सोशल मीडिया कैसे कर रहा है आपकी नींद हराम?

  • 27 सितंबर 2017
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विशेषज्ञों का मानना है कि मोबाइल और लैपटॉप पर सोशल मीडिया से जुड़े रहने के कारण हम रात में देर तक जागते रहते हैं. इसकी वजह से हमारी नींद पूरी नहीं हो पाती और स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है.

ज़रा याद कीजिए, कल रात सोने से पहले आपने आख़िरी काम क्या किया था? संभावना यही है कि आप सोने से पहले मोबाइल या लैपटाप पर किसी ईमेल का जवाब दे रहे होंगे या फिर फ़ेसबुक या व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया पर मशगूल रहे होंगे.

ऐसा करने वाले आप अकेले नहीं हैं. अमरीका के नेशनल स्लीप फ़ाउंडेशन के एक अध्ययन के मुताबिक 48% अमरीकी सोने से पहले टैबलेट या लैपटाप जैसे गैजेट्स इस्तेमाल करते हैं. अन्य देशों में किए गए अध्ययनों के मुताबिक ऐसा करने वालों में युवाओं का प्रतिशत बहुत अधिक है.

लेकिन नींद आने से पहले गैजेट्स इस्तेमाल करने की हमारी लत असल में हमारी नींद हराम कर रही है. इनके चलते हम ज़्यादा देर तक जगे रहते हैं और नींद के आगोश में जाने से पहले भी हमारा दिलो-दिमाग शांत नहीं हो पाता. रात में हमारी नींद भी कई बार टूटती रहती है.

कई अध्ययनों के मुताबिक, रात में इन गैजेट्स के इस्तेमाल से तनाव बढ़ता है और हमारे आत्म विश्वास और मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है. नींद पूरी न होने से हमारी कार्यक्षमता भी कम होती है और स्वास्थ्य पर दीर्घकालीन बुरा असर तो पड़ता ही है. लेकिन इसकी आदत से छुटकारा पाना बेहद मुश्किल है. आइए, जानते हैं क्यों.

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गहरी नींद में खलल डालते हैं गैजेट्स

यह समझना बेहद ज़रूरी है कि सोने से पहले कोई किताब पढ़ना या टीवी देखना एक अलग बात है और इन आधुनिक गैजेट्स के साथ वक़्त बिताना अलग बात.

विशेषज्ञों का मानना है कि सोने से पहले हमारे मस्तिष्क को नींद की तैयारी के लिए आधे से एक घंटे की तैयारी की ज़रूरत होती है ताकि हमारा दिमाग दिन भर के तनाव से मुक्त होकर शांत हो सके. सोने से पहले किताब पढ़ने या गरम दूध पीने जैसे काम इसमें हमारी मदद करते हैं और हम धीरे-धीरे नींद के आगोश में चले जाते हैं. लेकिन आधुनिक गैजेट इस पूरी प्रक्रिया को गड़बड़ा देते हैं.

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय में न्यूरोसाइंस और मनोविज्ञान के प्रोफेसर मैथ्यू वॉकर कहते हैं, "इन गैजेट्स के कारण नींद देर से आती है, क्योंकि हमारा दिमाग शांत नहीं हो पाता. बहुत मुमकिन है कि यदि बिजली चली जाए और हमारे फोन की बैटरी खत्म हो जाए तो हमें तुरंत नींद आ जाए. लेकिन जैसे ही हम इन गैजेट्स को उठाते हैं, नींद हमसे दूर भाग जाती है."

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Image caption रात को मोबाइल इस्तेमाल करना नींद के लिए ठीक नहीं

प्रोफेसर वॉकर कहते हैं, "अक्सर ऐसा होता है कि सोने के लिए लेटते ही फेसबुक या व्हाटसएप पर कोई संदेश आता है और हमारा 20-30 मिनट का समय बर्बाद हो जाता है. जब हम कोई मैसेज करते हैं, फेसबुक पर कुछ पोस्ट करते हैं या कोई मेल भेजते हैं तो उस पर लोगों की प्रतिक्रिया जानना चाहते हैं और इन सबसे हमारा तंत्रिका तंत्र सक्रिय रहता है. फिर हम फ़ोन अपने बिस्तर के पास रखकर सो जाते हैं और उस पर हर संदेश के साथ बजने वाली आवाज़ से हमारी नींद बुरी तरह प्रभावित होती है."

कई गैजेट्स से निकलने वाली नीली रोशनी नींद लाने में मददगार हारमोन मेलाटोनिन के स्राव को प्रभावित करती है और इससे हमारे शरीर की जैविक घड़ी भी पूरी तरह गड़बड़ा सकती है.

बेड के पास गैजेट रखने से नहीं आती अच्छी नींद

किंग्स कॉलेज लंदन में इंस्टिट्यूट ऑफ साइकैट्री के विशेषज्ञ बेन कार्टर पिछले कुछ सालों से नींद पर टेक्नोलॉजी के असर का अध्ययन कर रहे हैं और उनके मुताबिक शयनकक्ष में बेड के पास पोर्टेबल इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस रखने से हम अच्छी नींद से वंचित हो जाते हैं.

कार्टर ने बच्चों के नींद पैटर्न को समझने के लिए किए गए 20 अध्ययनों का विश्लेषण किया और पाया कि जो बच्चे अपने कमरे में मोबाइल रखकर सोते हैं, उनकी नींद कम गहरी होती है. यहां तक कि जो बच्चे सोने से पहले गैजेट्स का इस्तेमाल नहीं करते, वे भी उन बच्चों के मुक़ाबले कम गहरी नींद सोते हैं, जिनके गैजेट्स दूसरे कमरे में रहते हैं.

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Image caption मोबाइल साथ रखने वाले बच्चों की नींद कम गहरी होती है

गैजेट्स की लत

लेकिन इन गैजेट्स को खुद से दूर रख पाना बेहद मुश्किल है. कार्टर कहते हैं, "अगर आप सोने से पहले मोबाइल देखते हैं और सुबह जागते ही फिर से मोबाइल पर संदेश चेक करते हैं, तो आपको इसकी लत हो गई है."

वह गैजेट्स की लत की तुलना धूम्रपान की लत से करते हैं. कार्टर कहते हैं, "इन गैजेट्स के कारण चौबीसों घंटे हर जानकारी पाने और दूसरों के साथ जुड़े रहने की लालसा इतनी तीव्र होती है कि इनके चंगुल से बच पाना बेहद मुश्किल होता है."

कार्टर एक ऐसे प्रोफ़ेसर को जानते हैं जो रात को जागकर अपने मोबाइल पर अमरीकी अख़बार पढ़ते हैं. खुद कार्टर हर वक़्त मोबाइल इस्तेमाल करने के ख़तरों को जानते हुए भी ऐसा करने से खुद को रोक नहीं पाते.

नींद विशेषज्ञों का मानना है कि इस लत से छुटकारा पाने के लिए हमें सिगरेट की लत छोड़ने जितना ही प्रयास करना होता है ताकि जब मोबाइल दूसरे कमरे में हो तब भी हमें कोई बेचैनी न हो.

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अमरीका के नेशनल स्लीप फ़ाउंडेशन के एक सर्वेक्षण में शामिल 20% लोगों ने बताया कि वे रात में अपने उपकरणों की वजह से जग जाते हैं और उनमें से आधे तो उठकर उनका इस्तेमाल भी करने लगते हैं.

नींद की कमी और समाधान

अमरीका के रोग नियंत्रण और रोकथाम केन्द्रों का अनुमान है कि 7 करोड़ अमरीकी रात में 6 घंटे से भी कम सोते हैं, जिसके कारण वे कामकाज के दौरान अपना ध्यान केन्द्रित नहीं कर पाते और चीजें भूल जाते हैं. नींद पूरी न होने की वजह से सड़क दुर्घटनाओं और औद्योगिक दुर्घटनाओं का खतरा भी बढ़ा है.

नींद की कमी से हृदयरोग, मोटापे, मधुमेह और अवसाद का खतरा भी बढ़ता है.

ऑक्सफ़ोर्ड विश्वविद्यालय में स्लीप मेडिसिन के प्रोफेसर कॉलिन एस्पी कहते हैं, "नींद की कमी सार्वजनिक स्वास्थ्य का एक ऐसा बड़ा मुद्दा है जिसकी बहुत कम बात होती है. हमारे स्वास्थ्य और तंदुरुस्ती के लिए ज़रूरी कई सारी शारीरिक-मानसिक क्रियाओं के लिए नींद बेहद ज़रूरी है."

मगर समस्या फिर वही कि सब कुछ जानते-बूझते भी गैजेट्स को छोड़ना मुमकिन नहीं हो पता. वॉकर कहते हैं, "टेक्नोलॉजी से जुड़ी हमारी समस्याओं का समाधान भी टेक्नोलॉजी में ही है. अभी भी बाज़ार में कई ऐसे गैजेट्स मौजूद हैं जो नींद को मॉनिटर करते हैं और गहरी नींद लाने में हमारी मदद भी करते हैं."

वॉशिंगटन विश्वविद्यालय का स्लीप एंड परफॉर्मेंस रिसर्च सेंटर नींद की गुणवत्ता मापने के लिए पोलीसोम्नोग्राफ़िक रिकॉर्डिंग सिस्टम्स का इस्तेमाल करता है.

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Image caption पोलीसोमनोग्राफिक रिकॉर्डिंग सिस्टम

वॉकर कहते हैं, "शायद भविष्य में हर व्यक्ति के लिए नींद में सुधार की टेक्नोलॉजी मुमकिन हो पाएगी. हो सकता है ऐसी कोई डिवाइस बने जो अगले दिन के कार्यक्रम के मुताबिक, हमें जल्दी सोने का सुझाव दे सके या स्लीप पैटर्न को दुरुस्त करने में हमारी मदद कर सके. हो सकता है भविष्य की कोई डिवाइस नई जगह के मुताबिक हमारे नींद के पैटर्न बदलकर हमे जेट लेग की परेशानी से भी बचा ले."

बेशक नई तकनीकों और गैजेट्स के चलते हमारी रातों की नींद ख़राब हो रही है, लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि नींद के पैटर्न में सुधार लाने वाली डिवाइसेज के जरिये इसका हल तलाशने में तकनीक ही हमारी मददगार बने.

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