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रविवार, 01 जून, 2008 को 21:59 GMT तक के समाचार
 
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बेमानी साबित हुई अंडरडॉग की संज्ञा
 

 
 
शेन वार्न (फ़ाइल चित्र)
वॉर्न बेहतरीन कप्तान, कोच और खिलाड़ी साबित हुए हैं
भारत की पहली आईपीएल प्रतियोगिता.....मनोरंजन, ग्लैमर और खेल से भरपूर इस मेले में जंग थी आठ टीमों के बीच.

बादशाहत के लिए दावेदार तो कई थे लेकिन ताज सजा राजस्थान रॉयल्स के सर पर.

आईपीएल का बादशाह बनने के लिए मुकाबला आसान नहीं थी. चेन्नई सुपर किंग्स, किंग्स इलेवन पंजाब, बंगलौर रॉयल चैंलेंजर्स... इन टीमों के नाम ही शाही नहीं थे बल्कि ठाठ-बाठ भी शाही थे

बंगलौर रॉयल चैंलेंजर्स को खरीदने पर विजय माल्या ने 446 करोड़ खर्च किए तो चेन्नई पर 364 करोड़ रुपए खर्च हुए. प्रीति ज़िंटा ने किंग्स इलेवन पंजाब पर 304 करोड़ उड़ेल डाले. सबसे ज़्यादा जेब खाली हुई मुकेश अंबानी की जिन्होंने मुंबई के लिए 447 करोड़ रुपए दिए.

लेकिन इन सबको मात देकर आईपीएल का ख़िताब एक ऐसी टीम ने जीता जिस पर मात्र 268 करोड़ खर्च किए गए. शायद कई लोग ये भी याद न कर पाएँ कि इस टीम को आख़िर ख़रीदा किसने था.

न पैसा काम आया न ग्लैमर

बड़े सितारों की टीमें पीछे छूट गईं

जब जनवरी में आईपीएल की फ़ेंचाइज़ी के लिए बोली लगी और एमर्जिंग मीडिया ग्रुप ने राजस्थान रॉयलस की टीम ख़रीदी थी तो बहुत कम लोगों की नज़र इस टीम पर गई होगी.

सारी सुर्खियाँ या तो बॉलीवुड की हस्तियों वाली टीमों ने ले ली- शाहरुख़ की कोलकाता नाइट राइडर्स और प्रीटि ज़िंटा की किंग्स इलेवन पंजाब. या फिर विजय माल्या और मुकेश अंबानी जैसे हाई-प्रोफ़ाइल उद्योगपतियों की टीमों ने.

 दरअसल राजस्थान ने लगातार अच्छा प्रदर्शन किया. कन्सिसटेंसी उसका सबसे बड़ा हथियार रहा. ये ज़रूरी नहीं होता कि कोई हाई प्रोफ़ाइल टीम ही बड़े-बड़े खिताब जीत सकती है. मुझे याद है जब भारत ने विश्व कप जीता था. वेस्टइंडीज़ जैसी बड़ी टीम को हराया था. टीम लगातार अच्छा खेल रही थी, गेंदबाज़ी, बल्लेबाज़ी सब पर ध्यान दिया गया और नतीजा सबने देखा
 
क़मर अहमद

राजस्थान अपना पहला मैच डेल्ही डेयरडेविल्स के दिलेर शेरों से नौ विकेट से हार गई.

लेकिन इस प्रतिकूल माहौल के बीच और मीडिया की नज़रों से ओझल शेन वॉर्न अपनी सेना को लेकर रणनीति बनाते गए. अगला ही मैच उन्होंने किंग्स इलेवन पंजाब से जीता. जीत का सिलसिला लगातार पाँच मैचों तक चला.

शेन वॉर्न ने कोच और कप्तान की भूमिका बेहतरीन तरीके से अदा की और फिर मैदान पर एक खिलाड़ी के नाते भी पुरज़ोर तरीके से खेले.

आईपीएल प्रतियोगिता में राजस्थान के प्रदर्शन पर खेल पत्रकर क़मर अहमद कहते हैं, " दरअसल राजस्थान ने लगातार अच्छा प्रदर्शन किया. कन्सिसटेंसी उसका सबसे बड़ा हथियार रहा. ये ज़रूरी नहीं होता कि कोई
हाई प्रोफ़ाइल टीम ही बड़े-बड़े खिताब जीत सकती है. मुझे याद है जब भारत ने विश्व कप जीता था. वेस्टइंडीज़ जैसी बड़ी टीम को हराया था. टीम लगातार अच्छा खेल रही थी, गेंदबाज़ी, बल्लेबाज़ी सब पर ध्यान दिया गया और नतीजा सबने देखा."

राजस्थान की टीम के साथ भी कुछ वैसा ही हुआ. टीम में यूसुफ़ पठान, शेन वाटसन, ग्रेम स्मिथ और सोहेल तनवीर जैसे खिलाड़ी थे.

लेकिन बाक़ी टीमों के बड़े स्टार खिलाड़ियों की मुकाबले इन्हें शुरु में न तो मीडिया ने ज़्यादा तरजीह दी और न आम जनता ने.

शायद यह बात राजस्थान रॉयल्स के पक्ष में ही गई. टीम पर न तो मीडिया का अवांछित ध्यान था, न टीम पर अपेक्षाओं का उतना दवाब.

थोड़ा हुनर, थोड़ी रणनीति

राजस्थान की उपलब्धियाँ
राजस्थान ने 14 में से 11 मैच जीते
यूसुफ़ पठान-मैन ऑफ़ द मैच
शेन वाटसन- प्लेयर ऑफ़ द सिरीज़
तनवीर-बोलर ऑफ़ द सिरीज़

इस सब के बीच शेन वॉर्न और उनकी टीम ने बेहतरीन रणनीति और खेल भावना के बल बूते एक-एक कर बड़ी-बड़ी टीमों को उखाड़ना शुरु कर दिया.

भले ही खिलाड़ियों की हौसला अफ़ज़ाई के लिए कोई शाहरुख़ खान या प्रीटि ज़िंटा मैदान पर मौजूद नहीं थे लेकिन अपने 14 में से 11 मैच टीम ने जीते.

और देखते ही देखते टीम सेमीफ़ाइनल तक पहुँच गई. टीम के खिलाड़ियों का प्रदर्शन कितना उम्दा रहा इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि प्लेयर ऑफ़ द फ़ाइनल मैच का ख़िताब, प्लेयर ऑफ़ द सिरीज़ और बोलर ऑफ़ द सिरीज़ तीनों ख़िताब राजस्थान रॉयल्स के खिलाड़ियों ने जीते.

यूसुफ़ पठान मैन ऑफ़ द मैच बने, शेन वाटसन प्लेयर ऑफ़ द सिरीज़ और तनवीर बने बोलर ऑफ़ द सिरीज़.

पठान को तो इस सिरीज़ का सबसे बड़ा करिश्मा माना जा रहा है. क़मर अहमद कहते हैं कि यूसुफ़ पठान जैसे खिलाड़ियों को इस जीत का सबसे ज़्यादा फ़ायदा होगा.

भविष्य में सोहेल तनवीर और यूसुफ़ पठान जैसी खिलाड़ी कितने बड़े सितारे साबित होंगे ये कहना तो मुश्किल है.

लेकिन फ़िलहाल इन खिलाड़ियों ने ये साबित ज़रूर कर दिया है कि अगर हुनर हो, खेल भावना हो, सही रणनीति हो और कुछ कर गुज़रने का जज़्बा हो तो ग्लैमर और पैसे का रंग भी इनके सामने फ़ीका पड़ जाता है और अंडरडॉग जैसी सारी संज्ञाएँ बेमानी साबित हो सकती हैं.

 
 
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