वक़्त पर क्यों नहीं हो पाते हमारे काम

  • 12 सितंबर 2018
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कौन नहीं चाहता कि वह वक़्त का पाबंद हो? उसका हर काम तय समय पर हो.

सभी किसी न किसी तरीके से अपने समय का हिसाब रखते हैं. कुछ लोग डायरी रखते हैं. कुछ हाई-टेक ऐप और टूल का सहारा लेते हैं.

वक़्त का हिसाब-किताब रखने की शुरुआत तो बड़े जोश से होती है, लेकिन कुछ ही दिनों में सारा जोश ठंडा पड़ने लगता है.

ब्रिटेन के हरफोर्डशायर की उद्यमी शार्लोट बॉर्डेवे ने टाइम मैनेजमेंट ऐप से लेकर किताब और डायरी तक सब कुछ आजमा लिया. लेकिन शार्लोट को लगता है कि वक़्त उनके हाथ से फिसला जा रहा है.

"मैं कभी इतना व्यवस्थित नहीं हो पाई कि अपने सारे काम समय से कर पाऊं."

टेक्सास के ऑस्टिन में पीएचडी कर रही एना सिसिलिया कैले ने अपने काम याद रखने के लिए ऐप का सहारा लिया. टाइम मैनेजमेंट ऐप का दावा था कि अपने जीवन की गतिविधियों पर कैले का 'नियंत्रण' रहेगा.

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कैले के लिए यह सब कुछ दिनों तक तो कामयाब रहा, फिर इसने काम करना बंद कर दिया. बात बन नहीं पाई.

ऐसा होने पर ज्यादातर लोग दूसरे ऐप या किसी दूसरे टूल का सहारा लेते हैं. टाइम मैनेज करने वाले सैकड़ों ऐप उपलब्ध हैं. किसी में कम फ़ीचर हैं किसी में ज्यादा.

अपने समय को व्यवस्थित कैसे करें, इस बारे में इंटरनेट पर असंख्य ब्लॉग और वीडियो मौजूद हैं.

अमरीका और ब्रिटेन की ज्यादातर यूनिवर्सिटीज़ किसी ना किसी रूप में टाइम मैनेजमेंट की ट्रेनिंग देती हैं. लेकिन अब तक किसी को वह तरकीब नहीं मिली जो सच में काम कर सके.

टाइम मैनेजमेंट टूल से तनाव कम होने चाहिए थे, लेकिन असल में वे तनाव बढ़ा रहे हैं. कुछ टूल्स कुछ लोगों के लिए तो काम करते हैं, लेकिन सबके लिए नहीं.

मॉन्ट्रियल की कॉनकोर्डिया यूनिवर्सिटी के रिसर्चर ब्रैड एयॉन और जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के हर्मन आगुर्निस ने अपने रिसर्च पेपर में कहा है कि "टाइम मैनेजमेंट और खुशी में सीधा रिश्ता नहीं है."

काम ज्यादा या तालमेल की दिक्कत

अपना शोध निबंध समय पर पूरा नहीं कर पाने के बाद कैले ने टाइम मैनेजमेंट की कक्षाओं में जाना शुरू किया था. वहां उन्होंने टाइम मैनेजमेंट टूल्स के बारे में जाना.

शुरुआत में कैले के काम समय पर होने लगे, लेकिन फिर एक के बाद एक सारे टूल्स नाकाम होने लगे.

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कैले कहती हैं, "हम खुद से पूछते हैं कि क्या हम उतना काम नहीं करते जितना हम कर सकते हैं. लेकिन हम यह कभी नहीं सोचते कि हम जितना कर सकते थे उससे ज्यादा कर रहे हैं."

काम के लिए अपने पीछे पड़े रहने से भी नुकसान होता है.

ब्रैड एयॉन के मुताबिक समय को व्यवस्थित करने वाले ऐप इस तरह से बनाए जाते हैं कि आप हमेशा खुद से बेहतर काम करेंगे. लेकिन खुद पर दबाव बना लेने से काम नहीं बनता और लोग निराश होने लगते हैं. यह खुद को हराने वाली रणनीति है.

ज्यादातर लोग सोचते हैं कि टाइम मैनेजमेंट टूल के इस्तेमाल से वे ज्यादा काम करने लगेंगे. लेकिन वे यह नहीं सोचते कि कोई ऐप आपकी उत्पादकता को हमेशा नहीं बढ़ा सकता.

एयॉन कहते हैं, "यह समय पर काम पूरा ना कर पाने की समस्या नहीं है. असल समस्या यह है कि लोग ज्यादा काम कर रहे हैं."

खुद से ज्यादा काम लेने की कोशिश आपकी प्रेरणा को भी मार देती है.

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यूसी बर्कले ग्रेटर गुड साइंस सेंटर की सीनियर फेलो क्रिस्टिन कार्टर के मुताबिक टाइम मैनेजमेंट टूल्स इंसान की इच्छाशक्ति पर निर्भर करते हैं.

लेकिन आदमी इच्छाशक्ति से ज्यादा भावनाओं से प्रेरित होता है.

कैसे बनाएं संतुलन

कारखानों में जहां कई मजदूर एक साथ काम करते हैं, वहां वे समय से बंधे हुए नहीं होते. असेंबली लाइन में भी समय कोई और तय करता है.

दफ्तरों में काम करने वाले लोगों को आज़ादी होती है कि वे अपने काम को अपने समय के हिसाब से व्यवस्थित कर सकते हैं.

ब्रैड एयॉन कहते हैं, "इस आज़ादी के साथ बड़ी जिम्मेदारी होती है. आपको खुद सोचना है कि आप अपने समय को कैसे मैनेज करें."

कई प्रोफेशनल एक साथ कई प्रोजेक्ट पर काम करते हैं. उन्हें परिवार और दोस्तों को भी समय देना होता है. ऐसे में कुछ काम छूट जाते हैं. एयॉन कहते हैं, "खुद पर ज्यादा दबाव डालेंगे तो गलती सिर्फ़ आपकी होगी."

अलग-अलग जरूरतें

हर व्यक्ति की अपनी प्राथमिकताएं होती हैं. इसी तरह हर टूल विशिष्ट परिस्थितियों और खास तरह के लोगों को ध्यान में रखकर बनाए जाते हैं. कोई एक टूल सबके लिए टाइम मैनेज नहीं कर सकता.

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कुछ लोग दूसरों के मुक़ाबले वक़्त के ज्यादा पाबंद होते हैं. उन्हें इस बात का एहसास होता है कि किसी एक काम पर कितना समय देना है.

दूसरी तरह के लोग बेहद ही आशावादी होते हैं जो यह सोचकर चलते हैं कि सब हो जाएगा.

कुछ लोग एक समय में सिर्फ़ एक काम करना पसंद करते हैं, जबकि कुछ लोग एक साथ कई काम भी कर सकते हैं.

समय के बारे में हमारे विचारों पर काम करने की जगह और वहां संस्कृति का भी असर रहता है.

टाइम मैनेजमेंट टूल एक खास तरह के लोग ही बनाते हैं- सॉफ्टवेयर इंजीनियर.

वेनेजुएला के उद्यमी हरनन ऐरासना ने 'एफर्टलेस' नामक ऐप बनाया है.

ऐरासना कहते हैं, "हम उन समस्याओं का समाधान चाहते हैं जो हमसे ही जुड़ी हैं. हमें अपनी डेस्क पर फैले झमेले से रोज निपटना पड़ता है."

टाइम मैनेज करने वाले टूल्स को लेकर सबसे ज्यादा उत्साहित भी तकनीकी क्षेत्र के लोग ही हैं. इस बारे में सबसे नई किताब 'पिक थ्री' रैंडी ज़करबर्ग और फ्रांसेस्को सिरिलो ने लिखी है.

रैंडी, मार्क ज़करबर्ग की बहन हैं. इन्होंने ही फेसबुक लाइव की शुरुआत की थी. सिरिलो सॉफ्टवेयर कंसल्टेंट हैं, जिन्होंने पोमोडोरा तकनीक की शुरुआत की थी.

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काम के अनुसार ऐप का चुनाव

ऐरासना ने 'एफर्टलेस' ऐप तब बनाया जब वे कई ऐप इस्तेमाल करके थक गए थे. एक समय उन्होंने सारे ऐप ही बंद कर दिए थे. वे कागज कलम के सहारे काम चलाने लगे. लेकिन इससे उन्हें यह पता नहीं चल पाता था कि किसी काम को खत्म करने में कितना समय बाकी है.

ऐरासेना का 'एफर्टलेस' ऐप बस यही दो काम करता है. इन दिनों लोकप्रिय ज्यादातर ऐप और टूल इसी तरह बने हैं.

अपने बनाए ऐप या टूल से काम करना ठीक है. लेकिन कॉरपोरेट दुनिया में ज्यादा फ़ीचर वाले टूल की जरूरत होती है.

'वर्केप' सॉफ्टवेयर बनाने वाले एडुआर्डो अल्वारेज़ कहते हैं कि ऐसा भी होता है कि कंपनियां कई फ़ीचर वाले महंगे सॉफ्टवेयर खरीदती है, लेकिन कर्मचारियों को उनका इस्तेमाल समझाना मुश्किल हो जाता है.

कंपनियों के लिए बनाए गए ऐसे टूल कर्मचारियों के स्टाइल से मेल नहीं खाते. लेकिन चूंकि टीम के सारे सदस्यों के बीच समन्वय बनाने के लिए ऐसे टूल इस्तेमाल होते हैं, इसलिए उनसे चिढ़ होने लगती है.

अल्वारेज़ कहते हैं, "इस तरह के टूल्स में लचीलापन जरूरी है. आपको अपनी टीम के हर सदस्य को अपना काम दिखाना होता है." लेकिन अल्वारेज़ भी मानते हैं कि यह बोझिल है. "कई बार मेरे इनबॉक्स में भी ढेर सारे पुराने काम आ जाते हैं."

अल्वारेज़ को लगता है कि इस समस्या का हल भी टेक्नोलॉजी में ही है. 'वर्केप' जल्द ही अल 'कोच' नाम का टूल लॉन्च करने वाला है. यह यूजर्स को अधूरे काम की याद दिलाता रहेगा.

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ऐरासेना की सलाह है कि बिना किसी ऐप के शुरुआत करें और यह समझने की कोशिश करें कि आपके लिए क्या महत्वपूर्ण है.

अपने जीवन पर नियंत्रण

मृत्यु अटल है. एक दिन यह आनी ही आनी है. टाइम मैनेजमेंट का यह अहम पहलू है, जिसे नज़रअंदाज कर दिया जाता है.

एयॉन कहते हैं, "पहले कब्रिस्तान शहरों में होते थे, लेकिन अब वो नज़रों से दूर होते हैं. इससे हम मृत्यु के बारे में सोच नहीं पाते."

"आधुनिक समाज में मृत्यु की याद दिलाने वाली चीजें कम हो रही हैं. हम यह भूल जाते हैं कि हमारे पास वक़्त कम है और जितना वक़्त है उसमें हमें खुश रहना है."

मृत्यु के बारे में गंभीरता से सोचने के बाद एयॉन ने दूसरों की उम्मीदों को पूरा करना छोड़ दिया और अपने बारे में खुद अपने नियम बनाए.

एयॉन पूरे 9 घंटे सोने के बाद सुबह 9 बजे उठते हैं और दिन में सिर्फ 4 घंटे काम करते हैं. वह दिन में सिर्फ़ एक बार ई-मेल चेक करते हैं, वह भी कामकाजी दिनों में. वह जिम जाते हैं और रोज पढ़ते हैं. यह पढ़ाई उन्हें शोध के लिए नये विचार देती है.

एयॉन कहते हैं, "आपके समय को बांधने की जगह ये टूल्स आपके जीवन पर आपका नियंत्रण बनाने वाले होने चाहिए."

क्या यह नौकरी मेरे लिए है? क्या मैं अपनी पत्नी से अलग हो जाऊं? क्या मुझे बच्चे की जरूरत है? एयॉन के मुताबिक ये सारे सवाल टाइम मैनेजमेंट से जुड़े हैं, लेकिन लोग इनके बारे में सोचते नहीं, क्योंकि यह सब सोचना उनको मुश्किल लगता है."

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अचूक कुछ भी नहीं

ज़िंदगी के बड़े सवालों को छोड़कर कुछ आसान उपायों की तरफ देखते हैं. पहली बात यह गांठ बांध लीजिए कि उत्पादकता की एक सीमा है. दूसरी बात यह कि आपके व्यक्तित्व और आदतों के मुताबिक कोई टूल ढूंढना मुश्किल है.

किसी भी तरह के टूल से दूर रहने वाले लोग मानते हैं कि व्यवस्थित रहने भर से उनकी मुश्किल आसान हो जाती है.

जो लोग रूटीन के पाबंद हैं, उनके लिए एयॉन की सलाह है कि "उन्हें कभी-कभी यह देखना चाहिए कि कैलेंडर के बिना जीवन कैसा होता है."

टाइम मैनेजमेंट टूल्स का विज्ञापन करने वाले वीडियो और ब्लॉग ज़िंदगी को आसान बनाकर देखते हैं. लेकिन जिसने भी इन ऐप्स का इस्तेमाल शुरू किया, उनका जीवन और कठिन हो गया.

कैले अब कागज-कलम से स्प्रैडशीट बनाती हैं. उनको ऐप्स से नफरत हो गई है. बोर्डेवे ने अपने लिए 5 सेकेंड का एक नियम बनाया है.

किसी भी मुश्किल काम को करने से पहले बोर्डेवे आंखें बंद करके गहरी सांस लेती हैं, एक से पांच तक गिनती हैं और काम में लग जाती हैं.

याद रखिए कि खुद के लिए ज्यादा कठोर नहीं बनना है. अपने आप को कोसना आपकी उत्पादकता के लिए नुकसानदेह है. यह आपके दिमाग पर बोझ बढ़ाता है. खुद पर भी थोड़ा तरस खाइए.

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(यह लेख बीबीसी कैपिटल की कहानी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं. मूल लेख आप यहां पढ़ सकते हैं. बीबीसी कैपिटल के दूसरे लेख आपयहां पढ़ सकते हैं. )

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