हर वक़्त काम से जुड़े रहने के फ़ायदे और नुकसान

  • 17 अक्तूबर 2016
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तेज़ी से तरक़्क़ी करती तकनीक के इस दौर में आज दुनिया अक्सर ऑनलाइन मिलती है. ख़ास तौर से कारोबारी और वर्किंग प्रोफ़ेशनल. वो मैसेज, मेल या सोशल मीडिया के ज़रिए हर वक़्त या तो काम कर रहे होते हैं या काम पर नज़र रखे होते हैं.

कुछ लोगों का मानना है कि निजी और पेशेवर ज़िंदगी के बीच अच्छे तालमेल के लिए ये ठीक नहीं. आप हर वक़्त अगर काम पर ही नज़र रखेंगे, तो परिवार को, निजी ज़िंदगी को, अपने शौक़ को कब वक़्त दे पाएंगे?

चौबीसों घंटे ऑनलाइन रहने वाली दुनिया में ये सवाल उठना लाज़िमी है. तो क्या वाक़ई हर वक़्त काम पर नज़र रखना इतना बुरा है?

इसका जवाब है, शायद नहीं.

क्योंकि आज की पीढ़ी को चौबीसों घंटे काम पर नज़र रखने के साथ ही निजी ज़िंदगी जीने की आदत पड़ चुकी है.

जैसे अमरीका की नौकरी देने वाली कंपनी रैंडस्टैंड की प्रेसीडेंट ट्रेसी फिएट को ही लीजिए. वो आज भी रविवार को, यानी छुट्टी के दिन अपनी कंपनी की मेल चेक करना पसंद है. इससे वो सोमवार सुबह के काम लिए अच्छे से तैयार हो जाती हैं.

हालांकि आज से पांच साल पहले ऐसा नहीं था. ट्रेसी लगातार अपनी मेल पर नज़र रखती थीं. छुट्टी के दिन भी वो मातहतों को घर से ई-मेल भेजा करती थीं.

अचानक एक दिन ट्रेसी को लगा कि उनका छुट्टी के दिन भी काम करना, उनके मातहत लोगों पर दबाव बढ़ा देता है. ख़ास तौर से नौकरी छोड़ने वाले लोगों से उन्हें ये फीडबैक मिला कि, ट्रेसी का छुट्टी के दिन ई-मेल करना, बाक़ियों पर भी छुट्टी के दिन काम करने का दबाव बना रहा था.

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अमरीका में 2013 में हुए एक सर्वे में शामिल आधे लोगों ने बताया कि वो छुट्टी के दिन अपनी नौकरी से जुड़े मैसेज या मेल चेक करते हैं. छुट्टियों पर जाने पर भी वो दिन में कम से कम एक बार ऐसा कर रहे थे.

अमरीकी साइकोलॉजिकल एसोसिएशन के डेविड बलार्ड कहते हैं कि ये इतनी बुरी बात भी नहीं. 2013 के सर्वे में शामिल ज़्यादातर लोगों को यही लगा कि वो अपनी निजी और पेशेवर ज़िंदगी के बीच अच्छे से तालमेल बना लेते हैं.

इस सर्वे में 71 फ़ीसद ने कहा कि काम के घंटो पर उनका कंट्रोल है. वहीं 56 प्रतिशत ने माना कि तकनीक की वजह से उनका काम करना आसान हुआ है.

डेविड बलार्ड कहते हैं कि हर वक़्त काम का बोझ दिल-दिमाग़ पर लेने के भी फ़ायदे हैं, इसका उन्हें अंदाज़ा नहीं था. लोगों को लगता है कि तकनीक की वजह से वो घर बैठे भी दफ़्तर का काम निपटा लेते हैं. इससे कई बार दफ़्तर में उनका काम का बोझ कम होता है.

हर वक़्त ऑनलाइन रहने से कुछ लोगों को ये एहसास होता है कि वो कंपनी के लिए बेहद अहम हैं. उनको ये अच्छा लगता है कि रात में उन्होंने बॉस का मेल सबसे पहले देखा और उसका जवाब दिया. फ़ोन की जलती हुई लाइट उन्हें ख़ुद के ख़ास होने का एहसास कराती है.

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युवा पीढ़ी हर काम जल्द से जल्द निपटाना चाहती है. कोई मेल या मैसेज आने पर फ़ौरन उसका जवाब देकर काम ख़त्म करना चाहती है. इसके लिए निजी ज़िंदगी में तकनीक का दखल उन्हे बुरा नहीं लगता. वो इसके आदी हो चुके हैं. हर वक़्त फ़ोन में ताक-झांक करने की उनकी आदत हो चुकी है.

कई बार हमेशा ऑनलाइन होना इंसान की मजबूरी होती है. ख़ासकर उन लोगों के लिए जो नया काम शुरू करते हैं. नई कंपनी से जुड़ते हैं. या, नया कारोबार शुरू करते हैं. उन्हें हर वक्त ऑनलाइन रहने से अपना काम आगे बढ़ाने में सहूलत होती है.

वैसे कई लोगों को ये भी लगता है कि उनके बॉस चाहते हैं कि वो हर वक़्त ऑनलाइन रहें. तकनीक की वजह से ऐसा मुमकिन भी हो गया है कि आप कहीं से भी काम कर सकें. इसलिए भी आपसे हर मेल का फौरन जवाब देने की उम्मीद की जाती है.

कई बार बॉस बेवक़्त ई-मेल भेजते हैं. वो ये भी साफ़ नहीं करते कि उन्हें इसका जवाब कब तक चाहिए. बेहतर हो कि वो ई-मेल में ही लिख दे कि इसका जवाब देने की जल्दी नहीं. तो उनके मातहत, फौरन जवाब देने का दबाव महसूस नहीं करेंगे.

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कई बार, नीचे काम करने वाले कर्मचारियों को लगता है कि बॉस पता नहीं कब किस बात पर जवाब तलब कर लें. इसलिए वो घर पर होते हुए भी दफ़्तर के मेल चेक करते रहते हैं. कुछ लोगों का मन नहीं भी होता तो वो अपने बाक़ी सहकर्मियों को ऑनलाइन देखकर दबाव महसूस करते हैं.

हर वक़्त ऑनलाइन रहना और मेल का जवाब देना हर वक़्त ज़रूरी नहीं होता. जैसे कि ट्रेसी फिएट को ही लगा कि उनके देर-सबेर मेल करने से मातहतों को दबाव महसूस होता है.

अब ट्रेसी छुट्टी के दिन मेल करने से बचती हैं. वो रविवार शाम को दफ़्तर के मेल चेक ज़रूर करती हैं. मगर कोई फौरी ज़रूरत होने पर संबंधित कर्मचारी को फ़ोन कर लेती हैं. मेल करने से बचती हैं.

साथ ही ट्रेसी अपनी कंपनी के कर्मचारियों को सलाह देती हैं कि छुट्टी के वक़्त वो दफ़्तर के काम पर ध्यान न दें. वो कर्मचारियों को समझाती हैं कि यहां कोई जंग नहीं लड़ी जा रही है कि दुश्मन पर तुरंत पलटवार ज़रूरी है.

आज की ऑनलाइन दुनिया में ट्रेसी का फॉर्मूला ही सही लगता है. ये निजी और पेशेवर ज़िंदगी में तालमेल बिठाने की मिसाल बन सकता है.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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