बिना शादी वाले क्यों बनते हैं 'कोल्हू के बैल'

  • 29 अगस्त 2017
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बीते कुछ वर्षों में काम के घंटे भी लचीले हुए हैं और माहौल भी उदार हुआ है. लेकिन फ़िर भी बहुत सी अविवाहित महिलाओं का कहना है कि उन्हें परिवार वाले सहकर्मियों के मुक़ाबले ज़्यादा काम करना पड़ता है. करियर गुरुओं की सलाह है कि वो न कहना सीखें.

मेक्सिको की एक कंपनी में एचआर विभाग में काम करने वालीं जेनिस चाका एक दिन लंच ब्रेक के दौरान अपनी एक मित्र को पकवान की टिप्स देने के लिए घर चली गईं, वापसी में ट्रैफिक जाम के कारण वे तय वक़्त से 5 मिनट देर से दफ्तर पहुंची.

वह कहती हैं, "5 मिनट की देरी के लिए मुझसे दसियों सवाल पूछे गए, लेकिन मैं जानती हूं कि अगर कोई और सहकर्मी बच्चों को स्कूल से घर छोड़ने जाती और उसे इतनी ही देर हो जाती तो उससे कोई सवाल नहीं पूछा जाता. बल्कि उसे पूरी दोपहर की छुट्टी मिल जाती."

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Image caption शेरलि सैंडबर्ग फेसबुक की सीओओ हैं

शादीशुदा को प्राथमिकता

चाक बताती हैं कि और तो और जब छुट्टी लेने की बात आती है तब भी जिन सहकर्मियों के बच्चे होते हैं, उन्हें प्राथमिकता दी जाती है. उन्हें आसानी से और अपनी पसंदीदा तारीख को छुट्टियां मिल जाती हैं, जबकि बूढ़े मां-बाप की देखभाल करने के लिए गैर-शादीशुदा महिलाओं को छुट्टियां मुश्किल से मिलती हैं.

अविवाहित कर्मियों को बिज़नेस ट्रिप पर भी ज़्यादा भेजा जाता है.

फेसबुक की सीओओ शेरिल सैंडबर्ग कहती हैं, "यह समझना चाहिए कि सिंगल कर्मचारियों को भी जीवन का आनंद लेने का पूरा हक़ है." लोग मानकर चलते हैं कि अविवाहित कर्मियों को किसी बात की कोई चिंता नहीं होती लेकिन यह सच नहीं है. जैसा कि चाका कहती हैं, "अकेले होने पर जीवन अधिक खर्चीला होता है, आपको सारे छोटे-बड़े काम खुद ही करने होते हैं और आर्थिक स्थिति खराब होने पर आपकी मदद करने वाला कोई नहीं होता."

हालांकि, अकेली महिलाओं को कार्यस्थल पर परोक्ष रूप से कितना नुकसान सहना पड़ता है. इसके ठोस आंकड़े जुटाने मुश्किल हैं लेकिन इंग्लैंड में 25000 लोगों पर किए गए एक अध्ययन के मुताबिक 28 से 40 वर्ष की अकेली या नि:संतान महिलाओं में से दो-तिहाई का मानना है कि उनसे औरों के मुक़ाबले ज़्यादा देर तक काम करने की अपेक्षा की जाती है.

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Image caption जॉन्स एलमेलिंग

कोल्हू के बैल

न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र के प्रोफेसर एरिक क्लिनबर्ग ने अपनी पुस्तक 'गोइंग सोलो' के लिए यूरोप और अमेरिका में सैकड़ों ग़ैर-शादीशुदा लोगों से बात की और पाया कि कॉर्पोरेट कार्यालयों में यह धारणा बेहद व्यापक थी कि ग़ैर-शादीशुदा लोग बेहद मेहनती और काम के प्रति समर्पित होते हैं. उन्हें कोल्हू का बैल समझा जाता है.

वह कहते हैं, "मैं ऐसे अनगिनत कर्मचारियों से मिला जिनकी शिकायत थी कि उनके मैनेजर देर रात या सप्ताहांत के असाइनमेंट के लिए उन्हीं को उपयुक्त समझते हैं.

एरिक कहते हैं कि ऐसी भी महिलाएं मिलीं जिन्हें उनकी योग्यता से कम वेतनवृद्धि सिर्फ इसलिए दी गईं क्योंकि उनके बच्चे नहीं थे और उनके मैनेजर को लगता था कि बच्चों वाले कर्मचारियों को वेतन वृद्धि की ज्यादा ज़रूरत होती है.

कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान की प्रोफेसर बेला दी पाउलो ने इस अवधारणा पर किताबें लिखी हैं और इसका अध्ययन किया है. उन्होंने इसके लिए एकाकीवाद शब्द भी ईज़ाद किया ताकि अविवाहित लोगों के विरुद्ध नकारात्मक स्टीरियोटाइपिंग और भेदभाव की पहचान की जा सके. उनका तर्क है कि नियोक्ता यह नहीं समझते कि ग़ैर-शादीशुदा लोगों की सामुदायिक कार्यकलापों में भागीदारी ज़्यादा होती है और उनके कई ऐसे मित्र होते हैं जिनसे उनके परिवार जैसे ही घनिष्ठ संबंध हों.

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Image caption बेला दी पाउलो

करियर और प्रतिष्ठा

स्वीडन की निर्यात और व्यापार एजेंसी के अध्यक्ष जोंस एलमेलिंग के मुताबिक सही संतुलन के लिए नियोक्ताओं को उदार रवैया अपनाने की ज़रूरत है.

अगर अविवाहित कर्मचारियों को लगे कि उनसे औरों से अलग व्यवहार किया जा रहा है पर वे यदि यह भी न चाहें कि उनका करियर और प्रतिष्ठा प्रभावित हो तो उन्हें क्या करना चाहिए.

ब्रिटेन के बिज़नेस मेंटर डेविड कार्टर की पहली सलाह है, "न कुढ़ें, न शिकायत करें. अपने जैसे अन्य सहकर्मियों के साथ मिलकर अपनी बात प्रशासन के सामने रखें."

वे कहते हैं, "याद रखें एकता में शक्ति है. अविवाहित कर्मचारियों को आपस में मिलकर अपने साथ हो रहे भेदभाव पर बात करनी चाहिए और एक साथ मिलकर कंपनी की नीतियों में सुधार के उपाय सुझाने चाहिए. बहुत मुमकिन है कि इससे पूरे संगठन का भला हो और समस्याओं को सुलझाने की उनकी क्षमता से भी लोग परिचित हो जाएं."

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Image caption जेनिस चाका

50 की उम्र तक नहीं होती शादी

और ऐसा करना ज़्यादा मुश्किल भी नहीं क्योंकि अब ज़्यादा से ज़्यादा लोग देर से शादी करते हैं या शादी नहीं करते हैं. तो किसी भी कंपनी में अविवाहित कर्मियों की संख्या अच्छी-ख़ासी होती है. 2014 की एक रिपोर्ट के मुताबिक तो अमरीका में 20% लोग 50 साल की उम्र तक भी शादी नहीं करते और यूरोपियन यूनियन की एजेंसी यूरोस्टेट के मुताबिक 2016 में यूरोपियन यूनियन में लोगों का अकेले रहना आम था.

कार्टर एक और तरीका सुझाते हैं और वह है काम में साझेदारी के लिए पॉइंट सिस्टम. यानी कर्मचारी आपस में अपनी सहूलियत से काम की अदला-बदली कर सकें, किसी और व्यक्ति का काम करने या किसी समय उसके बदले ऑफिस आने के लिए एक पॉइंट मिले और बाद में जब कोई और उसके बदले काम करे तो यह पॉइंट खर्च समझा जाए.

इस सिस्टम का डिजिटली या किसी और तरह लेखा-जोखा रखा जा सकता है और किसी भी एक कर्मचारी के पास 5 से अधिक पॉइंट न तो जमा होने चाहिए, न ही उस पर 5 पॉइंट से अधिक औरों का उधार होना चाहिए. इस सिस्टम से कोई भी घाटे में नहीं रहेगा.

ऑफिस को इस बात से मतलब नहीं होना चाहिए कि आप अपने खाली समय में क्या करते हो- आप चाहे अपने बच्चों को नाटक दिखाने ले जाएं, शॉपिंग करें या फिर बंजी जंपिंग कराएं- हरेक को समान सुविधा मिलनी चाहिए.

हालांकि कार्टर स्वीकार करते हैं कि बड़े कॉर्पोरेट कार्यालयों में पॉइंट सिस्टम जैसे तरीके अपनाना मुश्किल है. लेकिन कंपनियों को अपने सभी कर्मचारियों के साथ एक जैसा लचीला व्यवहार करना चाहिए वरना उन्हें अच्छे कर्मचारियों का टोटा पड़ सकता है.

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छूट की बात कहना आसान

फेसबुक की मुख्य संचालन अधिकारी शेरिल सैंडबर्ग ने अपनी किताब में एक ऐसी महिला कर्मचारी का ज़िक्र किया है, जिसका मानना था कि छुट्टी मांगने के लिए पार्टी में जाने को बच्चों के फुटबॉल मैच जितना ही महत्वपूर्ण कारण मानना चाहिए क्योंकि परिवार शुरू करने के लिए नए लोगों से मिलना भी तो ज़रूरी है और पार्टी में नए लोगों से मिलने की संभावना रहती है.

सैंडबर्ग नियोक्ताओं को सलाह देते हुए कहती हैं, "ऑफिस का माहौल ऐसा हो कि सभी कर्मचारी यह महसूस करें कि उन्हें जीवन का आनंद लेने का पूरा हक है और इसकी उन्हें छूट है."

लेकिन यह भी सच है कि सभी कर्मचारियों को कामकाज से एक-सी छूट देने की बात कहना आसान है, करना मुश्किल.

स्वीडन की एक निर्यात और व्यापार एजेंसी के हेड ऑफ इनोवेशन और एक बच्चे के पिता जोंस एलमेलिंग कहते हैं, "माता-पिता बनने के बाद आपके नज़रिये में फर्क आ जाता है, उससे पहले आप नहीं समझ सकते कि जीवन में इस बदलाव से कैसे आपकी प्राथमिकताएं बदल जाती हैं?"

तैराकी के लिए छुट्टी मांगे जाने और स्कूल से बच्चे को घर पहुंचाने के लिए छुट्टी मांगे जाने पर एक जैसा रवैया नहीं अपनाया जा सकता.

लेकिन यह भी सच है कि हर कर्मचारी को अपने जीवन का पूरा आनंद उठाने का हक होना चाहिए चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित. इसलिए उदार दृष्टिकोण अपनाने की ज़रूरत तो है ही.

जेनिस चाका आज सफ़ल बिज़नेस गुरु और सलाहकार हैं. वे कहती हैं, "पहले मुझे छुट्टी मांगने में अपराधबोध सताता था, लगता था बाकी सहकर्मियों को तो अपने बच्चों के लिए छुट्टी चाहिए और मैं मौज-मस्ती के लिए छुट्टी मांग रही हूं. मैं छुट्टी मांगने के अपने कारण को भी खूब बढ़ा-चढ़ाकर बताती ताकि लोग यह न समझें कि मुझे औरों के परिवार की परवाह नहीं."

लेकिन अब जब वे कॉर्पोरेट दुनिया छोड़ चुकी हैं तो अपने क्लाइंट्स को ऐसा अपराधबोध न पालने सलाह देती हैं.

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उनका तर्क है- जीवन और काम के बीच एक संतुलन होना चाहिए फिर आपके बच्चे हों या न हों.

उनकी सलाह है कि किसी भी कंपनी से जुड़ने से पहले वहां की कार्य संस्कृति के बारे में जान लें. नौकरी शुरू करने के बाद अपने सहकर्मियों से सोशल मीडिया पर न जुड़ें. वरना आपने जिस दिन छुट्टी ली, उस दिन के आपके कार्यकलापों पर सहकर्मियों की नज़र रहेगी और आप बेकार में अपराधबोध का शिकार होंगे.

इसलिए उनकी सलाह है, "ऐसी कंपनी ढूंढें जहां कोई यह परवाह न करे कि आप को छुट्टी क्यों चाहिए और आपको प्रमोशन औरों से ज़्यादा और ज़्यादा देर तक काम करने के कारण नहीं, बल्कि बुद्धिमानी से अपना काम करने के कारण मिले."

(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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