ग्लोबलाइजेशन के दौर में कहां के हम हैं

  • केट मेबेरी
  • बीबीसी कैपिटल
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तीसरी संस्कृति वाले बच्चे को हर दूसरे तीसरे साल अपना घर-बार छोड़ दूसरी जगह दुनिया बसाना पड़ता है

इंसान के किरदार की मज़बूती इस बात से झलकती है कि वो जड़ों से जुड़ा होता है. जिस जगह, जिस देश, जिस माहौल का होता है उसकी झलक उसके बर्ताव में मिलती है.

मगर उनका क्या जिन्हें पता ही न हो कि वो ख़ुद को कहां का मानें?

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अजी साहब, आज ग्लोबलाइज़ेशन के दौर में बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्हें अपनी जड़ों का पता नहीं. वो ग्लोबल सिटिज़न हैं, मगर वो ख़ुद को किसी एक देश का होना महसूस नहीं कर पाते. ख़ास तौर से ऐसे बच्चों की नई पीढ़ी जिनके मां-बाप अलग-अलग देशों में जाकर काम करते हैं.

ऐसे बच्चों को 'थर्ड कल्चर किड्स' यानी तीसरी संस्कृति वाले बच्चे कहा जाता है. इन्हें हर दूसरे तीसरे साल अपना घर-बार, स्कूल-साथी छोड़कर दूसरी जगह अपनी दुनिया बसाने जाना पड़ता है.

इन बच्चों को थर्ड कल्चर किड का नाम दिया था अमरीका की रूथ हिल उसीम ने, पचास के दशक में. उनकी नज़र में जिन बच्चों के शुरुआती दिन अलग सभ्यता और संस्कृति में गुज़रते हैं उन्हें 'थर्ड कल्चर किड' कहा जाता है.

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ऐसे ज़्यादातर बच्चे वो होते हैं जिनके मां-बाप ग्लोबलाइजेशन की वजह से तमाम देशों में जाकर काम करते हैं.

ब्रिटेन की फ़िलिपा मैथ्यू पिछले चौदह सालों में ब्रिटेन से लेकर अमरीका, इंडोनेशिया और नॉर्वे तक में रही हैं. वे कहती हैं कि उनके बच्चों में दुनिया की बेहतर समझ है. वो बदलते माहौल में ख़ुद को अच्छे से ढाल लेते हैं. वो ज़िंदगी की चुनौतियों का अच्छे से सामना कर सकते हैं.

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आज जब कंपनियों को ऐसे कर्मचारियों की ज़रूरत है, जो तमाम देशों में जाकर ख़ुद को ढाल लें, वहां की ज़बान बोल सकें, तो ये थर्ड कल्चर किड्स उनके लिए अच्छे कर्मचारी साबित हो सकते हैं. ऐसे बच्चे कई ज़बानें बोल लेते हैं. उन्हें कई देशों में रहने का तजुर्बा होता है. वो वहां के रहन-सहन से वाकिफ़ होते हैं.

अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा भी थर्ड कल्चर किड हैं. जिनकी मां ने केन्या के एक शख्स से शादी की थी. फिर उनसे तलाक़ के बाद रहने के लिए इंडोनेशिया चली गई थी. इसी तरह ब्रिटिश कलाकार कोलिन फर्थ भी मशहूर थर्ड कल्चर किड हैं.

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अमरीका के समाजशास्त्रियों डेविड पोलॉक और रूथ वान रेकेन ने ऐसे बच्चों के बारे में रिसर्च करके क़िताब लिखी है. पोलॉक की अब मौत हो चुकी है. मगर रूथ उनके काम को आगे बढ़ा रही हैं.

वे कहती हैं कि थर्ड कल्चर किड्स के साथ अच्छी बात ये है कि उन्हें दुनिया की बेहतर समझ होती है. वो कई ज़बानें बोल सकते हैं. मगर उन्हें कई बार ये भी एहसास होता है कि वो किसी एक जगह के नहीं. उनकी जड़ों का उन्हें पता नहीं. ऐसी बातें बेचैनी पैदा कर सकती हैं.

अमरीका की लुई बुशोंग, ऐसे बच्चों का तनाव दूर करने में मदद करती हैं. वो कहती हैं कि बार-बार जगह बदलने से बच्चे कई बार तनाव का शिकार हो जाते हैं. उन्हें हर दो साल में नए माहौल से तालमेल बिठाने में दिक़्क़त हो सकती है.

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फिलिपा मैथ्यू अपना तजुर्बा बताती हैं. वो कहती हैं कि उनके बच्चे जब नए स्कूल में जाते थे तो उन्हें साथी बनाने में दिक़्क़त होती थी. लगातार एक साथ पढ़ने वाले बच्चों के कई दोस्त हो जाते हैं. मगर हर दो साल में स्कूल बदलने वाले बच्चों के साथ यही बात चुनौती बन जाती है.

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वे इस चुनौती से निपटने के लिए बच्चों को इंटरनेशनल स्कूल में डालने की सलाह देती हैं. ऐसे स्कूलों में सभी बच्चे ऐसे ही होते हैं. उन्हें आपस में तालमेल बनाने में दिक़्क़त नहीं होती.

एम्सटर्डम से अमरीका आकर बसने वाली गिलियन टैप अपना तजुर्बा बताती हैं. वे अब 18 साल की हैं. 14 साल की उम्र में वो एम्सटर्डम रहने गई थीं. वहां उन्हें साथी बनाने में बहुत परेशानी हुई. क्योंकि उन्होंने जिस स्कूल में दाखिला लिया था, वहां के ज़्यादातर बच्चे बरसों से एक-साथ पढ़ाई कर रहे थे.

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थर्ड कल्चर किड्स का हर जगह घर होता है और कहीं नहीं होता है

ऐसे हालात में मां-बाप को बच्चों की परेशानियों को गंभीरता से लेकर उनकी मदद करनी चाहिए. परेशान बच्चों की मदद, बातचीत और काउंसेलिंग से की जा सकती है, ताकि तनाव के शिकार न हो जाएं.

अच्छी बात ये है कि तमाम देशों में अब ऐसे थर्ड कल्चर किड्स के लिए इंटरनेशनल स्कूल खुल गए हैं. साथ ही ऐसी संस्थाएं चल निकली हैं जो बच्चों को नए माहौल से तालमेल बिठाने में मदद करती हैं.

दुनिया की बेहतर समझ वाले ये बच्चे आगे चलकर मल्टीनेशनल कंपनियों के लिए कारगर कर्मचारी साबित हो सकते हैं.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी पर उपलब्ध है.)

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