बॉस कहें तो क्या आप पॉलीग्राफ़ टेस्ट कराएंगे

  • 21 अक्तूबर 2018
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अमरीकी सुप्रीम कोर्ट के लिए नॉमिनेट किए गए ब्रेट कैवेनो के नाम पर मुहर लगाने के लिए पिछले हफ़्ते हुई सीनेट की बहस को दुनिया भर में देखा गया. इस बहस में कई बार पॉलीग्राफ़ शब्द का ज़िक्र आया.

राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की तरफ़ से सुप्रीम कोर्ट के जज के तौर पर नॉमिनेट किए गए कैवेनो जीवन भर इस पद पर रहेंगे. अमरीका की सर्वोच्च अदालत के जज की हैसियत से कैवेनो गर्भपात से लेकर समलैंगिकों की शादी तक कई विवादित मुद्दों पर अंतिम फ़ैसला दे सकते हैं.

यौन उत्पीड़न के आरोपों के बावजूद कैवेनो की नियुक्ति की पुष्टि हो चुकी है. सीनेट की न्यायिक समिति में सुनवाई के दौरान पॉलीग्राफ़ का जिक्र आया. पॉलीग्राफ़ झूठ पकड़ने वाला टेस्ट है. अगर कोई व्यक्ति सच्चाई छिपाए तो उसके झूठ को पकड़ने के लिए लाइ डिटेक्टर टेस्ट किया जाता है.

पोलीग्राफ़ टेस्ट में पूछे गए सवालों पर होने वाली शारीरिक प्रतिक्रियाएं देखी जाती हैं, जैसे ब्लड प्रेशर कैसे बढ़ रहा है, धड़कनें कितनी तेज़ हो रही हैं या पसीना कितना आ रहा है.

सीनेट की समिति में पॉलीग्राफ़ का जिक्र इसलिए आया क्योंकि डॉक्टर क्रिस्टीन ब्लासी फ़ोर्ड ने ब्रेट कैवेनो पर हाई स्कूल के दिनों में यौन उत्पीड़न के आरोप लगाने के बाद पॉलीग्राफ़ टेस्ट कराया था और उसकी रिपोर्ट भी सौंपी थी. डॉक्टर फ़ोर्ड के आरोपों से इनकार करने वाले कैवेनो को पॉलीग्राफ़ टेस्ट से नहीं गुजरना पड़ा.

अमरीका में पॉलीग्राफ़ टेस्ट का इस्तेमाल आपराधिक जांच या ख़ुफ़िया सूचनाएं इकट्ठा करने के लिए अक्सर किया जाता है. कैवेनो पर सुनवाई कर रहे सीनेट सदस्यों ने इसे हाई-प्रोफाइल जॉब इंटरव्यू बताया.

कई देशों में नौकरी के इंटरव्यू के दौरान या फिर किसी दूसरे संदर्भ में झूठ पकड़ने वाली मशीन के साथ टेस्ट को अवैध करार दिया गया है.

लेकिन कल्पना कीजिए कि ऐसी ऐसी दुनिया की जो डेटा ट्रैक करने वालों और कर्मचारियों की गतिविधियों पर नज़र रखने वाले मालिकों से भरी पड़ी हो, अगर आपका भावी बॉस पॉलीग्राफ़ टेस्ट कराना चाहे तो क्या आप इसके लिए तैयार होंगे?

अगर नौकरी पर रखने के लिए वह किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश कर रहे हैं, जिस पर रत्ती भर भी शक ना हो तो दिक्कत क्या है? अगर आपके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है तो इसकी फिक्र क्यों करें?

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क्या यह वैध है?

पॉलीग्राफ़ टेस्ट की वैधता इस पर निर्भर करती है कि आप रहते कहां हैं.

कई देशों में यह वैध नहीं है. अमरीका में 1988 से ही प्राइवेट कंपनियों पर इसके इस्तेमाल को लेकर रोक लगी हुई है. लेकिन सुरक्षा और जासूसी से जुड़ी सरकारी नौकरियों में पॉलीग्राफ़ टेस्ट किया जाता है.

दक्षिण अफ्रीका जैसे कई देशों में कर्मचारियों को पॉलीग्राफ़ टेस्ट से बचाने वाले क़ानून नहीं हैं. इसराइल में नौकरी के इंटरव्यू के दौरान पॉलीग्राफ़ टेस्ट करने की आज़ादी है.

केन्या में भ्रष्ट नेताओं पर रोक लगाने के लिए यह जांच की जाती है. पॉलीग्राफ़ टेस्ट की शुरुआत 1921 में हुई थी और अब भी इसका व्यापक इस्तेमाल होता है.

सिएटल में स्कूल ऑफ़ लॉ के प्रोफेसर जेफ्री फ़ेल्डमैन कहते हैं, "जिन मसलों की आगे जांच ज़रूरी हो उनको पहचानने में ये टेस्ट बहुत सहायक हो सकते हैं."

"अगर रिज़ल्ट निगेटिव हो तो ज़रूरी नहीं कि आप किसी कैंडिडेट को बाहर कर दें. लेकिन आप उसकी और जांच करना चाहेंगे."

नौकरी पर रखने से पहले पॉलीग्राफ़ टेस्ट कराना वैध है या अवैध, इससे भी बड़े कुछ सवाल हैं, जिनके बारे में विशेषज्ञों को लगता है कि वे समस्या खड़ी सकते हैं.

सिटी यूनिवर्सिटी लंदन के कास बिजनेस स्कूल के प्रोफेसर आंद्रे स्पाइसर कहते हैं, "अगर आपका लाइ डिटेक्टर टेस्ट कराया जा रहा है तो यह संकेत है कि आपका भावी नियोक्ता आप पर भरोसा नहीं करता. इससे आवेदकों काआत्म-सम्मान और अपने होने वाले बॉस में उनका विश्वास खत्म होता है."

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पॉलीग्राफ़ी के नतीजे कितने सटीक?

डाउज़ विलियम्स पूर्व पुलिस अधिकारी हैं और अमरीका के एक मान्यता-प्राप्त पॉलीग्राफ़ एडमिनिस्ट्रेटर हैं. उन्होंने 6000 से ज़्यादा पॉलीग्राफ़ टेस्ट किए हैं.

विलियम्स ने एक किताब लिखी है और वे इस बात का प्रशिक्षण भी देते हैं कि पॉलीग्राफ़ टेस्ट को कैसे मात दें.

2015 में वे एक स्टिंग ऑपरेशन में पकड़े गए थे और उन्हें 2 साल जेल की सज़ा हुई थी. विलियम्स ने कुछ अंडरकवर एजेंटों को लाइ डिटेक्टर टेस्ट की पकड़ में ना आने का तरीका सिखाया था.

विलियम्स कहते हैं कि वे लोगों को अपना बचाव करने में मदद करते हैं. "यह अरबों डॉलर का घोटाला है और इसने लाखों लोगों की ज़िंदगी तबाह की है. यह सिक्के की उछाल से ज़्यादा सटीक नहीं है."

विलियम्स के लिखे मैन्युअल के अलावा इंटरनेट पर ऐसी ढेरों सामग्री मौजूद है जो लोगों को पॉलीग्राफ़ टेस्ट की पकड़ में ना आने के रास्ते बताती है.

झूठ बोलने पर पल्स रेट बढ़ने और पसीना आने जैसी शारीरिक प्रतिक्रियाएं सामान्य हैं. प्रशिक्षण के जरिये इनको नियंत्रित किया जा सकता है.

विलियम्स कहते हैं कि झूठ पकड़ने वाली मशीन लोगों को डराने के औजार से ज़्यादा कुछ भी नहीं है. अगर दफ़्तरों में इसकी इजाजत दी गई तो समस्याएं खड़ी हो जाएगी.

"यह दिमाग़ पर चोट करने वाली लाठी है, जो किसी आदमी को डराकर उसे ग़लती मानने पर मज़बूर करती है. मैं किसी ऐसी कंपनी के लिए कभी काम नहीं करूंगा जिसे पॉलीग्राफ़ टेस्ट कि ज़रूरत हो, क्योंकि रिश्ते की शुरुआत में ही वे इसे खत्म कर रहे हैं."

क्या बॉस पॉलीग्राफ़ टेस्ट का इस्तेमाल मुश्किल सवालों के ईमानदार जवाब पाने से ज़्यादा किसी को आंकने की तरकीब के रूप में करते हैं? क्या इसके जरिये यह भी आंका जाता है कि कर्मचारी इस तरह के दबाव को झेल पाता है या नहीं?

सुज़ैन स्टेलिक न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में मैनेजमेंट कम्युनिकेशन की प्रोफेसर हैं. वे एक हेज़ फंड में सलाहकार भी हैं. सुज़ैन पॉलीग्राफ टेस्ट को युवा आवेदकों के लिए स्ट्रेस टेस्ट के रूप में देखती हैं.

"किसी कमरे में 4-5 सीनियर लोगों के सामने किसी छात्र से पूछा जाता है कि 5,63,000 के स्क्वायर रूट बताइए." इस सवाल के पीछे यह तर्क होता है कि अगर आप शेयर ट्रेडर बनने जा रहे हैं तो आपको नंबर पता होने चाहिए.

स्टेलिक कहती हैं कि इस तरह की जांच के नतीजे स्पष्ट नहीं होते, ना ही उनसे यह पता चलता है कि कोई आदमी नौकरी में चल पाएगा कि नहीं.

विलियम्स को लगता है कि किसी व्यक्ति की घबराहट और उसके दिल की धड़कनों को मापने के अलावा पॉलीग्राफ़ टेस्ट बस एक ही चीज़ बतलाता है कि क्या कोई व्यक्ति इतना पक्का झूठा है कि वह किसी सुई के हिले बिना टेस्टपास कर जाए.

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'ऑफ़िस में ज़हर मत फैलाइए'

सुज़ैन पॉलीग्राफ़ टेस्ट को 1980 के दशक में होने वाले ड्रग टेस्ट की तरह देखती हैं. अमरीका में कोकीन की अधिकता हो गई थी और तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने ड्रग टेस्ट शुरू कराया था.

सुज़ैन को लगता है कि कंपनियों को कुछ सवाल खुद से पूछने चाहिए- आप यह क्यों कर रहे हैं? आपको किसी एक कर्मचारी से समस्या है या सभी को इस टेस्ट से गुजरना ज़रूरी है? "नियोक्ता और कर्मचारियों के बीच के अविश्वास को यह और बढ़ाएगा."

वह यह भी पूछती हैं कि जो लोग टेस्ट में फेल हो जाएंगे उनका क्या होगा? उनकी मदद की जाएगी या उनको नौकरी से निकाल दिया जाएगा या फिर कुछ होगा ही नहीं?

लंदन बिजनेस स्कूल के प्रोफेसर डैन केबल कहते हैं कि ये टेस्ट मैनेजरों का उनके संभावित कर्मचारियों पर नियंत्रण और सख्त कर देंगे. वे किसी की ज़िंदगी से जुड़े ऐसे सवाल भी पूछेंगे, जिनका ऑफिस के काम से कोई मतलब नहीं होगा.

ऑस्ट्रेलियन पॉलीग्राफ़ सर्विस के डायरेक्टर स्टीव वान एपेरेन कहते हैं कि पॉलीग्राफ़ कुछ मामलों में कर्मचारियों की मदद भी करते हैं.

ऑस्ट्रेलिया के कई प्रांतों में पॉलीग्राफ़ टेस्ट वैध हैं, लेकिन कर्मचारियों की सहमति ज़रूरी है.

कई लोग यह मान सकते हैं कि लाइ डिटेक्टर टेस्ट आपराधिक या अनैतिक व्यवहार का पता लगाने के लिए कराया जाता है, लेकिन यह झूठे आरोपों से कर्मचारियों को बचाता भी है.

एपेरेन कहते हैं, "मेरे पास कर्मचारियों के ढेरों फ़ोन आते हैं. वे कहते हैं कि उनको झूठा फंसा दिया है और वे सच बताना चाहते हैं."

शोध से पता चलता है कि अपने बारे में सूचनाएं ना देने का उलटा असर होता है.

2015 में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने सात प्रयोग किए थे. ऑनलाइन सर्वे में काल्पनिक पार्टनर से सवाल पूछवाए गए.

जिन लोगों ने ड्रग्स लेने, परीक्षा में फेल होने और यौन संबंधों के बारे में जानकारियां छिपा लीं, उनके साथ सख्त व्यवहार हुआ और जिन्होंने अपने ख़राब व्यवहार के बारे में ग़लती मान ली, उनसे नरमी बरती गई.

यह इंसानी प्रकृति है कि जो लोग निजी जानकारियों को छिपाने की कोशिश करते हैं, उनको शक की नज़र से देखा जाता है. जो कुछ नहीं छिपाते उन पर शक नहीं होता.

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बॉस को कितना जानना चाहिए?

हम ऐसी दुनिया में रहते हैं, जहां बॉस आपकी हर गतिविधि और आपके हर डेटा पर नज़र रख सकते हैं.

कुछ लोगों को यह लग सकता है कि उनके पास छिपाने के लिए कुछ नहीं है. अपनी प्राइवेसी या लाइ डिटेक्टर टेस्ट कराने को लेकर भी वे बेपरवाह होते हैं. नौकरी पाने के लिए टेस्ट करा लेना उनको गवारा हो सकता है.

लेकिन यह सोचने की ज़रूरत है कि अगर नौकरी में पॉलीग्राफ़ टेस्ट का दायरा व्यापक हो जाए तो क्या होगा.

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में एथिक्स के प्रोफेसर निक बोस्ट्रॉम कहते हैं, "अगर ज़्यादातर कर्मचारी लाइ डिटेक्टर टेस्ट कराने को राजी हों तो स्वाभाविक है कि इससे इंकार करने वाले गिने-चुने लोगों को शक की नज़र से देखा जाएगा."

"इंकार करने से ग़लत संदेश जाएगा. लोग सोचेंगे कि आप कुछ छिपा रहे हैं."

पॉलीग्राफ़ टेस्ट कितने भरोसेमंद?

पॉलीग्राफ़ टेस्ट कितने कारगर हैं, इस बारे में पक्के आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं. कई अदालतों में इसके नतीजों को सबूत के तौर पर पेश करने की अनुमति नहीं है.

बोस्ट्रॉम कहते हैं, "पॉलीग्राफ़ टेस्ट भरोसेभंद नहीं हैं. लेकिन अगर आप किसी कर्मचारी के बारे में कुछ नहीं जानते तो यह कुछ संकेत अवश्य देते हैं."

"इससे मिली जानकारियों को दूसरे स्रोतों से मिली जानकारियों से मिलाना चाहिए और इस पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं करना चाहिए."

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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