हंसने से कैसे बेहतर होता है आपका काम?

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हंसी, ख़ुशी जताने का सबसे आसान ज़रिया है. इंसान को ये क़ुदरत की नेमत है. दुनिया में बहुत से लॉफ्टर क्लब चल रहे हैं, जिनका मक़सद हंसाकर सेहत बेहतर बनाना है.

मगर क्या हंसी हमारे करियर में भी कारगर हो सकती है? क्या हंसी के ज़रिए हम दफ़्तर में ज़्यादा मज़बूत, क्रिएटिव टीम बना सकते हैं?

यूं तो दफ़्तर में हंसी-ठिठोली और मज़ाक़ चलते रहते हैं. मगर, 2008 की मंदी के बाद पश्चिमी देशों मे दफ़्तर में हंसने का मतलब ये लगाया जाने लगा कि आप के पास काम नहीं है.

पहले जहां दफ़्तर में लोग एक-दूसरे की मेज पर जाकर बातचीत या मस्ती कर लेते थे, उसकी जगह ई-मेल और चैटिंग ऐप्स ने ले ली.

नतीजा ये हुआ कि अक्सर दफ़्तर में अनौपचारिक बातचीत ग़ैर-ज़रूरी मानी जाने लगी.

लेकिन, अगर हम ये कहें कि आधिकारिक बातचीत के अलावा गप-शप और हंसी-मज़ाक़ से टीम में सहयोग बढ़ता है. लोग नया काम करने के लिए प्रेरित होते हैं. तो, शायद आप यक़ीन न करें.

बरसों तक हंसी की ताक़त से मुंह फेरे बैठे वैज्ञानिक भी अब इसे लेकर संजीदा हो गए हैं.

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हंसी का विज्ञान

आख़िर हंसी क्या है? पिछले दो दशकों में इस बात को समझने के लिए अमरीका के न्यूरोसाइंटिस्ट रॉबर्ट प्रोवाइन ने काफ़ी रिसर्च की है.

वो अमरीका की मैरीलैंड यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफ़ेसर हैं. रॉबर्ट प्रोवाइन कहते हैं कि, 'हंसी इंसान का सामाजिक संकेत देने का ज़रिया है. हंसी का मतलब रिश्तों से है'.

प्रोवाइन ने इस बात पर रिसर्च की है कि आख़िर इंसान हंसता कब है.

उन्होंने पाया कि जब हम दूसरे लोगों के साथ होते हैं, तो हमारे हंसने की संभावना क़रीब 30 गुना बढ़ जाती है. अकेले रहने पर हम आम तौर पर नहीं हंसते.

प्रोवाइन कहते हैं कि, 'इंसान के हंसने के गुण का विकास इसलिए हुआ ताकि इसका दूसरों पर असर पड़े. इसका हमारी सेहत या मूड से ज़्यादा ताल्लुक़ नहीं'.

दफ़्तर में अक्सर हम छोटी-मोटी बातों के बाद हंस पड़ते हैं. कई बार लोग ये कहते हुए बरबस हंस पड़ते हैं कि, 'हां, हम ये संभाल लेंगे' या 'मुझे लगता है कि मैं तो गया' या फिर 'तुम, फिर शुरू हो गए'. जो लोग इन बातों का हिस्सा होते हैं उन्हें पता होता है कि किस बात के बाद हंसी-ठहाका शुरू होने वाला है.

दफ़्तर में हम हमेशा किसी मज़ाक़ या चुटकुले पर नहीं हंसते. कई बार सामान्य बातचीत भी हमें हंसी की तरफ़ ले जाती है.

लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज की प्रोफ़ेसर सोफ़ी स्कॉट कहती हैं कि, 'हंसी के ज़रिए हमारा अवचेतन मन ये संकेत देता है कि हम सुकून में हैं और सुरक्षित महसूस कर रहे हैं'.

बेफ़िक्री का इशारा

बहुत से स्तनधारी जीव हंसी जैसे हाव-भाव दिखाते हैं.

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प्रोफ़ेसर सोफ़ी कहती हैं कि चूहे हंसते हुए किसी मुश्किल का ख़याल आते ही ख़ामोश से हो जाते हैं. ठीक यही बात इंसानों में भी देखी जाती है.

यानी हंसते हुए लोग बेफ़िक्री का इशारा करते हैं. ये संकेत है इस बात का कि वो एक सुरक्षित समूह के बीच हैं.

यानी अगर कुछ लोग मिलकर हंस रहे हैं तो वो एक-दूसरे के साथ महफ़ूज़ महसूस करते हैं.

ये बेहद अहम बात है. क्योंकि तमाम रिसर्च बताते हैं कि जब हमारा दिमाग़ सुकून में होता है, तो हमारे ज़हन में ज़्यादा अच्छे विचार आते हैं. हम खुलकर काम करते हैं, तो बेहतर नतीजे निकलते हैं. हम ज़्यादा क्रिएटिव हो जाते हैं.

एक रिसर्च के दौरान कुछ लोगों को कॉमेडियन रॉबिन विलियम्स की कॉमेडी का वीडियो दिखाया गया. इसके बाद देखा गया कि उन लोगों ने दूसरे ग्रुप के मुक़ाबले एक पहेली ज़्यादा आसानी से हल कर ली.

शायद हंसी के ज़रिए हमारा दफ़्तर का तनाव कम होता है.

ज़हनी दीवार

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर टेरीज़ा एमाबाइल ने इस बात पर काफ़ी रिसर्च की है कि हमारा दिमाग़ सबसे ज़्यादा क्रिएटिव कब होता है.

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उन्होंने पाया कि जब हम सुकून में होते हैं. ज़हनी तौर पर सुरक्षित महसूस करते हैं, तो हम ज़्यादा क्रिएटिव होकर सोचते हैं. दफ़्तर में सुकून का माहौल क्रिएटिविटी को बढ़ाता है.

हंसी के कई काम होते हैं. इससे हम टीम के दूसरे साथियों से ज़्यादा जुड़ाव महसूस करते हैं. हम अपने इर्द-गिर्द जो ज़हनी दीवार बना लेते हैं, वो दीवार गिर जाती है.

इससे तबादला-ए-ख़याल आसान हो जाता है.

रॉबर्ट प्रोवाइन कहते हैं कि हमें दफ़्तर में हंसी-मज़ाक़ को बढ़ावा देना चाहिए. कंपनियों को चाहिए कि ऐसे आयोजन करें, जिससे लोगों को आपस में ज़्यादा मेल-जोल का मौक़ा मिले.

टीम के बीच बॉन्डिंग बढ़े. हमेशा सिर्फ़ पॉवर प्वाइंट प्रेज़ेंटेशन होता रहेगा, तो लोग बोर हो जाएंगे. उनकी क्रिएटिविटी पर असर पड़ेगा.

सुकून भरी गप-शप

अमरीका के मशहूर मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी के प्रोफ़ेसर एलेक्स सैंडी पेंटलैंड भी यही सलाह देते हैं.

2014 में गूगल टॉक के एक सेशन में प्रोफ़ेसर सैंडी ने कहा कि ई-मेल पर बातचीत के बजाय हमें रूबरू बात करते रहने को तरजीह देनी चाहिए. इससे किसी भी टीम की प्रोडक्टिविटी 30 से 40 फ़ीसद तक बढ़ जाती है.

रफ़्तार भरी ज़िंदगी के दौर में सुकून भरी गप-शप को लोग अक्सर ग़ैरज़रूरी ठहराकर इसका विरोध करते हैं.

लेकिन, अब तो आप को पता ही है कि विज्ञान भी इस हंसी-मज़ाक़ को बेहद ज़रूरी बताता है.

तो आगे से कभी अगर आप को दफ़्तर में गप-शप या हंसी-मज़ाक़ के दौरान टोका जाए, तो आप तमाम रिसर्च का हवाला देकर ज़ोर का ठहाका लगा सकते हैं.

हो सकता है कि इससे दूसरों को भी प्रेरणा मिले.

(बीबीसी कैपिटल का ये मूल लेख अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें.)

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