सेल में सामान खरीदने से पहले ये ज़रूर सोच लें

  • 1 दिसंबर 2016

'शॉपिंग का इरादा है, मैं जा रही हूं'

'नहीं मुझे कुछ नहीं ख़रीदना'

'अरे, क्लीयरेंस सेल लगी है, कुछ आइटम पर तो एक के साथ एक फ़्री भी है.'

'अच्छा, चलो फिर चलते हैं, थोड़ी शॉपिंग कर ही लेते हैं.'

हम में से अक्सर लोग ऐसा ही करते हैं. जब कहीं किसी दुकान या ब्रैंड पर सेल का बोर्ड देखते हैं तो ख़ुद को खरीदारी करने से रोक ही नहीं पाते. ऐसा लगता है जैसे हम दुकानदार को बेवक़ूफ़ बनाकर कम दाम में ज़्यादा सामान ख़रीद कर ला रहे हैं. मन ही मन एक अलग तरह की जीत का एहसास होता है.

न्यूरोमार्किटिंग के कुछ जानकारों का कहना है कि जब भी हम कहीं सेल का बोर्ड लगा देखते हैं तो हमारे ज़हन में एक ख़ास तरह का ज़ज़्बा पैदा हो जाता है.

हमारे दिमाग़ में कुछ ख़ास तरह की तरंगें पैदा होती हैं, जो दिमाग़ को ख़रीदारी करने का आदेश देने लगती हैं. ऐसे में हम ये फ़ैसला सोच समझ कर नहीं करते कि हमें क्या ख़रीदना है और क्या नहीं. हमें उस चीज़ की ज़रूरत है भी या नहीं. बहुत मर्तबा हम यही सोच कर ख़रीदारी कर लेते हैं कि चलो अभी ख़रीद लेते हैं, जब वक़्त आएगा तब इस्तमाल कर लेंगे. या किसी को तोहफ़े में ही दे देंगे.

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हम जैसे ही ख़रीदारी का फ़ैसला करते हैं हमारे अंदर पॉज़िटिव एनर्जी का संचार हो जाता है. उपभोक्ता मनोवैज्ञानिक किट यरो का कहना है कि जैसे ही हम ख़रीदारी पूरी करते हैं उसके फ़ौरन बाद हमारा मन अपराध बोध से भरने लगता है.

अगर ख़रीदारी करने के बाद भी लगता है कि हमें अभी और ख़रीदारी करनी चाहिए और आप खुद को ऐसा करने से नहीं रोक पाते हैं तो इसकी मनोवैज्ञानिक वजह को समझना ज़रूरी है.

न्यूरो मार्केटिंग रिसर्चर डैरेन ब्रिजर का कहना है कि शॉपिंग करना किसी ख़ज़ाने की तलाश करने जैसा ही होता है.

जब आप किसी शो रूम में जाते हैं या किसी शॉपिंग साइट पर जाते हैं, तो, बहुत सी चीज़ें नज़र आती हैं. आप हरेक चीज़ को बड़े चाव से देखते हैं. आपकी नज़र उस ख़ास चीज़ को तलाशती रहती है जो देखते ही पहली नज़र में पसंद आ जाए, जो बिल्कुल अलग हो. उस चीज़ की मौजूदगी आपको अलग पहचान दिलाए, दस लोग आपसे पूछें कि बहुत अच्छा है, कहां से लिया. और जब वो मन चाही चीज़ आपको मिल जाती है तो मानो मन की मुराद पूरी हो जाती है.

उस ख़ाज चीज़ की तलाश आपको खुशी का एहसास कराती रहती है. रिसर्चर इस एहसास को इमोशनल एंगेजमेंट कहते हैं. उनके मुताबिक़ जैसे ही आपको आपकी पसंद की चीज़ मिल जाती है आपके दिमाग़ में ख़ास तरह की तरंगे पैदा होती है जो दिमाग़ को ख़रीदारी करने का आदेश देती हैं.

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बहुत मर्तबा हमारा पुराना तजुर्बा भी इस एहसास को बल देता है.

मान लीजिए अगर आपको किसी ब्रांड की कोई चीज़ बहुत पसंद आई और आपको वो फिर से नज़र आई तो आप सोचते हैं कि ये चीज़ बेहतर थी इसे फिर से ले लिया जाए.

आपके अच्छे तजुर्बे से उस ब्रांड के लिए आपके दिल में जगह बन जाती है. लिहाज़ा जब आप शॉपिंग के लिए निकलते हैं तो सोचतें हैं चलो एक चक्कर लगा ही लेते हैं. हो सकता है कोई काम की चीज़ मिल जाए.

इसी तरह अगर किसी चीज़ के लिए आपकी दीवानगी है. और जब आप बाज़ार जाते हैं तो पहले से ही तय होता है कि फलां चीज़ तो लेनी है. मिसाल के लिए आपको जूतों का शौक़ है तो जब भी आप शॉपिंग के लिए जाते हैं तो कोशिश रहती है कि कोई अच्छा जूता आपको नज़र आए तो ज़रूर ख़रीद लेंगे.

हम में से अक्सर लोग ख़रीदारी करने के शौक़ीन नहीं होते. लेकिन जिस तरह बाज़ार में चीज़ें हमें लुभाती हैं वो हमें एक तरह से ख़रीदारी करने का आदी बना देती हैं. हफ़्तेवार बाज़ार लगने का चलन सारी दुनिया में है. और बहुत से लोग हर हफ़्ते इस जज़्बाती उठा-पटक के दौर से गुज़रते हैं कि उन्हें बाज़ार जाकर ख़रीदारी करनी है.

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प्रोफ़ेसर यरो कहती हैं कि ये एक तरह का दबाव भी पैदा करता है कि कहीं आपसे पहले कोई और उस चीज़ को ना ख़रीद लें. लिहाज़ा आपके अंदर ही एक ख़ास तरह का मुक़ाबला जीतने की होड़ शुरू हो जाती है.

कुछ रिसर्चर तो ये भी मानते हैं कि बहुत बार हम अपने अंदर की कलह को शांत करने के लिए भी शॉपिंग करते हैं. कुछ परेशानियां ऐसी आ जाती हैं, जब कुछ समझ नहीं आता कि क्या किया जाए. ऐसे में बहुत से लोग ख़रीदारी करके अपने दिमाग़ को उस परेशानी से कुछ वक़्त के लिए दूर कर लते हैं.

इंटरनेट पर कुछ चीज़ों के रिव्यू पढ़ने के बाद भी ऐसा होता है कि हम उस चीज़ को ख़रीद लेते हैं. या बहुत बार हमारे दोस्त ही हमें ऐसा करने के लिए मजबूर कर देते हैं. दरअसल वो अपनी बातों से आपको भी ललचा देते हैं.

प्रोफ़ेसर यरो कहती हैं कि अगर आप बेवजह की ख़रीदारी से बचना चाहते हैं तो सबसे पहला काम ये कीजिए कि मोल भाव करने से बचिए. बिल्कुल ऐसे ही जैसे अगर आप शराब नहीं पीते हैं तो शराबखाने में जाने से बचते हैं. ठीक वैसे ही आपको भी बचना है. जो चीज़ पसंद आए उसकी क़ीमत बाद में देखिए.

ऑनलाइन अगर ख़रीदारी करते हैं तो सेल वाले खाने में सबसे बाद में जाइए. ऑनलाइन आप उन्हीं चीज़ों को तलाशें जिनकी आपको ज़रूरत है. अगर किसी चीज़ की बहुत ज़रूरत है तो उसी चीज़ को अपनी लिस्ट में सबसे पहले रखें. अगर कोई चीज़ ख़रीदने की फ़ौरन चाहत हो भी रही है तो उसे फ़िलहाल टाल दें. दूसरे किसी मौक़े पर ख़रीदारी करें ताकि बेवजह पैसा ख़र्च करने से आप खुद को बचा सकें.

ख़रीदारी जब भी करें अपनी ज़रूरत के मुताबिक़ करें. दिमाग़ बहुत बार आपको पैसे ख़र्च करने के लिए कहेगा. लेकिन आपको अपने दिल और दिमाग़ को यही समझाना है जब ज़रूरत होगी तब ख़रीद लेंगे.

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