काम 'कैसे' करना है इस पर ध्यान दें, 'क्यों' पर नहीं

  • 29 जनवरी 2019
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आधुनिक नौकरियों से संतोष क्यों नहीं मिलता? क्या हम अपने काम में 'क्यों' ढूंढने की गलती कर रहे हैं जबकि हमें 'कैसे' का जवाब तलाशने की ज़रूरत है?

कभी न ख़त्म होने वाली बैठकों में हम अपना नाम और ईमेल भी भूलने लगे हैं.

मैंने पिछले दो साल आधुनिक दफ़्तरों की संस्कृति सुधारने के बारे में शोध करने और किताब लिखने में बिताए हैं. मैंने देखा है कि बहुत कुछ दुरुस्त करने की ज़रूरत है.

आधुनिक दफ़्तरों के साथ जुड़ी चुनौतियां ध्यान भटकने भर की नहीं है, बल्कि यह कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण है.

मेंटल हेल्थ फ़ाउंडेशन के मुताबिक़, ब्रिटेन के 74 फ़ीसदी लोगों ने पिछले साल किसी न किसी समय तनाव से पराजित महसूस किया. इसका सबसे बड़ा कारण था उनका काम.

इसमें हैरान होने की कोई बात नहीं है. जबसे हमारे मोबाइल फ़ोन पर ईमेल आने लगे हैं, हमारा औसत कार्य दिवस दो घंटे बढ़ गया है.

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सिर्फ़ क्यों काफ़ी नहीं है

कुछ अनुमानों के मुताबिक़, जिन कर्मचारियों से अपने सहकर्मियों से चौबीसों घंटे जुड़े रहने की अपेक्षा की जाती है वह सप्ताह में 70 घंटे से ज़्यादा काम कर रहे हैं.

अतिरिक्त घंटों में काम कर रहे लोगों में से आधे लोग तनाव के उच्चतम स्तर पर हैं.

यही कारण है कि सिमोन सिनेक जैसे स्वघोषित दूरदर्शियों की बातें दफ़्तरों में काम करने वालों को बेचैन करती हैं.

सिनेक का कहना है कि मिनेलियल्स (21वीं सदी में जवान हुई पीढ़ी) को काम में जुट जाने से पहले उससे जुड़े 'क्यों' को समझने की ज़रूरत है.

"महान कंपनियां कुशल लोगों को नियुक्त करके उन्हें प्रेरित नहीं करतीं. वे पहले से प्रेरित लोगों को नियुक्त करती हैं और उन्हें आगे बढ़ाती हैं."

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नौकरी पर रखते समय...

किसी काम के प्रति प्रेरित करने के लिए सबसे पहले यह बताया जाता है कि वह काम 'क्यों' किया जा रहा है.

लेकिन यह स्पष्ट होता जा रहा है कि सिर्फ़ 'कारण' पर ध्यान देने से असंगति और असंतोष पैदा हो रहा है.

सभी उम्र के श्रमिकों को इस सवाल का सामना करना पड़ता है, "कैसे मैं इस महान, उद्देश्य से संचालित संगठन में काम करता हूं, फिर भी खुश नहीं हूं."

कर्मचारी नियोक्ताओं को बता रहे हैं कि नौकरी पर रखते समय उनसे जो कहा गया था उसमें और असल के काम में बहुत अंतर है और इस पर काम करने की ज़रूरत है.

सुसैन फाउलर के उबर ब्लॉग पोस्ट के बाद 2018 में गूगल कर्मचारियों के वॉकआउट ने दफ़्तरों में असंतोष की यात्रा में एक और मील का पत्थर जोड़ दिया.

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छोटे बदलावों की ताक़त

ये स्पष्ट होता जा रहा है कि 'क्यों' पर ध्यान केंद्रित करने से रणनीति बनाने वाले सीईओ के पीछे खड़े होने को जायज़ ठहराया जा सकता है.

लेकिन इससे थकान से चूर कर्मचारियों की कोई मदद नहीं होती. धीरे-धीरे यह महसूस किया जा रहा है कि हमें अब 'क्यों' की बजाय 'कैसे' पर ध्यान देना है.

"मैं कैसे अपनी नौकरी में ज़्यादा संतुष्ट और कम व्याकुल महसूस करूं."

ये तो तय है कि दफ़्तरों में कोई स्टीव जॉब्स नहीं हैं जो रोज़गार के नये, हल्के और चमकदार वर्जन को लॉन्च करें.

हम व्यक्तिगत रूप से अपने रोज़ के काम के डिज़ाइन में बदलाव ला सकते हैं जिससे हमारे काम का तनाव घटने में मदद मिले.

एक बार जब काम करने वाले लोग ये मान लेंगे कि 'कैसे' का सवाल अहम है तो कई लोग ये भी स्वीकार करने लगेंगे कि हम ख़ुद ही बदलाव की शुरुआत कर सकते हैं.

सारी अच्छी चीज़ें

हममें से बहुत से लोगों के लिए काम का सबसे बड़ा बोझ बैठकों में लगने वाला समय है. बैठकों में शामिल लोगों की संख्या आधी करना भी बड़ा उपकार होगा.

इन्वेस्टमेंट बैंकर ब्रिजवाटर एसोसिएट्स का कहना है कि बैठकों में कम लोग रहें तो चर्चा की गुणवत्ता सुधारी जा सकती है.

चुनौती यह थी कि लोगों को लगता है कि जिस बैठक में वे नहीं हैं, वहीं पर सारी अच्छी चीज़ें हो रही हैं.

अहम मौक़े से चूक जाने के डर को ग़लत साबित करने के लिए उन्होंने सभी बैठकों को रिकॉर्ड करना शुरू कर दिया.

इसके बाद किसी को शिकायत नहीं रही कि उनको बैठक में नहीं बुलाया गया या कम अहमियत दी गई. कुछ दूसरी चीज़ें भी हैं.

कर्मचारी अब इस बात से वाकिफ़ हो रहे हैं कि सही समय पर लंच ब्रेक लेने से फ़ैसले लेने की क्षमता सुधरती है और सप्ताह के अंत में थकान भी कम महसूस होती है.

दिमाग़ भी तरोताज़ा रहता है...

सहकर्मियों के साथ कुछ पैदल चलना और साथ में चाय-कॉफी पीने की स्वीडिश परंपरा का भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है.

इससे हम ईमेल की थकान से बचते हैं और दिन के अंत में हमारा दिमाग़ भी तरोताज़ा रहता है.

असल में, पैदल चलने के विज्ञान को बैठकों पर भी लागू किया जा सकता है. बैठने की जगह चलते-चलते भी मीटिंग की जा सकती है.

स्टैफ़ोर्ड की स्कॉलर मारिली ओपरेज़ो ने पाया कि पैदल चलने से 81 फ़ीसदी लोगों की रचनात्मक सोच में सुधार हुआ.

ऐसे समय जबकि हम कार्य सप्ताह को हल्का करने की कोशिश कर रहे हैं, कैलेंडर में एक और मीटिंग जोड़ देना लक्ष्य के उलट लग सकता है.

लेकिन सामाजिक बैठकों की ताक़त को मान्यता मिल रही है. ब्रिटेन के कई दफ़्तरों में लोग काम बंद करके किसी लोकल पब में मिलते हैं.

सहयोग की संभावना

पांच बार की सीईओ मार्गरेट हेफ़र्नन अपनी अमरीका आधारित फ़र्मों में से एक में होने वाली साप्ताहिक सामाजिक बैठकों को कार्य संस्कृति के लिए परिवर्तनकारी बताती हैं.

"श्रमिकों को सप्ताह के किसी एक दिन एक-दूसरे के साथ समय बिताने के लिए प्रोत्साहित करने से बाकी दिनों में उनके बीच सहयोग की बेहतर संभावना बनती है."

दफ़्तर जल्दी की बीमारी से घिरे हुए हैं. यह आधुनिक रोज़गार की कभी ख़त्म न होने वाली मांगों का परिणाम है.

इसका असर भयावह हो सकता है, ख़ासकर सबसे जूनियर कर्मचारियों पर. जब काम से फ़ुर्सत न मिल रही हो हम काम क्यों कर रहे हैं यह सोचने से मदद नहीं मिलेगी.

शायद अभी से यह ध्यान देने की ज़रूरत है कि हम काम 'कैसे' कर रहे हैं.

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