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शनिवार, 31 मई, 2008 को 10:38 GMT तक के समाचार
 
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कॉरपोरेट की जीत, मध्यम वर्ग की हार
 

 
 
आईपीएल टीमों के लोगो
आईपीएल में किसने कितना पैसा कमाया ये प्रतियोगित के बाद ही समझ में आएगा
इंडियन प्रीमियर लीग एक सफल प्रतियोगिता रही है इसमें तो कोई शक़ नहीं है.

क्रिकेट को अपने मूल और विशुद्ध रूप में ही पसंद करने वालों को ये बात भले ही रास न आई हो कि पूरे मैच को केवल 40 ओवरों के अंदर समेट कर लोगों को सामने परोसा जा रहा है.

लेकिन ये भी सच है कि ये खेल उन तमाम लोगों को बेहद पसंद आ रहा है जो पहले या तो क्रिकेट को उतने चाव से नहीं देखते थे या फिर टेलीवीज़न पर आने वाले ‘के’ धारावाहिकों या औसत स्तर के दूसरे कार्यक्रमों से बोर हो चुके थे.

चौकों-छक्कों की बरसात करने वाले ट्वेन्टी-20 फ़ॉर्मेट को ऐसे लोगों ने हाथों-हाथ लिया है.

हालांकि ऐसे कई सवाल हैं जिनका जवाब अभी नहीं मिला है. इस प्रतियोगिता में बड़े पैमाने में पैसे का निवेश हुआ है लेकिन ये व्यवसायिक स्तर पर कैसा कर रही है, इस बारे में अभी कोई ठोस जानकारी नहीं है.

आईपीएल के ख़त्म होने के बाद ही व्यवहारिक स्तर पर मुनाफ़े का आकलन हो पाएगा. फ़िलहाल तो एक ही बात पक्के तौर पर कही जा सकती है और वो ये कि भारतीय क्रिकेट बोर्ड मालामाल हो रहा है.

पहली गेंद फेंके जाने से पहले ही बोर्ड की कमाई सुनिश्चित हो गई थी क्योंकि उसने टेलीवीज़न पर प्रतियोगिता दिखाए जाने की डील कर ली थी और साथ ही विभिन्न टीमों को खरीदने वाली फ़ेंचाइज़ी से उसे पैसा मिला था.

बोर्ड के अलावा बाक़ी लोगों ने तो आईपीएल में इतना पैसा लगाया है कि प्रतियोगिता की सफलता के बावजूद शायद ये लोग मुनाफ़ा नहीं कमा पाएँगे.

लेकिन इन बातों का पता तभी चलेगा जब असली आँकड़ें सामने आएँगे. और ये तभी संभव है जब आईपीएल ख़त्म हो जाएगी. इसलिए अभी से इस पर अपनी नींद गंवाने की ज़रूरत नहीं है.

मीडिया की चुप्पी

क्यों चुप्प है मीडिया
 एक बात जो सबसे अजीब लगी है वो ये कि मीडिया ने आईपीएल की किस तरह से रिपोर्टिंग की.ऐसा लग रहा है कि मानो आईपीएल और मीडिया दोनों इस शो में साझीदार हों. वरना ये बात समझ से परे है कि न तो किसी ने इसके स्वरुप की आलोचना की और ही न आयोजकों की. प्रतियोगिता से जुड़े दूसरे मुद्दों को भी नहीं उठाया, ऐसे मसले जहाँ सुधार की ज़रूरत हो.
 

मुझे जो बात सबसे अजीब लगी वो ये कि मीडिया (प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक) ने आईपीएल की किस तरह से रिपोर्टिंग की.

ऐसा लग रहा है कि मानो आईपीएल और मीडिया दोनों इस शो में साझीदार हों. वरना ये बात समझ से परे है कि न तो किसी ने इसके स्वरुप की आलोचना की और ही न आयोजकों की.

प्रतियोगिता से जुड़े दूसरे मुद्दों को भी नहीं उठाया, ऐसे मसले जहाँ सुधार की ज़रूरत हो.

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में तो ऐसी ख़बरें ख़ूब चलती हैं जो भ्रष्टाचार, पक्षपात या अधिकारियों के ग़लत रवैये से जुड़ी हुई हों. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तो ऐसी कहानियाँ वहाँ भी बना लेता है जहाँ ऐसा कुछ भी नहीं होता.

इसीलिए आईपीएल के प्रमुख ललित मोदी और बोर्ड के कुछ अन्य अधिकारियों से जुड़ी कुछ ख़बरों पर मीडिया की चुप्पी समझ में नहीं आती, वो ख़बरें जो इन लोगों की नकारात्मक छवि पेश कर सकती है.

एक अख़बार ने कुछ दिन पहले अपने पहले पन्ने पर कहानी छापी थी कि कैसे ललित मोदी के कुछ रिश्तेदार कथित तौर पर राजस्थान और मोहाली टीम के मालिक हैं और या फिर कैसे क्रिकेट बोर्ड के कुछ अधिकारियों के रिश्तेदार आईपीएल को चला रहे हैं.

लेकिन मीडिया ने इस कहानी को ज़ोर-शोर से नहीं उठाया.

हिंदुस्तान टाइम्स अख़बार ने भी एक कहानी की थी कि कैसे अतीत में
ललित मोदी पर कथित तौर पर मादक द्रव्यों से जुड़े मामले थे और कैसे इन आरोपों से जुड़ा मामला कोर्ट में चल रहा है कि उन्होंने कथित तौर पर धोखाधड़ी से राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन की कमान संभाली.

लेकिन इस ख़बर पर भी मीडिया ने चुप्पी साधे रही. इस कहानी की तह तक पहुंचने के बजाय इस बात पर ही सवाल उठाए गए कि ख़बर छापने के पीछे क्या मकसद हो सकता है और ये अभी क्यों छापी गई.

देश बड़ा या क्लब?

ऐसी बातें जिनका भविष्य में क्रिकेट की दुनिया पर दूरगामी असर हो सकता है, उन्हें भी नज़रअंदाज़ किया गया है.

ये बात अजीब सी नहीं लगती कि सचिन अगर पूरी तरह फ़िट नहीं थे
लेकिन वे शायद आईपीएल में अपनी फ़्रेंचाइज़ी के दवाब में खेले. इस वजह से उनकी चोट ठीक होने के बजाय और खराब हो गई और वे भारतीय टीम में नहीं खेलेंगे.इस ख़बर को भी नज़रअंदाज़ कर दिया गया.

यही बात ज़हीर खान पर भी लागू होती है. वे भी चोटिल थे लेकिन आईपीएल में खेले और अब भारतीय टीम से बाहर हैं.

मुझे कोई हैरानी नहीं होगी अगर आईपीएल के फ़ाइनल के बाद ये पता चले कि और खिलाड़ी भी घायल हैं और वे बांग्लादेश में होने वाली त्रिकोणीय सिरीज़ में न खेल पाएँ.

हम ये तर्क दे सकते हैं कि इस मुक़्त बाजा़र में किसी भी खिलाड़ी को पूरा हक़ है ये चयन करने का कि वो अपने देश के लिए खेले या अपने क्लब के लिए. लेकिन इस पूरी बहस को सिरे से नज़रअंदाज़ क्यों किया जाए?

 व्यवसाय, मनोरंजन और मुनाफ़े के इस गठजोड़ या मिलन में अगर कोई जीता है तो कॉरपोरेट जगत और अगर किसी की हार हुई है तो भारतीय मध्यम वर्ग की
 

मुझे लग रहा है कि व्यवसाय, मनोरंजन और मुनाफ़े के इस गठजोड़ या मिलन में अगर कोई जीता है तो कॉरपोरेट जगत और अगर किसी की हार हुई है तो भारतीय मध्यम वर्ग की.

मध्यम वर्ग की हार इसलिए हुई है क्योंकि वैश्विकरण के इस दौर में इसी दुनिया का हिस्सा बनने का सपना तो वो देख रहा है और मध्यम वर्ग को लग रहा है कि पैसा बनाने वाले ये क्लब उस दुनिया का अहम हिस्सा हैं.

लेकिन इस सब के बीच एक निष्पक्ष बहस करने से उन्हें वंचित किया जा रहा है. एक ऐसी बहस जो अंत में आईपीएल को ही फ़ायदा पहुँचाएगी क्योंकि इस चर्चा के ज़रिए प्रतियोगिता में कई सुधार किए जा सकते हैं.

और इन सुधारों का फ़ायदा सबको होगा- निवेशकों को, पैसा लगाकर
देखकर मैच देखने वाली आम जनता को और खिलाड़ियों को.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स स्पोर्ट्स के सलाहकार हैं)

 
 
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