खुले दफ़्तरों में आपस में क्यों कम बात करते हैं लोग

  • 27 जुलाई 2018
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खुले-खुले, बिना दीवार और केबिन वाले दफ़्तरों की शुरुआत इसलिए हुई थी कि वहाँ काम करने वाले लोगों के बीच संवाद ज्यादा हो और उनमें तालमेल बढ़िया रहे.

लेकिन एक नये शोध से पता चला है कि बिना दीवार और केबिन वाले खुले दफ़्तरों में लोग आमने-सामने की बात करने में 73 फ़ीसदी कम समय दे रहे हैं, जबकि ई-मेल और इलेक्ट्रॉनिक संदेश भेजना 67 फ़ीसदी बढ़ गया है.

ये अध्ययन खुले दफ़्तरों में काम करने वाले लोगों के बीच संचार के अलग-अलग तौर-तरीक़ों के असर को मापने के लिए किया गया.

कर्मचारियों के बीच के संवाद को समझने के लिए इलेक्ट्रॉनिक बैज और माइक्रोफ़ोन का सहारा लिया गया. उनके ई-मेल करने के पैटर्न में होने वाले बदलावों को भी परखा गया.

पहले के कुछ शोध से इस बात का पता चला था कि बिना दीवार, बिना केबिन वाले ख़ुले दफ़्तरों में कर्मचारियों का ध्यान बार-बार बंटता रहता है और वे अपने काम पर फ़ोकस नहीं कर पाते.

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खुले दफ़्तर क्यों?

सैद्धांतिक रूप से देखें तो खुले दफ़्तर बनाने के पीछे एक नहीं, कई कारण हैं.

किसी भी काम के प्रति हमारी लगन और हमारी प्रेरणा बहुत हद तक सामाजिक परिवेश से प्रभावित होती है.

नये ज़माने के दफ़्तरों की क़ामयाबी में इस बात का भी हाथ रहता है कि वहाँ काम करने वाले लोग आपस में और संगठन के साथ कितने अच्छे से संवाद कर पाते हैं.

शोध से पता चला है कि पिछले 20 साल में कर्मचारियों के बीच तालमेल और सहयोग बढ़ाने के उपाय करने में लगने वाला समय 50 फ़ीसदी या उससे भी ज़्यादा बढ़ गया है.

जिन दफ़्तरों में आपसी संपर्क के बेहतर उपायों और साधनों का इस्तेमाल होता है:

  • वहाँ के कर्मचारियों के बीच संचार अच्छा होता है.
  • काम के प्रति उनमें सहयोग बेहतर होता है.
  • काम से संतुष्टि ज्यादा रहती है.
  • सामाजिक सुरक्षा की भावना भी बढ़ती है.

दफ़्तर की बनावट इन सबको प्रभावित करती है. डिजाइन से इस बात पर बहुत फ़र्क पड़ता है कि एक-दूसरे पर निर्भर काम को करने में मदद मिल रही है या उसमें बाधा आ रही है.

साफ़-सुथरे दफ़्तर, संकरे गलियारे, सामुदायिक रसोई और इस जैसे कुछ दूसरे उपाय करके दफ़्तर के परिवेश को बेहतर बनाया जा सकता है.

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निजता और एकाग्रता

दफ़्तरों में एकाकीपन के लिए स्थान नहीं होता, लेकिन निजता जरूरी होती है.

कर्मचारियों के बीच तालमेल और सहयोग बढ़ाने के उपाय करने के साथ-साथ कर्मचारियों की एकाग्रता और काम पर उनका फ़ोकस भी जरूरी है.

शोध से पता चला है कि जब कर्मचारी अपने काम पर एकाग्र नहीं हो पाते, तब वे कम संवाद करते हैं और अपने सहकर्मियों की तरफ से उदासीन हो जाते हैं.

सूचना के साधनों की मदद से जरूरी जानकारियाँ इकट्ठा करना, उनका विश्लेषण करना और फ़ैसले लेना, दफ़्तरों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए ये सामान्य बातें हैं.

जब इस प्रक्रिया में कोई बाधा आती है तो उनकी कार्य-कुशलता पर असर पड़ता है और गलतियां होने की संभावना बढ़ने लगती है.

ध्यान बंटाने वाली या बाधा उत्पन्न करने वाली चीजों से प्रभावित हुए बिना किसी काम पर फ़ोकस करना उस काम को प्रभावी तरीके से करने के लिए बहुत जरूरी है.

शोध से ऐसे संकेत मिलते हैं कि दफ़्तरों की घटिया डिज़ाइन उलटे नतीजे देती है.

भीड़ बढ़ने और प्राइवेसी कम होने से ध्यान बंटता है जिससे काम निपटाने में ज्यादा जोर लगाना पड़ता है.

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तालमेल बढ़ ही जाए, ज़रूरी नहीं

कई खुले दफ़्तरों में कर्मचारियों में आपसी संवाद बढ़ाने और उनके बीच तालमेल और सहयोग को बेहतर करने के लिए फ़ोकस और एकाग्रता से समझौता कर लिया जाता है.

इससे कर्मचारियों का ध्यान बंटने लगता है और काम पर फ़ोकस करना मुश्किल होने लगता है. उनके ज्ञानात्मक और भावनात्मक स्रोत सूखने लगते हैं.

नतीजतन, काम का दबाव बढ़ने लगता है, गलतियां होने लगती हैं और परफॉर्मेंस पर बुरा असर पड़ता है. जब कर्मचारी अपने काम पर फ़ोकस नहीं कर पाते, तब दूसरों से संवाद करने और सहयोग बढ़ाने की उनकी इच्छा भी कम होने लगती है.

कुछ नये शोध यह भी बताते हैं कि काम की जगह पर भीड़ बढ़ने और प्राइवेसी कम होने से लोग बचाव के रास्ते तलाशने लगते हैं, उनका व्यवहार बदल जाता है और दफ़्तर में सहयोगियों के साथ रिश्ते बिगड़ने लगते हैं.

काम की जगह पर अगर सूरज की रौशनी आ रही है या प्राकृतिक हरियाली दिख रही हो तो जरूर काम पर फ़ोकस करने या एकाग्रता बढ़ाने में मदद मिलती है और ध्यान बंटाने वाली चीजों से बचाव हो जाता है.

परिवेश यदि सुंदर हो. डिजाइन में कलात्मकता हो तो संवेदनाओं को जगाने में मदद मिलती है.

शोध से यह भी पता चला है कि कलात्मक और आँखों को भाने वाले दफ़्तरों में विश्वास बढ़ाने में मदद मिलती है.

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संतुलन कैसे बनाया जाए

हाल के दिनों में हुए शोध इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि एक ही दफ़्तर में काम करने वाले व्यक्तियों का वहाँ के परिवेश के प्रति नजरिया अलग-अलग होता है.

बिना दीवार, बिना केबिन वाले खुले दफ़्तरों में सबके लिए एक जैसा परिवेश देने की जगह यदि उनके लिए अलग-अलग विकल्प दिए जाएं तो कर्मचारियों को ज्यादा बेहतर और कुशल ढंग से काम करने में मदद मिलती है.

दफ़्तरों को डिजाइन करने के नये मॉडल में इस बात का ध्यान रखा जाता है कि अलग-अलग काम और अलग-अलग जरूरतों के हिसाब से दफ़्तर के अलग जोन बनाए जाएं.

लेकिन यहाँ साझा डेस्क बनाने के क्या असर होंगे, इस बारे में अभी और शोध की जरूरत है.

कई बॉस संगठन के अलग-अलग विभागों और कर्मचारियों के बीच सहयोग और संवाद बढ़ाने में इतने मशरूफ होते हैं कि वो निजता और एकाग्रता को नज़रअंदाज कर देते हैं.

इसका नकारात्मक असर उत्पादकता और कामकाजी संबंध, दोनों पर पड़ता है.

संगठनों को काम करने की ऐसी जगह बनानी चाहिए जहां प्राइवेसी का भी ध्यान रखा जाए, कर्मचारियों को काम पर फ़ोकस करने में भी मदद मिले.

जहाँ कर्मचारियों के बीच संवाद हो और उनके बीच तालमेल भी बढ़े. इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए काम की जगह को ऐसा होना चाहिए कि वहाँ आँख और कान दोनों के लिए एक पर्दा हो, शोर कम हो.

दफ़्तर का ले-आउट सुंदर और आंखों को भाने वाला हो. ऐसा दफ़्तर ही होगा आदर्श दफ़्तर.

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