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शनिवार, 10 मई, 2008 को 11:10 GMT तक के समाचार
 
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ये कॉरपोरेट कल्चर का क्रिकेट है...
 

 
 
विजय मालया
विजय मालया बंगलौर टीम के मालिक हैं
ये तो होना ही था. हालाँकि ये थोड़ा जल्दी हुआ, लेकिन कोई भी ये नहीं कह सकता कि इसकी चेतावनी नहीं दी गई थी. जब उद्योपति क्रिकेट टीम ख़रीदेंगे और इतना पैसा लगाएँगे तो खेल के नियम तो बदलेंगे ही.

दरअसल ये कॉरपोरेट कल्चर का हिस्सा है कि आप सिर्फ़ जीते और निवेश से लाभ मिले. उद्योगपतियों का आईपीएल में निवेश का एकमात्र मक़सद पैसा बनाना है और आईपीएल ने उन्हें अपनी ब्रांड इमेज बनाने का अवसर भी दिया है.

इसी ब्रांड इमेज के कारण यूबी ग्रुप के मालिक विजय मालया को लगा कि बंगलौर रॉयल चैलेंजर्स की लगातार हो रही हार से उन्हें नुक़सान हो सकता है.

उन्होंने अपना ग़ुस्सा टीम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी चारू शर्मा को हटाकर निकाला.

ये ऐसा क़दम है जिसने क्रिकेट की दुनिया और क्रिकेटरों को हिलाकर रख दिया है. उद्योगजगत में विश्वसनीयता और भरोसे का ये ऐसा तर्क है जिससे क्रिकेटर ख़ासकर बंगलौर टीम के खिलाड़ी तो ज़रूर सहम गए होंगे.

अनिश्चितता

क्रिकेट की इस नई दुनिया में पैसा तो बहुत ज़्यादा है लेकिन इसमें लंबे समय तक टिके रहना ना सिर्फ़ सीमित है बल्कि अनिश्चित भी है. ये तो कहा भी जाता है कि सभी सफल ब्रांड विजेताओं से जुड़े होते हैं और यहाँ हारने वालों के लिए जगह नहीं होती.

 इसी ब्रांड इमेज के कारण यूबी ग्रुप के मालिक विजय मालया को लगा कि बंगलौर रॉयल चैलेंजर्स की लगातार हो रही हार से उन्हें नुक़सान हो सकता है. उन्होंने अपना ग़ुस्सा टीम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी चारू शर्मा को हटाकर निकाला
 

ये इस दुनिया का ऐसा क़ायदा-क़ानून है जो खिलाड़ियों और कलाकारों की उस दुनिया से बिल्कुल अलग है, जहाँ वे आज़ादी से अपना काम करते हैं. खेल की दुनिया में सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों के जीवन में भी सबसे बुरा समय आता है.

कई बार तो ये बुरा समय बहुत लंबा भी चलता है. कई महीनों तक. देखा जाए तो खेलों की ख़ूबसूरती सिर्फ़ खिलाड़ियों की सफलता में नहीं बल्कि उनकी नाकामी में भी होती है.

यही कारण है ये एक ऐसा कभी ना ख़त्म होने वाला रियालिटी शो है, जहाँ खेल प्रेमी जनता अपने खिलाड़ियों की कई नाकामियों को माफ़ करने का माद्दा रखती है.

चारदीवारी के अंदर टीमें मज़बूत रणनीति तो बनाती हैं लेकिन एक बार जब मैच शुरू होता है तो मामला बिल्कुल अलग होता है. जहाँ आपकी एक ग़लती, आपका रुख़ पूरे मैच की तस्वीर बदल देता है.

करो या मरो

लेकिन निश्चित रूप से आप ये बातें उन कॉपोरेट जगत के आकाओं को नहीं समझा सकते जिनके जीवन का आदर्श है- करो या मरो. लेकिन सिर्फ़ चारू शर्मा पर गाज गिरने और खिलाड़ियों के बचने की वजह यही है कि राहुल द्रविड़ और अनिल कुंबले जैसे खिलाड़ियों का क़द बहुत बड़ा है.

द्रविड़ का भी नंबर आ सकता है

फिर भी खिलाड़ियों की मानसिक स्थिति का अंदाज़ा कीजिए. सोचिए उन्हें कैसी स्थिति से गुज़रना पड़ रहा है. जिन्हें रणनीति का पाठ पढ़ाया जा रहा है. और तो और कंपनी के अधिकारी उन्हें ये भी बता रहे हैं कि कैसे प्रशिक्षण लेना चाहिए.

उनकी दुविधा का एहसास कीजिए जब उन्हें ये बताया जाता है कि टारगेट पूरा करने के लिए कैसे कंपनी के अधिकारी 24 घंटे बिना रुके काम करते हैं और अगर आप अच्छा नहीं कर रहे हैं तो आपको भी ऐसा ही करने की आवश्यकता है.

सिर्फ़ दो घंटे की ट्रेनिंग क्यों...ट्रेनिंग का समय दोगुना करो- ये आदेश टीम के कोच की ओर से नहीं बल्कि कंपनी के एक अधिकारी की ओर से आता है. अगर टीम से जुड़े लोगों को भरोसा किया जाए, तो खिलाड़ियों के पास ऐसा ना करने का कोई कारण भी नहीं है.

और तो और वीडियो फुटेज का विश्लेषण करने वाले को यूबी ब्रांड को बेचने वाले अधिकारी बता रहे हैं कि उन्हें टीम को कौन सा इनपुट देना चाहिए और कहाँ वे ग़लत कर रहे हैं.

अनजान

चारू शर्मा खिलाड़ियों और मालिक के बीच पुल का काम करने की हरसंभव कोशिश कर रहे थे. कहा जाता है कि बंगलौर टीम की हर हार के बाद चारू शर्मा को इसलिए फटकार मिलती थी क्योंकि उन पर आरोप लगता था कि वे खिलाड़ियों के साथ नरम व्यवहार करते हैं.

 सबसे ज़्यादा परेशानी की बात ये है कि विजय मालया टूर्नामेंट ख़त्म होने के बाद ये फ़ैसला कर सकते थे लेकिन टूर्नामेंट के बीच में यह फ़ैसला करके उन्हें बहुत कुछ हासिल नहीं हो रहा है, हाँ, ये ज़रूर है कि उन्हें टीम को अपनी धौंस दिखाने की कोशिश की है
 

खिलाड़ी इस तरह के कॉरपोरेट कल्चर से अनजान तो हैं लेकिन वे कुछ नहीं कर सकते. या तो वे चुपचाप इस नए क़ायदे-क़ानून को ख़ुशी-ख़ुशी स्वीकार करे या फिर मोटी तनख़्वाह पाकर अपने को सांत्वना दे.

सबसे ज़्यादा परेशानी की बात ये है कि विजय मालया टूर्नामेंट ख़त्म होने के बाद ये फ़ैसला कर सकते थे लेकिन टूर्नामेंट के बीच में यह फ़ैसला करके उन्हें बहुत कुछ हासिल नहीं हो रहा है, हाँ, ये ज़रूर है कि उन्हें टीम को अपनी धौंस दिखाने की कोशिश की है.

अगर कप्तान राहुल द्रविड़ ने इस मामले पर अपना नाराज़गी नहीं दिखाई होती तो टीम के कोच वेंकटेश प्रसाद को भी बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता था और फिर राहुल द्रविड़ की भी बारी आ सकती थी.

मेरा मानना है कि दूसरी टीमों के कप्तानों, कोच और मुख्य कार्यकारी अधिकारियों की चिंता भी वाजिब है. भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को भी इस मामले पर गंभीरता से विचार करना चाहिए ताकि क्रिकेट के भविष्य पर ये कॉरपोरेट कल्चर ना हावी हो.

ये अनुबंध का हिस्सा होना चाहिए कि क्रिकेट को क्रिकेटरों पर छोड़ दें. वैसे अज्ञानी अधिकारियों को खिलाड़ियों को सबक सिखाने से दूर रखा जाए. वे खिलाड़ियों के ये ना बताएँ कि क्रिकेट कैसे खेला जाता है.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स स्पोर्ट्स के सलाहकार हैं)

 
 
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