नौकरी के अलावा साइड इनकम महिलाओं के लिए कितना ज़रूरी

  • रेणुका रयासम
  • बिजनेस जर्नलिस्ट
कामकाजी महिलाएं

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बहुत से लोग नौकरी छोड़ कर कोई और कारोबार शुरू कर लेते हैं. कुछ लोग नौकरी के साथ-साथ दूसरे कारोबार भी बढ़ाने लगते हैं. ऐसे लोगों के बारे में हो सकता है कि आप सोचते हों कि अच्छी-ख़ासी नौकरी होते हुए भला क्या सूझी कि नौकरी छोड़ दूसरे कारोबार में लग गए.

या ये कि अच्छी पगार वाली नौकरी होते हुए क्या ज़रूरत है दूसरा कारोबार शुरू करने की. तो जनाब हम आप को बता दें ये लोग बिल्कुल सही हैं. ये लोग अपना भविष्य सुरक्षित करने की तैयारी आज ही से कर रहे हैं और महिलाओं को तो इस ओर ज़रूर ध्यान देना ही चाहिए.

ऐशलैंड विस्कोसी एक ऐसी महिला हैं जो अमरीका के टेक्सस में एक बड़ी कंपनी में काम कर थीं. लेकिन जब उनके किसी परिचित ने उन्हें पार्ट टाइम के लिए फ़िल्म प्रोडक्शन की कन्सल्टेंसी का काम करने का ऑफर दिया तो उन्हें ये ऑफ़र अच्छा लगा और उन्होंने काम करना शुरू कर दिया.

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टेलीमुंडो पूर्व बॉस नेली के मुताबिक महिलाओं के लिए साइड इनकम बहेद अहम है

छह महीने में ही ऐशलैंड ने अपनी नौकरी छोड़ दी और खुद का कारोबार शुरू कर दिया. आज वो खुद कई लोगों को रोज़गार दे रही हैं. सभी कारोबारी फ़ैसले ख़ुद लेती हैं. वो किसी पर निर्भर नहीं हैं. ऐशलैंड को ये डर नहीं है कि अगर नौकरी चली गई तो क्या होगा.

डिजिटल दुनिया

जानकारों की राय में महिलाओं को अपनी नौकरी के साथ साथ कमाई के दूसरे विकल्पों पर भी ध्यान ज़रूर देना चाहिए. कॉरपोरेट जगत में लोग अक्सर अपनी नौकरी पर कुछ ज़्यादा ही भरोसा कर बैठते हैं. उन्हें लगता है कि महीने के आख़िर में एक मोटी रक़म हाथ में आ ही जाती है जिससे उनके सभी खर्चे अच्छी तरह से पूरे हो जाते हैं.

लेकिन उन्हें अपनी कारोबारी क्षमताओं को खुद अपने लिए भी इस्तेमाल करना चाहिए. आज हम डिजिटल दुनिया में जी रहे हैं. इस मौक़े का फ़ायदा उठाना चाहिए. नौकरी कभी भी आपके हाथ से जा सकती है. फिर क्या करेंगे आप. 2008 की मंदी ने सभी को एक बड़ा सबक़ दिया कि कोई भी सिर्फ़ नौकरी के सहारे ना रहे.

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ब्रिटेन की मैनेजमेंट गुरु प्रोफ़ेसर लॉरिन स्टिलर रिक्लीन

बल्कि खुद कारोबारी बनें. वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम की जनवरी 2016 की रिपोर्ट इस बात की भविष्यवाणी करती है कि 2020 तक दुनिया के क़रीब 15 बड़े आर्थिक देशों में क़रीब 50 लाख लोगों की नौकरियां चली जाएंगी. अगर वाक़ई ऐसा होता है तो इसका सबसे ज़्यादा नुक़सान महिलाओं को होने का डर है.

महिलाओं की स्थिति

रिसर्च ये साबित करती हैं कि कॉरपोरेट जगत में महिलाओं की स्थिति कुछ खॉास बेहतर नहीं है. ना तो उन्हें मर्दों के बराबर पैसा मिल पाता है और ना ही वो मुकाम हासिल हो पाता है जिसकी वो हक़दार हैं. उन्हें मर्दों की मातहती में ही काम करना पड़ता है.

इसीलिए ज़रूरी है कि महिलाएं अपने आने वाले कल को सुरक्षित करने के लिए दूसरे विकल्पों के बारे में सोचें और ख़ुद का कारोबार शुरू करें. ब्रिटेन की मैनेजमेंट गुरु प्रोफ़ेसर लॉरिन स्टिलर रिक्लीन का कहना है कि नौकरी दिलाने या छुड़वाने में उम्र भी एक अहम किरदार निभाती है.

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2015 में प्रकाशित हुई एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए लॉरिन कहती हैं कि अधेड़ उम्र महिलाओं के मुक़ाबले नौजवान लड़कियों को नौकरी जल्दी मिल जाती है. जबकि उम्र का ये फ़र्क़ मर्दों के साथ नहीं होता. वो नौजवान हों या अधेड़ उम्र इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता.

लिंगभेद

उन्हें इंटरव्यू कॉल आ ही जाती है जबकि अधेड़ उम्र की महिलाओं के हिस्से आता है इंतज़ार. लॉरेन कहती हैं कि उन्होंने 50 और 60 साल की उम्र वाली ऐसी बहुत सी महिलाओं से बात की जिन्हें कम ज़िम्मेदारी वाले काम दिए गए और उनकी पगार भी कम कर दी गई.

जबकि वो कॉरपोरेट जगत में बहुत बेहतर कर सकती थीं. आगे बढ़ सकती थीं. ये बहुत अफ़सोसनाक है कि महिलाओं को लिंगभेद और उम्र के फ़र्क़ का सामना करना पड़ता है. नौजवान लड़कियों में भी जो दिखने में ज़्यादा दिलकश और ख़ूबसूरत होती हैं उन्हें मौक़ा पहले दिया जाता है. ये सरासर नाइंसाफ़ी है.

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गज़ा की आमना तोड़ रही है रूढ़ी परंपरा

इकोनॉमिक पॉलिसी इंस्टीट्यूट की अक्टूबर 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक़ अमरीका में एक फ़ुल टाइम वर्किंग पुरूष को अगर एक डॉलर मेहनताना दिया जाता है तो महिला को सिर्फ 80 सेंट ही मिलते हैं. रिटायरमेंट की उम्र आते आते ये अंतर और बढ़ जाता है. जब कमाई कम होती है तो बचत भी कम होती है.

मर्दों का बोलबाला

लिहाज़ा काम करना महिलाओं की मजबूरी बनने लगती है क्योंकि अपने गुज़ारे के लिए उनके पास पैसा ही नहीं बचता. अमरीकी एक्सपर्ट प्रोफ़ेसर नेले गलान कहती हैं कि महिलाओं को उस दिन के इतंज़ार में अपना वक़्त बर्बाद नहीं करना चाहिए जब कॉरपोरेट जगत में उन्हें पुरूषों के बराबर सैलरी और मौक़े मिलने लगेंगे.

हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि हमारे कॉरपोरेट जगत की डोर भी उसी समाज के पुरूष के हाथ में है जहां मर्दों का ही बोलबाला होता है. लिहाज़ा इंतज़ार करना बेमानी है. पता नहीं हालात सुधरेंगे भी या नहीं. इसलिए अपनी लीडर आप बनिए. ये काम आप अपनी नौकरी के साथ साथ भी कर सकती हैं.

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महिलाओं पर केंद्रित बीबीसी की ख़ास पेशकश.

कुछ भी बड़ा करने से पहले छोटे से शुरूआत कीजिए. उसके साथ तज़ुर्बा हासिल कीजिए. आज जिस दौर में हम जी रहे हैं वहां कोई किसी का मोहताज नहीं है. इंटरनेट के ज़रिए आज सारी दुनिया में हरेक की पहुंच है. आप ऑनलाइन कोई भी कारोबार शुरू कर सकते हैं.

छोटा-मोटा कारोबार

ज़्यादा महारत से कारोबार करने के लिए आप कोई क्रैश कोर्स भी शुरू कर सकते हैं जिसमें आप प्राइसिंग और मार्केटिंग के गुर सीख सकते हैं. ज़रूरी नहीं है कि आप बिज़नेस ही करें और जो काम शुरू करें उसमें आपको मज़ा भी आए. लेकिन एक तज़ुर्बा तो ले ही सकते हैं क्योंकि कोई तजुर्बा कभी बेकार नहीं जाता.

ये सब करने से आप खुद अपने बारे में भी जान सकेंगे कि आपको अभी और क्या सीखने की ज़रूरत है. ऐसे बहुत से लोग देखे गए हैं जिन्होंने सैलरी के अलावा कमाई के लिए छोटा-मोटा कारोबार शुरू किया. लेकिन आगे चलकर उसमें इतना इज़ाफ़ा हुआ कि लोगों ने नौकरी छोड़ उसी पर फ़ोकस करना शुरू कर दिया.

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भारत प्रशासित कश्मीर के महिलाओं के संघर्ष और सफलता की कहानी

जानकार कहते हैं आप जो भी नौकरी करते हैं वो अपनी पसंद से करते हैं. लेकिन नौकरी की एक सीमा है. प्राइवेट सेक्टर की नौकरी में तो और भी ज़्यादा. ये आपके भविष्य को सुरक्षित करने के लिए नाकाफ़ी होती है. इसलिए ज़रूरी है कि अपना ख़ुद का बिज़नेस शुरू करें.

ख़ुदमुख़्तारी में जो आत्मविश्वास मिलता है, वो नौकरी में नहीं मिल सकता. सिर उठा कर जीने के लिए आत्मविश्वास बहुत ज़रूरी है.

मूल लेख को अंग्रेजी में बीबीसी कैपिटल पर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

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