एक बर्गर पर एक मुफ़्त देकर कैसे कमाती हैं कंपनियां?

  • 20 मार्च 2018
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अख़बारों से लेकर टीवी और रेडियो तक अक्सर ऐसे विज्ञापन देखने को मिलते हैं, जिसमें एक बर्गर ख़रीदने पर दूसरा बर्गर फ्री, या, एक पिज़्ज़ा के साथ दूसरा फ़्री, एक पैकेट फ्राइड चिकेन के साथ दूसरा पैकेट मुफ़्त देने का ऑफ़र होता है.

इन विज्ञापनों को देखकर ज़हन में एक सवाल आता है कि जब ये चीज़ें एक के साथ एक मुफ़्त देकर भी इन कंपनियों को मुनाफ़ा होता है, तो वो इनके दाम क्यों नहीं कम करतीं?

सवाल ये भी कि इतनी कम क़ीमत पर भी क्या फास्ट फूड कंपनियां अपने सामान बेचकर मुनाफ़ा कमा लेती हैं?

अमरीका में इन दिनों फास्ट फूड कंपनियों के बीच युद्ध छिड़ा हुआ है. कम क़ीमत पर अपने उत्पाद बेचने का.

जनवरी महीने से ही तमाम अमरीकी फास्ट फूड कंपनियों ने बेहद कम दाम पर अपने सामान बेचने के ऑफ़र जनता को देने शुरू किए हैं. कई कंपनियों ने तो बर्गर के दाम इतने घटा दिए हैं कि ये ब्रेड से भी सस्ता हो गया है.

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मैकडॉनल्ड ने 2018 में शुरू किया नया जंग

दिसंबर महीने में ही वित्तीय कंपनी क्रेडिट सुइस ने कहा था कि अमरीका में कम क़ीमत पर फास्ट फूड बेचने की जंग तेज़ होने वाली है.

मैकडॉनल्ड ने 2018 की शुरुआत 1 डॉलर, 2 डॉलर और 3 डॉलर के नए मेनू लॉन्च करके की.

कंपनी के दूसरे प्रतिद्वंदियों ने भी अपने-अपने दांव खेले. वेंडीज़ बर्गर चेन ने एक डॉलर से भी कम क़ीमत की 20 चीज़ों का नया मेनू जारी किया. इसके बाद टेक्स-मेक्स कंपनी टैको बेल ने एक डॉलर में नैचो फ्राइज़ बेचने शुरू कर दिए.

क्रेडिट सुइस का कहना है कि 2012 से 2016 के बीच अमरीका में मैकडॉनल्ड के यहां ग्राहकों की आवक 11 फ़ीसद कम हो गई.

पर, सवाल फिर वही कि आख़िर 1 डॉलर में बर्गर बेचकर कैसे मुनाफ़ा कमाया जा सकता है, जब इसे लोगों को परोसने वाला हर घंटे के 10 डॉलर लेता हो?

अमरीका में फास्ट फूड कंपनियों के बीच मुक़ाबला बेहद तगड़ा है. पहली पायदान के लिए मुक़ाबला चार या पांच कंपनियों के बीच ही रहता है. ऐसे में कंपनियां छोटे-बड़े हेर-फेर के साथ अपने प्रोडक्ट बाज़ार में उतारती हैं. कोई कहता है कि उसका खाना सीधे आंच में पका है, तो कोई फ्राइड बताता है. और कोई कंपनी खाने के साथ बच्चों के खिलौने देने का मार्केटिंग का नुस्खा अपनाती है.

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सस्ते दाम पर सामान बेचने का नुस्खा

पैट्रीशिया स्मिथ अमरीका की मिशिगन यूनिवर्सिटी की फास्ट फूड के अर्थशास्त्र की प्रोफ़ेसर हैं. स्मिथ कहती हैं कि आख़िर में मुक़ाबला कम से कम दाम पर अपने उत्पाद बेचने का होता है. एक डॉलर या इससे भी कम क़ीमत की चीज़ें बाज़ार में उतारी जाती हैं.

स्मिथ का कहना है कि ऐसा कर के कंपनियां ये उम्मीद करती हैं कि वो ज़्यादा से ज़्यादा सामान बेच पाएंगी. ज़्यादा सामान बिकेगा, तो उनका मुनाफ़ा बढ़ेगा.

जैसे कि अगर मैक्डोनॉल्ड्स 1 डॉलर वाले ढेर सारे बर्गर बेचेगा, तो उसका मुनाफ़ा बढ़ेगा. और फिर लोग सिर्फ़ बर्गर तो लेंगे नहीं. वो इनके साथ फ्रेंच फ्राइज़, ड्रिंक और डेज़र्ट भी लेंगे.

लेकिन, सस्ते दाम पर सामान बेचने का नुस्खा कभी-कभी भारी भी पड़ सकता है. ख़ास तौर से तब, जब सामान की क़ीमत उसकी लागत से भी कम हो जाए. 2009 में बर्गर किंग की फ्रैंचाइज़ी चलाने वालों ने कंपनी पर मुक़दमा ठोक दिया था. इसकी वजह ये थी कि कंपनी की मार्केटिंग की रणनीति के तहत उन्हें एक डॉलर के डबल चीज़ बर्गर बेचने पड़े. जबकि उसकी लागत एक डॉलर से ज़्यादा बैठती थी. हालांकि अदालत ने बर्गर किंग के हक़ में ही फ़ैसला दिया.

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फास्ट फूड को लेकर बदल रहा नज़रिया

वैसे कम से कम दाम पर फास्ट फूड बेचने की रणनीति कारगर रहेगी या नहीं, इस बात का फ़ैसला होना अभी बाक़ी है.

इसकी वजह है हमारे खान-पान में आया बदलाव. अब हम सेहत को लेकर ज़्यादा जागरूक हो गए हैं. फास्ट फूड खाने से लोग परहेज़ करते हैं. आज की तारीख़ में लोग सस्ते खाने से ज़्यादा सेहतमंद खाने की तलाश करते हैं. किसी को ऑर्गेनिक फूड चाहिए. तो, किसी को बिना तेल वाला खाना.

खान-पान को लेकर नई पीढ़ी की सोच में आए बदलाव का सबसे बुरा असर फास्ट फूड कंपनियों पर ही पड़ा है. लोग बर्गर से ज़्यादा ख़ुद से चुन सकने वाले सलाद को तरज़ीह देते हैं. न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में न्यूट्रिशन की प्रोफ़ेसर मैरियॉन नेस्ले कहती हैं कि आज फास्ट फूड कंपनियां लोगों को अपने स्टोर्स में लाने को बेताब हैं. इसीलिए मैक्डोनॉल्ड्स ने यूबर के साथ करार किया है, ताकि लोग उसके स्टोर तक आएं.

लंदन की सिटी यूनिवर्सिटी के मार्टिन काराहर कहते हैं कि पांच बरस पहले फास्टफूड कंपनियां चाहती थीं कि लोग आएं, खाएं और चलते बनें. आज वो चाहती हैं कि ग्राहक आएं और तसल्ली से उनके यहां वक़्त गुज़ारें. देर तक ठहरेंगे, तो लोग कुछ न कुछ ख़रीदेंगे ही. इसीलिए फास्ट फूड स्टोर्स में कभी लाउंज सिटिंग की व्यवस्था होती है, तो कहीं पर मुफ़्त वाई-फ़ाई का इंतज़ाम होता है.

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आख़िर कितनी गिरेंगी क़ीमतें?

अब सवाल ये है कि जब फास्ट फूड के दाम उसकी लागत से भी कम हो गए, तो फिर उससे नीचे भी जाएंगे क्या?

न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी की मैरियॉन नेस्ले कहती हैं कि फास्ट फूड इंडस्ट्री ज़्यादा से ज़्यादा सामान बेचने की रणनीति पर काम करती है. ताकि कम क़ीमत पर सामान बेचकर भी मुनाफ़ा कमाया जा सके.

असल मक़सद होता है ग्राहकों को अपने स्टोर तक ले आना. फिर दाम कम होने पर किसी ख़ास ब्रैंड के शौक़ीन लोग भी दूसरी कंपनियों के मेनू को ट्राई करते हैं.

पैट्रीशिया स्मिथ कहती हैं कि हर धंधे में कंपनियां इस दुविधा में रहती हैं कि वो दाम घटाएं या बढ़ाएं. कहीं दाम बढ़ाने से उसके ग्राहक छिटक न जाएं. या दाम घटाने से उसके पास और ग्राहक आएंगे क्या?

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कोई कंपनी अगर 5 फ़ीसद दाम घटाकर 10 फ़ीसद ज़्यादा सामान बेच लेती है, तो उसका मुनाफ़ा बढ़ेगा ही, घटेगा नहीं.

पैट्रीशिया कहती हैं कि कम कीमत या ये युद्ध उन कंपनियों के बीच छिड़ता है, जो ऊपरी पायदान पर होती हैं और बड़े बाज़ार पर उनका क़ब्ज़ा होता है. जैसे अमरीका में 40 फ़ीसद बाज़ार पर 4 या 5 कंपनियों का क़ब्ज़ा है. इस 40 प्रतिशत बाज़ार का मतलब 80 अरब डॉलर का कारोबार है.

अमरीका ही नहीं ब्रिटेन में भी कंपनियां कम क़ीमत वाले उत्पाद बाज़ार में ला रही हैं. जैसे कि मार्क्स ऐंड स्पेंसर 10 पाउंड में दो लोगों को खाना खिलाने का ऑफ़र दे रही है. वहीं सुपरमार्केट चेन टेस्को 4 पाउंड में लंच स्पेशल ऑफर लेकर आई.

हालांकि अमरीका के मुक़ाबले यूरोपीय देशों में कंपनियों का ज़ोर ग्रीन प्रोडक्ट यानी क़ुदरत के लिए कम नुक़सानदेह उत्पाद बेचने पर है. इसलिए यूरोपीय देशों में कम क़ीमत पर फास्ट फूड बेचने का ये युद्ध शायद न देखने को मिले.

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फास्ट फूड का भविष्य क्या है?

तमाम कंपनियों ने इस बारे में ख़ामोशी अख़्तियार कर रखी है कि वो क़ीमतों में और कितनी कटौती करेंगे. बस वो ग्राहकों को कम क़ीमत पर सामान देने की बात करती हैं.

मिशिगन यूनिवर्सिटी की पैट्रीशिया स्मिथ कहती हैं कि कंपनियां अपने मौजूदा ग्राहकों को अपने साथ जोड़े रखने की कोशिश कर रही हैं. क्योंकि नई पीढ़ी तो पहले ही सेहतमंद खाने पर ज़ोर दे रही है.

अभी ये साफ़ नहीं है कि आख़िर गिरती क़ीमतों से फास्ट फूड के कारोबार का क्या होगा?

मगर सेहत से जुड़े लोग इस बात से फ़िक्रमंद हैं. उन्हें चिंता है कि सस्ता होने पर लोग ज़्यादा फास्ट फूड खाएंगे. ऐसे में मोटापे की समस्या और दूसरी बीमारियां बढ़ेंगी. अमरीका तो पहले से ही दुनिया का सबसे ज़्यादा मोटापे का शिकार देश है.

लेकिन, दाम कम होने का ये असर भी हो सकता है कि तमाम कंपनियां सेहत को कम नुक़सान पहुंचाने वाले उत्पाद बनाएं.

अमरीका में कई ऐसी कंपनियां हैं जो ताज़ा और सेहतमंद खाने का सामान बेच रही हैं. जैसे कि स्वीटग्रीन्स और फ्रेश. जो हरे, पत्तेदार सामान बेचते हैं. इसी तरह व्होल फूड्स नाम की कंपनी भी तेज़ी से विस्तार कर रही है. ये कंपनी सेहतमंद खाना बेचती है.

साफ़ है कि फास्ट फूड की दुनिया बदल रही है.

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