बॉस को आपके बारे में कितना पता होना चाहिए?

  • जोस लुइस पेनर्रेडोंडा
  • बीबीसी कैपिटल
डेटा चोरी

भारत से लेकर ब्रिटेन और अमरीका तक इन दिनों डेटा चोरी का हंगामा बरपा हुआ है. सोशल नेटवर्किंग साइट फ़ेसबुक पर इल्ज़ाम है कि उसने अपने यूज़र्स से जुड़ी जानकारी बिना उनकी इजाज़त के एक तीसरी कंपनी को दे दी.

इस कंपनी ने फ़ेसबुक यूज़र्स से जुड़ी जानकारी का कारोबारी इस्तेमाल किया. इससे उनकी राजनैतिक सोच और मतदान के फ़ैसले को प्रभावित करने की कोशिश की.

भारत में विपक्षी कांग्रेस आरोप लगा रही है कि बीजेपी सरकार लोगों पर 'बिग बॉस' जैसी नज़र रखती है. उनकी जानकारियों का सियासी और कारोबारी इस्तेमाल हो रहा है.

ये तो हुई सियासी बात, मगर आज की डिजिटल दुनिया में हम जाने-अनजाने बहुत से ऐसे काम कर रहे हैं, जिससे हमारी जासूसी हो सकती है. हमारी पसंद-नापसंद दूसरे लोगों को मालूम हो सकती है. हमारे आने-जाने से लेकर छुट्टियों पर जाने और सेहत से जुड़ी बातें दूसरे लोगों को पता चल रही हैं.

आपका डेटा क्या कर सकता है?

आज की तारीख़ में इंसान, इंसान कम और डेटा ज़्यादा हो गया है जिसका अच्छा और बुरा इस्तेमाल हो सकता है.

ऐसे में तमाम कंपनियां भी अपने कर्मचारियों से जुड़ी बातें, उनकी जानकारी में और कई बार उनसे छुपाकर हासिल कर रही हैं.

आप दफ़्तर में जिस कंप्यूटर पर काम करते हैं, वो आपकी आदतों की चुगली करता है. आपका ई-मेल, आपका ऑफ़िशियल फ़ोन और सोशल नेटवर्किंग एकाउंट, आपके बारे में तमाम बातें लोगों को बता देता है.

जानकार कहते हैं कि आज की तारीख़ में मुलाज़िम, कंपनियों के लिए डेटा बन गए हैं जिन्हें इस पैमाने पर कसा जाता है कि वो कंपनी के लिए कितने कारगर या नुक़सानदेह हैं.

जासूसी नहीं भी हो रही है तो हमारे-आप के बॉस, मालिक और एचआर विभाग ये जानना चाहते हैं कि हम कितना काम करते हैं? दफ़्तर में कितना वक़्त गुज़ारते हैं? कितना लंबा ब्रेक लेते हैं? छुट्टियां कितनी लेते हैं? आपकी सेहत ठीक रहती है या नहीं?

आपके कंपनी की आप पर नज़र

वैसे, ये कोई नई बात नहीं है. कंपनियां, पिछली एक सदी से भी ज़्यादा वक़्त से अपने कर्मचारियों की जासूसी करती आई हैं.

जैसे कि बीसवीं सदी की शुरुआत में अमरीका की फ़ोर्ड मोटर कंपनी ने अपने कर्मचारियों की जासूसी के लिए बाक़ायदा एक विभाग बना रखा था. इस विभाग का नाम था, फोर्ड सोशियोलॉजिकल डिपार्टमेंट. इस विभाग के लोग कभी भी फोर्ड कंपनी के कर्मचारियों के घर पहुंच जाया करते थे.

वो ये देखते थे कि कर्मचारी अपना घर कितना साफ़-सुथरा रखते हैं. वो अपने जीवनसाथी से झगड़ा तो नहीं करते. शराब पीकर हंगामा तो नहीं करते. कर्मचारियों के बच्चे नियमित रूप से स्कूल जाते हैं, या नहीं. उनके खाते में ठीक-ठाक पैसे होते हैं या नहीं.

फ़ोर्ड को बंद करनी पड़ी जासूसी

फ़ोर्ड कंपनी, उस दौर में अपने कर्मचारियों को दूसरी कंपनियों के मुक़ाबले दोगुनी तनख़्वाह देती थी. ऐसे में वो चाहती थी कि उसके कर्मचारी अच्छा बर्ताव करें. अच्छा काम करें. जिस कर्मचारी के रहन-सहन में शिकायत पायी जाती थी, उसे नौकरी से निकाल दिया जाता था.

फ़ोर्ड की ये जासूसी क़रीब आठ साल चली. कर्मचारी अपनी ज़िंदगी में कंपनी की दखलंदाज़ी से बहुत नाराज़ होते थे. आख़िर में कंपनी को ये जासूसी बंद करनी पड़ी.

ये तो हुई आज से एक सदी पहले की बात कि किस तरह से फ़ोर्ड कंपनी अपने कर्मचारियों की जासूसी किया करती थी. आज की तारीख़ में अगर कोई कंपनी ऐसा करेगी तो बग़ावत हो जाएगी.

आज तो हम ख़ुद ही अपनी जानकारियां कंपनी को आसानी से मुहैया करा देते हैं स्मार्टफ़ोन से, अपने लैपटॉप या कंप्यूटर से और अपने ई-मेल और सोशल नेटवर्किंग एकाउंट से. हमारी हर गतिविधि का लॉग बनता है. इससे हमारे काम करने के तरीक़े, हमारी आदतों की ख़बर कंपनियों को हो जाती है.

रोज़ पैमाने पर कसा जाता है कर्मचारी

आज कामकाजी जगहों पर कर्मचारी की हर हरकत पर नज़र रहती है. सिर्फ़ सीसीटीवी कैमरे ही निगरानी नहीं करते. हम जो छुट्टियों पर जाने वाला टिकट ख़रीदते हैं, या जो ई-मेल लिखते हैं, या जिस सोशल नेटवर्किंग साइट पर लॉग-इन करते हैं, उनसे हमारे बारे में बहुत-सी जानकारियां मिल सकती हैं.

जैसे कि फ़ेसबुक के ज़रिए लोगों को आपकी पसंद-नापसंद का अंदाज़ा हो सकता है. इसी तरह ट्विटर के ज़रिए आपकी लोकेशन से लेकर आपके राजनैतिक विचार का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.

बहुत सी कंपनियों में आप अपने आई-कार्ड की मदद से ही कॉफ़ी मशीन से कॉफ़ी निकाल सकते हैं. इसी तरह कई जगह, मशीनों से गुज़रकर ही दफ़्तर से बाहर आ-जा सकते हैं. इन सबसे कंपनी को पता चल जाता है कि आप कितना वक़्त दफ़्तर में, कितना खाने-पीने में और कितना दफ़्तर से बाहर गुज़ारते हैं.

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बुजुर्गों की ज़िंदगी बदल रहे हैं ये डिजिटल जानवर

ये डेटा ही आपका प्रोफ़ाइल बनाता है. आपकी इमेज चमकाता या बिगाड़ता है. कुछ जानकार मानते हैं कि कर्मचारियों के बारे में आंकड़े जमा करने का ये कारोबार ही एक अरब डॉलर से ज़्यादा का है.

इन आंकड़ों की मदद से कंपनियां ये अंदाज़ा लगाती हैं कि कोई शख़्स कितनी देर तक काम करेगा. काम पर कितना ध्यान देगा. इसी आधार पर किसी को नौकरी पर रखा जा सकता है, या निकाला जा सकता है. कई जगह तो इसी आधार पर प्रमोशन मिलता है, या देने से मना कर दिया जाता है.

ब्रिटेन की लीसेस्टर यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाली फ़ीबे मूर कहती हैं आज डेटा जमा करने की वजह से कामकाजी जगहों पर मुलाज़िमों से ताल्लुक़ नए सिरे से तय हो रहे हैं. हालांकि आंकड़ों का ढेर भी किसी इंसान का सही आकलन नहीं कर सकता. पर, कंपनियों को बहुत-सी बातें तो पता चल ही जाती हैं.

डेटा के इस्तेमाल की दुविधा

कोई भी सेहतमंद और सक्रिय इंसान, काम भी अच्छा ही करेगा. वो छुट्टियां कम लेगा. इसीलिए अक्सर कंपनियां अपने कर्मचारियों की सेहत बेहतर करने के कार्यक्रम आयोजित करती रहती हैं.

ये आयोजन अक्सर ठेके पर होता है जिसमें कोई तीसरी कंपनी कर्मचारी की सेहत की पड़ताल करती है. ये आंकड़े यूं तो कंपनी को नहीं दिए जाते. मगर, कई बार कंपनियां जानना चाहती हैं कि कौन-सा कर्मचारी सेहत के पैमाने पर कितना खरा उतरा?

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हार्ड डिस्क नहीं अब डीएनए में स्टोर करें डेटा!

ये हमारी जासूसी ही है. यूरोपीय देशों में तो ऐसे डेटा के बेजा इस्तेमाल पर रोक के क़ानून हैं. मगर अमरीका में अभी भी आम लोगों को ऐसी जासूसी से बचाने वाले सख़्त क़ानून नहीं हैं. और जब अमरीका का ये हाल है, तो भारत जैसे देशों के बारे में तो अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है.

आज थर्ड पार्टी से मिले ऐसे आंकड़ों की मदद से सेहत से जुड़ा कारोबार चमक रहा है. यानी हमारी सेहत से जुड़े डेटा का हमारी जानकारी के बग़ैर इस्तेमाल हो रहा है.

डेटा की सुरक्षा पर सवाल

डेटा जमा करने के तरीक़े और इसकी सुरक्षा को लेकर सवाल उठ रहे हैं.

बहुत से लोग ऐसे हैं जो किसी फ़ायदे की सूरत में अपनी जानकारी देने को राज़ी हैं. 2015 में प्राइसवाटर हाउस कूपर ने अमरीका में एक सर्वे किया था. इसमें 56 फ़ीसदी लोगों ने कहा कि अगर दफ़्तर में माहौल बेहतर हो, उनकी सेहत अच्छी हो जाए और पैसे का फ़ायदा हो, तो वो कोई भी चीज़ हाथ में पहनने को तैयार हैं.

प्राइसवाटर हाउस कूपर के सर्वे से जुड़े राज मोदी बताते हैं कि अक्सर कर्मचारी ऐसी उम्मीद में अपनी जानकारी साझा करने को राज़ी हो जाते हैं.

लेकिन, अगर आपकी सेहत की जासूसी करके आपको नौकरी से निकालने का फ़ैसला कर लिया जाए तो?

2010 में अमरीका में ऐसा ही हुआ था. पामेला फ़िंक नाम की एक महिला ने अपनी कंपनी पर मुक़दमा ठोक दिया था.

उस महिला का आरोप था कि उसकी कंपनी ने उसके बीमे का बिल देखकर ये अंदाज़ा लगाया कि उसे कोई गंभीर बीमारी है. इसीलिए किसी जवाबदेही से बचने के लिए उसे नौकरी से निकाल दिया गया. बाद में पामेला का कंपनी से कोर्ट के बाहर समझौता हुआ.

मगर इससे एक बात साफ़ हो गई. आपकी सेहत की फ़िक्र दिखाने वाली कंपनियां असल में अपनी वित्तीय ज़िम्मेदारी को लेकर सचेत रहना चाहती हैं. इसलिए वो आपकी सेहत से जुड़ी जानकारी की जासूसी करती हैं.

पर, हर कंपनी ऐसा करती ही हो, ये भी ज़रूरी नहीं.

डिजिटल ज़िंदगी के आदी

हां, ये ज़रूर है कि हमसे जुड़ी जानकारियों के आधार पर कंपनियां ये तय करती हैं कि हम उसके लिए कितने काम के हैं, या कितना बड़ा बोझ हैं.

आज की तारीख़ में हमें डेटा को लेकर बहुत ही संतुलित रवैया बनाने की ज़रूरत है.

हम जो डिजिटल ज़िंदगी जीने के आदी हो गए हैं, उससे एकदम तो अलग नहीं हो सकते. और ये भी तय है कि हमारी गतिविधियों से दर्ज डेटा का इस्तेमाल भी होगा.

ऐसे में हमें ही ये तय करना होगा कि हम डिजिटल दुनिया में कितने सक्रिय रहते हैं. अपनी कितनी जानकारी साझा करते हैं. अपनी कौन-सी आदतें बयां करते हैं.

भारत में आधार तो चीन में डिजिटल स्कोर

वैसे, कई देशों में तो आपको अपनी जानकारी देना अनिवार्य बना दिया गया है. भारत में ही सरकार ने आधार को आपके बैंक, फ़ोन, बीमा, म्युचुअल फंड और न जाने कितनी सेवाओं से जोड़ना ज़रूरी बना दिया है.

इसी तरह, चीन में 2020 तक हर नागरिक का डिजिटल स्कोर होगा. ये स्कोर उसकी ख़रीदारी से लेकर इस बात पर तय होगा कि वो कौन-सी किताब पढ़ता है.

डेटा चोरी से डरने की ज़रूरत तो है. मगर इतना भी नहीं कि हम फ़ोन या कंप्यूटर को हाथ ही लगाना बंद कर दें.

कई बार आंकड़ों की ज़रूरत पड़ती है. डेटा की मदद से आपको करियर से जुड़ी सलाह भी मिल सकती है.

आपको अपनी सेहत बेहतर करने की सलाह भी हासिल हो सकती है. आप अपना कामकाज भी बेहतर कर सकते हैं.

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दिल्ली का 'डिजिटल' गाँव कितना डिजिटल

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