीत तक ले भी जाते हैं.

सचिन ने ऑस्ट्रेलिया में वनडे मैचों का पहला शतक लगाया

आँकड़ों की बातें करने वाले सिडनी के आँकड़ें को याद कर लें अन्यथा एक-दो पारी में सचिन का बल्ला अगर ख़ामोश हुआ तो वही पुरानी कहानी फिर शुरू हो जाएगी- सचिन के दिन लद गए हैं, सचिन को संन्यास ले लेना चाहिए, सचिन युवा टीम में क्या कर रहे हैं...वगैरह...वगैरह.

सचिन की निंदा करने वाले, उनकी निष्ठा पर अक्सर सवाल उठाने वाले ये भूल जाते हैं कि सचिन का रिकॉर्ड क्या कहता है. सचिन के नाम शतक, अर्धशतक और रनों का अंबार क्या गवाही देता है.

क्रिकेट को जिस देश में धर्म का दर्जा और सचिन को भगवान का दर्जा हासिल है. उस देश में क्रिकेट के भगवान पर से इतनी जल्दी आस्था कम होने की कोई वजह नहीं.

सिडनी की पारी में देश को विजयी देखने के लिए सचिन का जज़्बा दिख रहा था, साथी खिलाड़ियों को उत्साह बढ़ाने में उनका जोश दिख रहा था और ख़ुद की पारी में सचिन का दृढ़ निश्चय दिख रहा था.

एक-एक शॉट में सचिन की दृढ़ता दिख रही थी. चौके, सिंगल्स, दो रन और कई तीन रन. सचिन मैदान में हर जगह दिख रहे थे. कभी नॉन स्ट्राइकर पर आते भी तो स्ट्राइकर को टिप्स देने की उनकी ललक देखने लायक थी.

जवाब

उथप्पा कैच आउट हुए या गंभीर रन आउट हुए या फिर युवराज क्लीन बोल्ड हुए- सचिन की पीड़ा देखकर ऐसा लगा कि क्रिकेट के इस देवता पर सवाल उठाने वाले नाहक ही उसकी मानसिक स्थिति से खेलते हैं.

ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों के बीच सचिन काफ़ी लोकप्रिय हैं

ऐसी मानसिक स्थिति जो क्रिकेट के मैदान पर बड़े-बड़ों का धैर्य हिला दे....पोंटिंग जैसे सूझ-बूझ वाले कप्तान को परेशान कर दे...लेकिन जब अपने घर से क्रिकेट पर लिखने वाले इस लिटिल चैंप पर प्रहार करते हैं, तो क्या उसे दुख नहीं होता होगा.

ख़ैर सिडनी की बात करें, तो सचिन के सामने ना सिर्फ़ विश्व चैम्पियन को धूल चटाने का ज़िम्मा था बल्कि यह भी साबित करना था कि अभी उनकी धार कुंद नहीं हुई थी.

98 रन पर ब्रेट ली की एक तेज़ गेंद सचिन के कंधे पर लगी तो उन्हें छोड़कर शायद भारतीय क्रिकेट का हर समर्थक कराह उठा होगा, लेकिन सचिन चूके नहीं बल्कि दरियादिली से ब्रेट ली को माफ़ भी किया.

कमेंट्री बॉक्स में बैठे इयन चैपल और मार्क टेलर जैसे पूर्व खिलाड़ियों ने ब्रेट ली की आलोचना की और साथ ही सचिन की सराहना में बड़े-बड़े शब्दों की झड़ी लगा दी. ऐसा है सचिन का रुतबा, सचिन का क़द और सचिन का व्यक्तित्व.

रुका नहीं लिटिल चैम्पियन

लेकिन सचिन यहीं रुके नहीं. ऑस्ट्रेलिया की धरती पर वनडे मैचों में शतक ना लगा पाने की निराशा को धोया और भारत को बेहतरीन जीत दिलाई. शतक लगाने के बाद सचिन ख़ुश तो थे लेकिन उनके चेहरे से एक पीड़ा भी झलक रही थी.

सचिन को बधाई देने भज्जी पिच पर पहुँच गए

पीड़ा लगातार उन पर उठाए जाने वाले सवालों की. क्यों जबाव दे यह मास्टर ब्लास्टर हर आलोचना की. मास्टर ब्लास्टर के क़रीब 19 साल के अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट करियर में क्या कुछ कमी रह गई.

पिछले साल विश्व कप के बाद भी सचिन पर सवाल उठे थे. संन्यास की मांग उठी थी. लेकिन सबको किनारे करते हुए सचिन ने अपने बल्ले से हर आलोचना का जवाब दिया. बांग्लादेश का दौरा हो, इंग्लैंड का दौरा, पाकिस्तान के ख़िलाफ़ सिरीज़ हो या फिर मौजूदा ऑस्ट्रेलियाई दौरा....हर दौरे पर सचिन जम कर चले हैं और कई बार टीम को जीत दिलाई है.

विश्व कप के बाद जब देशभर में सीनियर खिलाड़ियों के पोस्टर जलाए जा रहे थे तो पूर्व कप्तान राहुल द्रविड़ ने कहा था- बुरे वक़्त में हमें अपने लोगों से समर्थन की ज़रूरत होती है. हर खिलाड़ी के जीवन में बुरा वक़्त आता है.

लेकिन क्यों हम इतने उतावले हो जाते हैं कि क्रिकेट के अपने देवता पर भी उंगली उठाने लगते हैं. हार-जीत, अच्छा-बुरा समय इस खेल का हिस्सा है. हमें इसे उसी रूप में लेने की आवश्यकता है. सचिन की बात करें, तो ये याद रखें कि इस छोटे शहंशाह ने भारतीय क्रिकेट को क्या नहीं दिया है.

सिडनी में सचिन के शतक के बाद अगर आपकी आँखों से दो आँसू निकल आए हों, तो इस जज़्बे को संभाल कर रखिएगा...क्योंकि जब ये बादशाह अपना बल्ला टांगेगा....आपके पास इन ख़ूबसूरत यादों को सहेजने के अलावा कुछ नहीं होगा.

तब शायद आप ये कहने को विवश हो जाएँगे कि हम भाग्यशाली हैं कि हम सचिन युग में पैदा हुए हैं.

 
 
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