कारों की बिक्री कम होने में OLA-UBER का कितना असर? फ़ैक्ट चेक

  • 12 सितंबर 2019
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भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने ओला और उबर जैसी कैब सेवाओं को ऑटो सेक्टर में चल रही गिरावट के मुख्य कारणों में से एक बताया है.

निर्मला सीतारमण की प्रेस वार्ता का एक वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया जा रहा है जिसमें उन्हें यह कहते सुना जा सकता है कि 'मिलेनियल नए वाहन ख़रीदने के लिए मासिक क़िस्तों में बंधना नहीं चाहते और ओला-उबर जैसी कैब सेवाओं का इस्तेमाल कर रहे हैं. इसका असर ऑटो इंडस्ट्री पर पड़ रहा है.'

गुरुवार को #Millennials ट्विटर के टॉप ट्रेंड्स में शामिल रहा जिसके साथ बहुत से लोग उनके बयान पर चुटकी लेते दिखे.

मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के सौ दिन पूरे होने पर चेन्नई में हुई एक प्रेस वार्ता के दौरान उनसे पूछा गया था कि "सोसायटी ऑफ़ इंडियन ऑटोमोबिल मैन्युफ़ैक्चरर्स (सियाम) के अनुसार अगस्त महीने की वाहन बिक्री में लगातार नौवें महीने भारी गिरावट दर्ज की गई है. ऑटो सेक्टर में यह सुस्ती कब तक रहने की उम्मीद है? कई बड़े कार डीलर ये दावा कर रहे हैं कि सरकार गाड़ियों की बिक्री पर 28 प्रतिशत एसजीएसटी और 17 प्रतिशत सेस वसूल रही है जिसमें कुछ कटौती की जाये तो इससे ऑटो बिक्री बढ़ेगी. इस पर सरकार ने क्या विचार किया?"

इसके जवाब में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था, "मैं आपकी बात से सहमत हूँ. ये ठीक तर्क लगता है. पर यह भी सच है कि दो साल पहले तक भारतीय ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री का अच्छा समय रहा है. लेकिन कई कारण हैं जिसकी वजह से अब इसमें गिरावट दर्ज की जा रही है. बीएस-6 का आना और रजिस्ट्रेशन फ़ीस से संबंधित कारण इसमें शामिल हैं. इसके अलावा कुछ अध्ययन हुए हैं जो बताते हैं कि मिलेनियल (नई पीढ़ी के लोग) कोई नया वाहन ख़रीदने के लिए क़र्ज़ लेकर मासिक क़िस्तों में बंधना नहीं चाहते और सफ़र करने के लिए ओला और उबर जैसी सेवाओं या फिर मेट्रो से जाना बेहतर समझते हैं. ये सभी कारण ऑटो इंडस्ट्री पर असर डाल रहे हैं."

बीते दो दशक में पैसेंजर वाहनों की बिक्री का जो सबसे ख़राब प्रदर्शन अगस्त 2019 में दर्ज किया गया है, उस पर वित्त मंत्री की इस दलील में कितना दम है?

हमने इसकी पड़ताल की और पाया कि सियाम के आंकड़े, पिछले वर्षों में टैक्सी या कैब के रजिस्ट्रेशन का डेटा और कैब सेवाओं का गिरता 'ग्रोथ रेट' वित्त मंत्री के बयान पर सवाल उठाते हैं.

गिरावट कारों तक सीमित नहीं

वाहन कंपनियों का संगठन 'सोसायटी ऑफ़ इंडियन ऑटोमोबिल मैन्युफ़ैक्चरर्स' वित्त वर्ष 1997-98 से वाहनों की थोक बिक्री के आंकड़े दर्ज कर रहा है.

सियाम के अनुसार भारत में जो गाड़ियाँ ओला और उबर जैसी कैब सेवाओं द्वारा इस्तेमाल की जा रही हैं, उनकी बिक्री में ठीकठाक गिरावट दर्ज की गई है.

संगठन की रिपोर्ट बताती है कि मौजूदा गिरावट कारों (पैसेंजर व्हीकल) की बिक्री तक सीमित नहीं है.

थ्री व्हीलर, ट्रैक्टर, ट्रक और अन्य भारी वाहनों समेत दुपहिया वाहनों की बिक्री में भी पिछले साल की तुलना में गिरावट दर्ज की गई है. यानी ओला और उबर में इस्तेमाल न होने वाले वाहनों की बिक्री में भी गिरावट दर्ज की गई है.

सियाम के अनुसार इन सभी श्रेणी के वाहनों की बिक्री में पिछले नौ महीने से लगातार गिरावट देखी जा रही है.

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सियाम ने 9 सितंबर 2019 को जारी अपनी प्रेस रिलीज़ में दावा किया है कि अप्रैल-अगस्त 2018 में भारतीय ऑटो इंडस्ट्री ने जहाँ 13,699,848 वाहन बनाये थे, वहीं अप्रैल-अगस्त 2019 में यह आंकड़ा घटकर 12,020,944 रह गया.

यानी वाहनों के प्रोडक्शन में भी 12.25 फ़ीसदी की गिरावट हुई है.

भारत में सबसे अधिक कारें बेचने वाली कंपनी मारुति सुज़ुकी इंडिया के एग्ज़ीक्यूटिव डायरेक्टर शशांक श्रीवास्तव ने समाचार एजेंसी पीटीआई से कहा है, "भारतीय वित्त मंत्री ने जो बात कही है, उस नतीजे पर पहुंचने के लिए व्यापक अध्ययन की ज़रूरत है. फ़िलहाल हमें नहीं लगता कि देश में कारों की ऑनरशिप का पैटर्न बदला है और गाड़ियों की गिरती बिक्री में ओला-उबर का चलन कोई बड़ा कारण है."

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शशांक कहते हैं, "ओला और उबर जैसी कैब सेवाएं पिछले 6-7 साल में ही शुरु हुई हैं. यही वो दौर भी है जिसे ऑटो इंडस्ट्री का सबसे अच्छा वक़्त कहा जा सकता है. तो बीते कुछ महीनों में इन कैब सेवाओं ने ऐसा क्या कर दिया जिसकी वजह से पूरी इंडस्ट्री में गिरावट होने लगे. मैं नहीं मानता कि ये गिरावट ओला-उबर के कारण है."

अमरीकी ऑटो सेक्टर का ज़िक्र करते हुए शशांक ने कहा कि अमरीका में आज उबर का नेटवर्क बहुत बड़ा है, फिर भी गाड़ियों की बिक्री बीते कुछ वर्षों में ज़बरदस्त रही है.

वरिष्ठ अर्थशास्त्री विवेक कौल ने ऑटो सेक्टर की इस हालत पर बीबीसी से कहा, "मिलेनियल्स के पैसेंजर कारें ना ख़रीदने को ऑटो सेक्टर की सुस्ती का कारण बताना, इस पूरी स्थिति को बहुत हल्के में आंकने वाली बात है. ऑटो सेक्टर की हर श्रेणी में गिरावट दर्ज की जा रही है. सच्चाई ये है कि सोसायटी में पैसे ख़र्च करने को लेकर चिंताए हैं और लोग 'इकोनॉमिक फ़्यूचर' को लेकर विश्वस्त नहीं हैं."

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कैब रजिस्ट्रेशन कम हुआ

वित्त मंत्री के बयान के अनुसार कुछ संभावित ख़रीदारों ने ओला और उबर जैसी सेवाओं के चलते पैसेंजर वाहन नहीं ख़रीदे.

तो क्या इस स्थिति में ओला-उबर समेत अन्य टैक्सी सेवाओं के लिए चल रहे वाहनों की संख्या में वृद्धि हुई है?

इसकी पड़ताल करने के लिए हमने कुछ राज्यों के कमर्शियल वाहनों के रजिस्ट्रेशन के आंकड़ों पर नज़र डाली.

रिसर्च के लिए हमने दिल्ली, महाराष्ट्र, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल को चुना क्योंकि इन राज्यों में ओला और उबर जैसी ऐप बेस्ड टैक्सी सेवाएं अन्य राज्यों के मुक़ाबले बड़े पैमाने पर काम कर रही हैं.

ओला और उबर इन राज्यों में कारों के साथ-साथ ऑटोरिक्शा के ज़रिए भी अपनी सर्विस मुहैया करा रहे हैं.

हमने पाया कि इन सभी राज्यों में 1 जनवरी से 11 सितंबर 2018 की तुलना में इस वर्ष 11 सितंबर तक टैक्सी और थ्री व्हीलरों का कमर्शियल रजिस्ट्रेशन कम हुआ है.

क्या कैब यूज़र तेज़ी से बढ़े?

ऑटो सेक्टर के विश्लेषकों के अनुसार ऐप बेस्ड कैब सेवाओं का इस्तेमाल करके भारत में लोग रोज़ाना 36 लाख से ज़्यादा राइड (सफ़र) करते हैं.

वित्त मंत्री अपने बयान में इन्हीं लोगों का ज़िक्र कर रही थीं जो उनके हिसाब से गाड़ी ख़रीद सकते थे, लेकिन इनमें से अधिकांश लोगों ने कैब की मदद से अपना सफ़र जारी रखा.

पर क्या ऐसे लोगों की संख्या देश में बहुत तेज़ी से बढ़ी है जिसकी वजह से ऑटो सेक्टर पर इसका असर दिखने लगे? ऐसा नहीं है.

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हाल ही में 'इकोनॉमिक टाइम्स' अख़बार में ऑटो सेक्टर के विश्लेषकों और ओला-उबर कंपनी के अंदरूनी सूत्रों के हवाले से एक रिपोर्ट छपी थी जिसके मुताबिक़ इन कंपनियों की ग्रोथ अब बहुत धीमी गति से हो रही है.

इस रिपोर्ट के अनुसार साल 2019 में ऐप बेस्ड कैब सेवाओं का इस्तेमाल करते हुए सिर्फ़ डेढ़ लाख नई राइड की गई हैं. जबकि साल 2018 में ओला-उबर यूज़र्स ने क़रीब 35 लाख राइड की थीं.

रिपोर्ट में लिखा है कि साल 2016 में ये कंपनियाँ 90 फ़ीसद के ग्रोथ रेट पर थीं जो 2017 में घटकर 57 फ़ीसद हुआ, 2018 में 20 फ़ीसद और जून 2019 तक यह ग्रोथ रेट 4.5 फ़ीसद रह गया है.

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तो वित्त मंत्री की दलील को ख़ारिज कर दिया जाए?

बीबीसी से बात करते हुए भारतीय बैंक एचडीएफ़सी के चीफ़ इकोनॉमिस्ट अभीक बरुआ ने कहा कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की बात में पॉइंट है और उसे सिरे से ख़ारिज करना नादानी भरा है.

अभीक ने कहा, "इसमें कोई शक़ नहीं कि ऑटो सेक्टर कई वजहों से गिर रहा है. फ़ाइनेंसिंग में कमी भी एक बड़ा कारण है. पर मिलेनियल कार ख़रीदने की जगह ऐप बेस्ड कैब सेवाओं को पसंद कर रहे हैं और इसका कोई असर ऑटो सेक्टर पर नहीं है, यह सोचना एक भूल साबित हो सकता है. कार निर्माताओं को इसके बारे में सोचना चाहिए."

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निर्मला सीतारमण के बयान पर हो रही चर्चा के बीच कई लोग महिंद्रा कंपनी के चेयरमैन आनंद महिद्रा का चार साल पुराना ट्वीट और उनका बयान भी शेयर कर रहे हैं जहाँ उन्होंने कहा था, "ओला और उबर जैसे टैक्सी ऐप आने वाले समय में ऑटो बिक्री को खा सकते हैं. उस वक़्त लोग वही कारें ख़रीदेंगे जिनसे वो प्यार कर रहे होंगे."

5 सिंबतर 2019 को 59वें सियाम सम्मेलन में बोलते हुए कोटक महिंद्रा बैंक के चेयरमैन उदय कोटक ने भी ऑटो सेक्टर में ग्राहकों की बदलती सोच के बारे में बात की थी.

ओला और उबर का उदाहरण देते हुए उदय कोटक ने कहा था, "कैब सेवाएं गाड़ियों की क्षमता का 40-50 फ़ीसद तक उपयोग करती हैं तो एक प्राइवेट कार का उपयोग सिर्फ़ 3-5 फ़ीसद ही होता है. ऐसे में जब लोगों की सोच में संरचनात्मक बदलाव हो रहा है, तो ऑटो इंडस्ट्री को भी इस बदलाव के बारे में सोचना पड़ेगा."

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'मिलेनियल सोच' से निर्मला का क्या मतलब था?

क्या है वो 'मिलेनियल सोच' जिसका वित्त मंत्री ने अपने बयान में ज़िक्र किया? यह समझने के लिए हमने सीनियर ऑटो जर्नलिस्ट किशी सिंह से बात की.

उन्होंने कहा, "इसे समझने के लिए उदाहरण के तौर पर किसी 22 वर्षीय मिलेनियल को लेते हैं जिसकी नई-नई नौकरी लगी है. उसे गाड़ी ख़रीदनी है जिसके लिए उसे 4-6 लाख रुपये तो चाहिए. माँ-बाप से मदद न मिले तो उसे लोन लेना होगा जिसकी किस्तें बंधेंगी. यानी 22 साल की उम्र में वो कर्ज़दार बन गया. फिर कार का सालाना इंश्योरेंस देना है, डीज़ल या पेट्रोल देना है, और टायर-बैट्री वक़्त पर चेंज कराने होंगे."

"इन सबके बीच उस मिलेनियल का सबसे बड़ा दुश्मन है 'डेप्रीसिएशन' यानी कार की गिरती क़ीमत. 4-6 लाख की उसकी गाड़ी तीन साल बाद ही 2 लाख से ज़्यादा की नहीं बिकेगी. बड़ी और महंगी गाड़ियों में डेप्रीसिएशन और भी ज़्यादा होता है. अब इस पूरी क़ीमत के सामने अगर ओला या उबर से चलने का ख़र्च निकाला जाए तो वो कम बैठता ही है. साथ ही नए लोगों को लगता है कि कैब से चलने के बाकी झंझट भी कम हैं. जैसे आपको सिर्फ़ बैठकर जाना है, चालान की चिंता नहीं, कार का ध्यान रखना उनका काम नहीं, पार्किंग की चिंता नहीं और फिर किसी भी अवस्था में वो आ-जा सकते हैं."

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किशी सिंह इस बात पर ज़ोर देते हैं कि कारों की बिक्री घटने के दस कारण गिने जायें तो 'मिलेनियल सोच' पहली पाँच वजहों में नहीं रखी जा सकती.

उन्होंने कहा, "तकनीकी तौर पर देखें तो 'भारत स्टेज-6' के आने से कार बाज़ार में काफ़ी ज़्यादा रुकावट हुई है. बहुत से ग्राहक इसके लागू होने का इंतज़ार कर रहे हैं और तब तक कैब सेवाओं या मेट्रो (सार्वजनिक ट्रांसपोर्ट) से उनका काम चला रहा है."

भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बयान पर ऑटो सेक्टर से जुड़े विभिन्न विशेषज्ञों और संगठनों के बयानों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि कारों की बिक्री कम होने में ओला-उबर का इस्तेमाल बड़ा कारण नहीं है.

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