रोज़ाना इस्तेमाल होने वाली 6 चीज़ें जो चांदी से महंगी हैं

  • 18 जून 2018
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अगली बार जब आप वनीला आइसक्रीम खाएं तो उसे ज़रा ध्यान से देखियेगा, और सोचियेगा कि क्या आप सच में चांदी की क़ीमत की आइसक्रीम खा रहे हैं.

आपके केक, कस्टर्ड, चॉकलेट और मिठाई को स्वाद देने वाली वनीला की फ़सल दुनिया के उष्णकटिबंधीय इलाक़ों में होती है.

आपको ये जानकर हैरानी होगी कि वनीला की क़ीमत चांदी से भी ज्यादा है.

साल 2017 के बाद से दूसरी बार वनीला की क़ीमत 600 डॉलर प्रति किलोग्राम पहुँची है. यानी भारतीय मुद्रा में एक किलो वनीला खरीदना चाहेंगे तो आपको लगभग 40,800 रूपये ख़र्च करने पड़ेंगे.

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इसका एक बड़ा कारण है मैडागास्कर में चक्रवाती तूफ़ान का आना. तूफ़ान की वजह से इस द्वीप पर वनीला की फ़सल का एक बड़ा हिस्सा ख़राब हो गया था.

मैडागास्कर में दुनिया की तीन चौथाई वनीला की फ़सल होती है.

भारत में इस समय चांदी की क़ीमत क़रीब 43,500 रुपये प्रति किलो है. वहीं अमरीका में इसका मूल्य 538 डॉलर यानी 36,597 रुपये प्रति किलो है.

वनीला की बढ़ती क़ीमत से कुछ आइसक्रीम कंपनियां इसके फ़्लेवर का इस्तेमाल कम कर रही हैं. यही वजह है कि गर्मी के इस सीज़न में इसकी कमी भी हो सकती है.

लेकिन वनीला इकलौती ऐसी चीज़ नहीं है जो रोज़मर्रा में इस्तेमाल होने के बावजूद चांदी की तुलना में महंगी है.

यहाँ ऐसी ही 6 अन्य चीज़ें हम आपको बता रहे हैं जिनका आप रोज़ इस्तेमाल करते हैं. लेकिन आपको ये अंदाज़ा नहीं होता कि उनकी क़ीमत चांदी से ज्यादा है.

1. केसर

केसर दुनिया के सबसे महंगे मसालों में से एक है. एक किलो केसर के लिए लगभग डेढ़ लाख फूलों की ज़रूरत पड़ती है.

हालांकि इसके फूल की क़ीमत तुलनात्मक रूप से कम होती है. लेकिन कटाई के बाद और सुखाए जाने पर इसकी क़ीमत काफ़ी बढ़ जाती है.

एक ग्राम केसर के लिए आपको पाँच से 25 डॉलर तक ख़र्च करने पड़ सकते हैं. कई बार इसके दाम जगह पर भी निर्धारित होते हैं.

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एक अनुमान है कि इसका मूल्य दो हज़ार और 15 हज़ार डॉलर प्रति किलो के बीच में रहता है.

यानि भारतीय मुद्रा में देखा जाये तो इसकी क़ीमत एक लाख 36 हज़ार रुपये से लेकर क़रीब सवा 10 लाख के बीच होगी.

ग्रीन सेफ़्रॉन नाम की आयरिश कंपनी केसर की बड़ी आयातक है. इसके संस्थापक और मसालों के जानकार अरुण कपिल कहते हैं, "केसर की कटाई के समय बहुत ही हल्के हाथों की ज़रूरत होती है. ये थोड़ा मुश्किल काम है लेकिन ये हाथों से ही किया जा सकता है."

केसर आँखों के लिए बहुत अच्छा माना जाता है.

इसके महंगे होने के कारण बाज़ार में नकली केसर आसानी से मिल जाता है जिसमें नकली रंगों का इस्तेमाल किया जाता है.

2. कॉफी

बाज़ार में कई तरह की कॉफ़ी उपलब्ध है. सभी की क्वालिटी में थोड़ा बहुत अंतर होता है.

कॉफ़ी की कई किस्में हैं जिनमें से कुछ की क़ीमत चांदी से भी ज़्यादा है.

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'कोपी लुवाक' नाम की एक ऐसी ही मशहूर कॉफ़ी की किस्म है जिसे इंडोनेशिया में तैयार किया जाता है.

इसका उत्पादन एशिया में पाई जाने वाली सिवेट बिल्लियों के मल से किया जाता है. इन बिल्लियों को कॉफ़ी के फल खिलाये जाते हैं और फिर उनके मल से कॉफ़ी के दानों को चुनकर निकाला जाता है.

उत्पादकों का मानना है कि ऐसा करने से कॉफ़ी में एक नेचुरल मीठापन आता है.

अगर ये प्रक्रिया पालतू बिल्लियों की जगह जंगली सिवेट बिल्लियों से साथ की जाती है तो कॉफ़ी की क़ीमत 660 डॉलर प्रति किलो से भी ज़्यादा होती है.

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हालांकि इस कॉफ़ी की डिमांड ने जानवरों के अधिकार के लिए लड़ने वाली संस्थाओं के लिए चिंता पैदा कर दी है.

जानकार मानते हैं कि इतनी महंगी होने के बावजूद भी रेगुलर कॉफ़ी के सामने, कोपी लुवाक अच्छी नहीं है. हालांकि बड़े बाज़ारों में इससे भी महंगी कॉफ़ी की किस्में मौजूद हैं.

जैसे थाइलैंड की ब्लैक आइवरी कॉफ़ी. ये हाथियों के मल से बनाई जाती है. इसके लिए हाथियों को ख़ास अनाज खिलाया जाता है.

इस प्रक्रिया से प्राप्त एक किलो कॉफ़ी के लिए 1,800 डॉलर यानी लगभग सवा लाख रूपये देने पड़ सकते हैं.

3. वियाग्रा

कहा जाता है कि पैसे से प्यार नहीं खरीदा जा सकता.

लेकिन जो लोग वियाग्रा की एक छोटी-सी नीली गोली पर पैसे ख़र्च करते हैं, वो उससे थोड़ी-सी ख़ुशी पाने की कोशिश तो ज़रूर करते हैं.

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दवाइयाँ बनाने वाली कंपनी फ़ाइज़र के वैज्ञानिकों ने हाइपरटेंशन के इलाज के लिए साल 1989 में वियाग्रा को विकसित किया था.

लेकिन टेस्ट के समय इसके कुछ असामान्य दुष्परिणाम देखे गए. इस दवा को पुरुषों के लिए इस्तेमाल किया गया था जिसका उन पर सीधा असर देखा गया.

नौ साल बाद इसे आधिकारिक मान्यता मिल गई. साल 2012 आते-आते कंपनी के लिए वियाग्रा आय का एक अच्छा विकल्प बन गया.

फाइनेंशियल टाइम्स अख़बार के अनुसार, अमरीका में इस साल की शुरुआत में फ़ाइज़र कंपनी ने जनवरी 2017 की तुलना में वियाग्रा के दाम 39 प्रतिशत बढ़ाने की घोषणा की है.

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अख़बार की रिपोर्ट के अनुसार, नए दाम लागू होने से 100 मिलीग्राम की एक गोली का मूल्य 57.94 डॉलर से 80.82 डॉलर तक पहुंच गया.

भारतीय रुपये में देखें तो अमरीका में मिल रही ये गोली अब लगभग चार हज़ार से पांच हज़ार रुपये के बीच होगी.

हालांकि कंपनी अब इसके बदले एक सस्ती दवा लेकर आई है, जो एक सफ़ेद रंग की गोली है. लेकिन ये साफ़ देखा गया है कि नीली वाली वियाग्रा आज भी लोगों के बीच अन्य दवाओं के मुक़ाबले ज्यादा प्रचलित है.

वैसे वियाग्रा दुनिया में मिलने वाली सबसे महंगी दवाओं से अभी भी कोसों दूर है. कई अनुवांशिक दुर्लभ बीमारियों के इलाज के लिए एक महीने में हज़ारों रुपये का ख़र्च दवाओं पर करना पड़ता है.

4. मुँह के छालों के लिए क्रीम

जर्नल ऑफ़ डर्माटॉलॉजी में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, ऑस्टिन के टेक्सास विश्वविद्यालय के त्वचा विशेषज्ञों ने त्वचा संबंधी बीमारियों में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की क़ीमतें तेज़ी से बढ़ने की बात कही है.

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उन्होंने दवाओं की क़ीमतों की तुलना आईफ़ोन और गोल्ड जैसी महंगी चीज़ों से करके देखी. इसके बाद उन्हें कुछ हैरान करने वाले परिणाम मिले.

ज़ोविरॉक्स नाम की एक क्रीम का उन्होंने ज़िक्र किया है. इसकी दो ग्राम की एक ट्यूब के लिए ब्रिटेन में मरीज़ को 6.75 डॉलर देने पड़ते हैं.

ये क्रीम दाद, खाज-खुजली के इलाज में इस्तेमाल होती है. ये लोगों में आमतौर पर होने वाली समस्याएं हैं जिनके इलाज के लिए लोग ख़ुद ही दवाएं ख़रीदते हैं.

टेक्सास विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने पाया है कि इस दवा का शरीर पर कोई बुरा प्रभाव नहीं है, इसलिए इसकी क़ीमत में बढ़ोतरी की गई है.

साल 2007 में इस क्रीम की क़ीमत 22 डॉलर प्रति ग्राम थी जो बाद में साल 2015 में 168 डॉलर प्रति ग्राम कर दी गई.

इसका मतलब है कि एक किलो क्रीम के लिए 168 हज़ार डॉलर यानी भारतीय मुद्रा में एक करोड़ 10 लाख से ज़्यादा रुपये देने होंगे. ये क़ीमत, इस मात्रा में गोल्ड ख़रीदने की क़ीमत से चार गुना है.

हालांकि इस दवाई की क़ीमत तब से काफ़ी गिर गई है. अब इसकी क़ीमत 48 हज़ार डॉलर (32 लाख रूपये से ज़्यादा) प्रति किलो के क़रीब है.

बाज़ार में इन बीमारियों के लिए साधारण दवाएं भी मौजूद हैं जो काफ़ी सस्ती हैं.

लेकिन त्वचा संबंधी समस्या के लिए जेरेस नाम की एक दवा है, जो इससे भी महंगी है. शोधकर्ताओं के अनुसार, साल 2015 में जेरेस की क़ीमत 248 हज़ार डॉलर (क़रीब एक करोड़ 70 लाख रुपये) प्रति किलो थी.

5. फ़ेशियल क्रीम

दुनिया भर में बाज़ार में सुंदरता का बहुत बड़ा व्यापार फैला हुआ है.

कॉस्मेटिक बाज़ार में हर साल 532 बिलियन डॉलर यानी 36 हजार 176 अरब रुपये का फ़ायदा होता है.

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क्रीम द ल मेर बहुत ही प्रचलित और महंगी क्रीम मानी जाती है. इसकी 30 मिलीलीटर की बोतल की क़ीमत 162 डॉलर (11 हजार रुपये) है और 500 मिलीलीटर के लिए 2,057 डॉलर (क़रीब डेढ़ लाख रुपये) देने पड़ेंगे.

मूल रूप से इसे सी-वीड के रस से बनाया जाता है. हालांकि इसे कैसे तैयार किया जाता है और इससे त्वचा को मिलने वाली नमी का क्या कारण है, इसे कंपनी ने राज़ रखा है. लेकिन इस क्रीम की क़ीमत चांदी से छह गुना है.

ऐसी ही एक क्रीम है रिवाइव. इस क्रीम की 48 ग्राम की पैकिंग के लिए 385 डॉलर (लगभग 26 हजार रुपये) ख़र्च करने पड़ते हैं. इसका मतलब है कि एक किलो क्रीम के लिए 7,988 डॉलर (लगभग साढ़े पाँच लाख रुपये) ख़र्च करने होंगे.

रिवाइव क्रीम तैयार करने वाली कंपनी का कहना है, "एडवांस तकनीक और इसके रिसर्च पर हुए बड़े ख़र्च के कारण ये क्रीम इतनी महंगी है."

6. प्रिंटर की इंक

प्रिंटर इस्तेमाल करने वाले लोगों का आपने अक्सर कहते सुना होगा कि इसका हार्डवेयर या कोई छोटा-मोटा पुर्जा तो आसानी से मिल जाता है, लेकिन प्रिंटर की रंगीन इंक मिलने में दिक्कत होती है.

प्रिंटर की इंक को लेकर दुकानदार बिल्कुल भी मोलभाव के लिए तैयार नहीं होते.

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प्रिंटर के जिस पुर्जे में इंक भरी जाती है उसे कार्टरिज कहते हैं. इसे बदलवाने का ख़र्च 8 से 27 डॉलर (546-1843 रुपये) के बीच हो सकता है. हालांकि ये क़ीमत कार्टरिज के मॉडल पर भी आधारित होती है.

4 मिलीलीटर की सिर्फ़ काली इंक वाली कार्टरिज को तैयार करने से लेकर इसकी क़ीमत 23 डॉलर (1570 रुपये) हो सकती है, जिसकी क्षमता क़रीब 200 पन्ने प्रिंट करने की होती है.

कार्टरिज बनाने वालों का कहना है कि वे प्रिंटर और उसके हार्डवेयर को जिस क़ीमत पर तैयार किया जाता है और उसे बेचा जाता है, उसके नुक़सान की भरपाई करने के लिए वो इंक की ज़्यादा क़ीमत वसूल करते हैं.

लेकिन अगर आप इंक कार्टरिज को खोलेंगे तो उसमें आप देखेंगे कि अंदर के अधिकांश हिस्से में स्पंज लगाया हुआ है. जो इंक को सही से रखने में मदद करता है.

एक किलो इंक के लिए ग्राहक 1,733 डॉलर ख़र्च करते हैं. यानी सवा लाख रुपये से कुछ कम.

अगर आप तुलना करेंगे तो पायेंगे कि चांदी की प्रिंटिंग करवाना इससे सस्ता होगा.

(बीबीसी कैपिटल की इस कहानी को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए आप इस लिंक पर क्लिक करें.)

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