लोग अपने ही सिद्धांतों पर अडिग क्यों नहीं रह पाते?

  • जोस लुइस पेनरेडोंडा
  • बीबीसी कैपिटल
करियर, नैतिकता के ऊंचे पैमाने, नौकरी

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क्या आप नैतिकता के आधार पर कोई नौकरी छोड़ देंगे? पिछली गर्मियों में गूगल के एक दर्ज़न कर्मचारियों ने ऐसा किया था.

कई रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्होंने मावेन प्रोजेक्ट की वजह से इस सम्मानित टेक्नोलॉजी कंपनी को छोड़ दिया.

इस प्रोजेक्ट में अमरीकी सेना के ड्रोन के लिए डेटा प्रॉसेस किया जाता था. कंपनी के शीर्ष अधिकारियों ने काम से जुड़ी नैतिकता से जिस तरह समझौते किए, उसे लेकर भी गहरे मतभेद थे.

हममें से कई लोग एक नैतिक दुविधा में रहते हैं. क्या आप इस आधार पर एक आकर्षक सैलरी वाली नौकरी छोड़ देंगे कि आप पर्यावरण, जानवरों पर प्रयोग या ग्राहकों के साथ व्यवहार को लेकर अपनी कंपनी के तौर-तरीकों से इत्तेफ़ाक नहीं रखते?

अगर आपका जवाब हां है तो आंकड़े इशारा करते हैं कि आपके 1981 से 1996 के बीच जन्म लेने वाला होने की संभावना है.

एक के बाद एक कई शोध में दावा किया गया है कि आबादी का यह वर्ग अपने काम से बदलाव लाने के प्रति पिछली पीढ़ियों के मुक़ाबले ज़्यादा प्रेरित है.

यह भी दावा है कि जो नौकरी छोड़ते हैं उनमें से कई लोग नैतिक या सांस्कृतिक रूप से बेहतर विकल्प तलाशते हैं, भले ही सैलरी कम मिले.

लेकिन क्या यह सच है? असल ज़िंदगी में इन विकल्पों को भला कौन अपनाना चाहेगा?

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नौकरी छोड़ने की कीमत

नई सदी में जवान होने वाले मिलेनियल्स को अक्सर नौकरी में छलांग लगाने वाली पीढ़ी कहा जाता है. वे किसी एक काम से चिपक कर नहीं रहना चाहते, ना ही वे तरक्की के उन रास्तों को चुनते हैं जिनके बारे में पहले से अनुमान लगाया जा सके.

कुछ परंपरागत उद्योगों को अपने सबसे युवा कामगारों को जोड़े रखने में मुश्किल हो रही है.

इंस्टीट्यूट ऑफ़ स्टूडेंट एम्प्लॉयर्स की 2017 की रिपोर्ट से पता चलता है कि ब्रिटेन के 46 फीसदी स्नातकों ने सिर्फ़ 5 साल के बाद अपनी पहली नौकरी छोड़ दी.

आम तौर पर यह मान लिया जाता है कि वे अपने सपने पूरे करने के लिए या दुनिया देखने के लिए नौकरी छोड़ रहे हैं. लेकिन कॉरपोरेट करियर छोड़कर दुनिया घूमना या कोई बिजनेस शुरू करना एक बड़ा और महंगा फ़ैसला है. गिने-चुने लोग ही यह फ़ैसला ले पाते हैं.

रिसर्च दिखाते हैं कि दो नौकरियों के बीच फ़ासला होने से औसत तनख़्वाह घटती है. यह गिरावट सालाना हज़ारों डॉलर की हो सकती है. इससे भावी रोजगार की गुणवत्ता और उससे मिलने वाली संतुष्टि भी घटती है.

कोलंबिया के पूर्व इन्वेस्टमेंट बैंकर और कंसल्टेंट क्रिश्चियन बायफ़ील्ड ने बैंकिंग और बीमा क्षेत्र में अच्छी तनख़्वाह वाली कई नौकरियां छोड़ीं, क्योंकि वे उनसे संतुष्ट नहीं थे.

बायफ़ील्ड ने दुनिया घूमना शुरू किया. बगोटा में एक टेड-एक्स टॉक में उन्होंने कहा, "एक साथ कई चीजें होने लगीं, क्योंकि मैं अपने दिल की सुन रहा था."

कुछ साल बाद आर्थिक असुरक्षा के कारण वे ट्रैवेल इन्फ्लूएन्सर बन गए, जिनको पढ़ने और देखने वालों की बड़ी तादाद थी.

मगर बायफ़ील्ड अपवाद हैं. नौकरी के बारे में फ़ैसले करते समय हममें से ज़्यादातर लोगों को अपने बटुवे के बारे में सोचना होता है.

बदलाव लाने या असर छोड़ने वाले काम के बारे में हम चाहे जितनी बातें बना लें, सबूत यही दिखाते हैं कि नौकरी चुनते समय हम पे-स्लिप देखकर फ़ैसले लेते हैं.

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बात सरहद पार

दो देश,दो शख़्सियतें और ढेर सारी बातें. आज़ादी और बँटवारे के 75 साल. सीमा पार संवाद.

बात सरहद पार

समाप्त

डेलॉयट के सबसे ताज़ा सर्वे के मुताबिक 63 फ़ीसदी मिलेनियल्स नौकरी के किसी प्रस्ताव पर विचार करते समय सबसे ज़्यादा सैलरी को तवज्जो देते हैं.

टेक्नोलॉजी कंपनियों के लिए नये टैलेंट की भर्ती करने वाले स्टार्ट-अप ट्रिपल बाइट के मुताबिक जिन युवाओं को दो नौकरियों के प्रस्ताव मिलते हैं, उनमें से 70 फ़ीसदी युवा ज़्यादा सैलरी वाली नौकरी को चुनते हैं. पिछली पीढ़ी भी ठीक ऐसा ही करती थी.

नौकरी बदलने से जेब पर उल्टा असर पड़े तो हममें से ज़्यादातर लोगों को यह गवारा नहीं होता.

'मिलेनियल्स एंड मैनेजमेंट' के लेखक ली काराहर कहते हैं, "यह सच नहीं है कि नई सदी में जवान हुए लोग स्थायित्व नहीं चाहते."

असल में हमारे माता-पिता अपने समय में जितना स्थायित्व चाहते थे, हम उससे ज़्यादा स्थायित्व चाहते हैं. अर्थव्यवस्था के संकट ने हमारे आर्थिक विकास और बड़े वित्तीय फ़ैसलों को लटका दिया है.

कुछ नये रिसर्च से सवाल उठे हैं कि क्या सचमुच मिलेनियल्स पिछली पीढ़ी के मुक़ाबले सुरक्षित नौकरियों को ज़्यादा तेज़ी से छोड़ रहे हैं.

अमरीका में प्यू रिसर्च के नये आंकड़े दिखाते हैं कि किसी नौकरी में हम उसी तरह बने रहना चाहते हैं, जैसे जेनरेशन एक्स (1960 से 1980 के बीच जन्म लेने वाले) के लोग बने रहना चाहते थे जब वे हमारी उम्र में थे.

दूसरे कई रिसर्च से भी संकेत मिलते हैं कि मिलेनियल्स के फटाफट नौकरी बदलने की बात सच नहीं है.

26 साल की मारिया रेईस, जो अपना असली नाम नहीं बताना चाहतीं, कोलंबिया में एक रिटेल चेन की कैटेगरी मैनेजर हैं.

उन्होंने जब ट्रेनी के रूप में काम शुरू किया, तब उन्हें लगता था कि कॉरपोरेट कल्चर उनकी उम्मीदों और मान्यताओं से टकरा रहा है.

वह कहती हैं, "कंपनी लोगों का जरा भी ख़याल नहीं करती." फिर भी मारिया ने नौकरी नहीं छोड़ी.

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विदेश में महंगे ट्रेनिंग कोर्स के बदले मारिया ने दो साल का एक्सक्लूसिव कांट्रैक्ट भी साइन किया. अगर वह नौकरी छोड़ती हैं तो उन्हें ट्रेनिंग का खर्च भरना होगा.

मारिया को नौकरी में तरक्की भी दी गई, जहां उनका अंतर्विरोध और गहरा हो गया. उनका काम माल सप्लाई करने वालों के संपर्क में रहने और दूसरे किसी पक्ष के बारे में सोचे-विचारे बगैर हर कीमत पर पैसे कमाने का है.

मारिया को एक-एक पैसे के पीछे पड़े रहना अच्छा नहीं लगता, खासकर उन छोटी कंपनियों के साथ, जो बहुत हद तक उनके फ़ैसले पर निर्भर रहती हैं.

वह कहती हैं, "मुझे लगता है कि बिजनेस में दोनों पक्षों की जीत होनी चाहिए, किसी एक की नहीं."

समस्या यह है कि वह सबसे युवा कर्मचारी से सीनियर हैं. यदि उन्हें इसी तरह की नौकरी के लिए कहीं और अप्लाई करना पड़े तो उन्हें नहीं लगता कि वे कामयाब हो पाएंगी.

मारिया को इंटरव्यू के लिए बुलाए जाने में भी संदेह है. उनको लगता है कि उनके फील्ड में ज्यादा नौकरियां नहीं हैं, इसलिए नौकरी बदलना बेवकूफी है.

यह पीढ़ी जैसे-जैसे उम्रदराज हो रही है, उनके बच्चे हो रहे हैं और वे कर्ज ले रहे हैं, वैसे-वैसे समस्या बढ़ रही है.

मार्शेला कार्डोना, जो अपना असली नाम बताने को राज़ी नहीं हैं, ने अपना करियर फार्मास्यूटिकल्स में शुरू किया था. वे सोचती थीं कि वे अपने काम से लोगों की मदद करेंगी.

लेकिन जल्द ही उनको कई नैतिक दुविधाओं और संदेहास्पद परिस्थितियों का सामना करना पड़ा. वह कहती हैं, "यह व्यापार है और इसका मकसद पैसे कमाना है, लोगों की मदद करना नहीं."

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मार्शेला ने बायो-एथिक्स में मास्टर कोर्स शुरू किया और यह समझने की कोशिश करने लगीं कि उनके काम से जुड़े मानवीय पहलू क्या हैं. बाथो-एथिक्स में ही वे नया करियर भी बनातीं, लेकिन वह प्रेग्नेंट हुईं तो चीज़ें बदल गईं.

मार्शेला की एक बेटी है जिसकी परवरिश का जिम्मा उनके कंधों पर है. अब वह नौकरी में ट्रैक बदलने की नहीं सोच सकतीं. उन्होंने कुछ नौकरियां भी बदलीं, लेकिन उन्होंने जहां भी काम किया वहां उनको एक जैसी समस्याएं झेलनी पड़ीं.

वह अपनी नौकरी से असंतुष्ट हैं. लेकिन वह कहती हैं कि "आपको व्यावहारिक होना पड़ता है."

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कुछ जगह हालात अच्छे हैं

सभी नौकरियां एक जैसी नहीं हैं. कुछ क्षेत्रों में ज्यादा अवसर हैं. कुछ कौशल की मांग अधिक है, यानी वहां नौकरियां चुनने का मौका है.

ट्रिपल बाइट के सह-संस्थापक एमॉन बैर्ट्राम सिलिकॉन वैली में इंजीनियरों का उदाहरण देते हैं. वहां उनकी ज्यादा मांग है और वे अपनी मर्जी के मुताबिक कंपनी चुन सकते हैं.

बैर्ट्राम कहते हैं कि गैर-तकनीकी क्षेत्रों, जैसे जनसंपर्क या कानूनी सेवाओं में प्रोग्रामर जितने विकल्प नहीं हैं.

पढ़ाई के लिए लंबी छुट्टी लेनी हो तो होनहार इंजीनियरों को कम कीमत चुकानी पड़ती है. "यदि वे तकनीकी रूप से काबिल हैं तो इंजीनियर करियर प्रोग्रेस के लिए थोड़ा चुकाते हैं, लेकिन उन्हें उसी जगह वापस रख लिया जाता है, जहां वे होते."

दूसरे क्षेत्रों जैसे समाज विज्ञान या संचार में, जहां सैलरी कम है और नौकरियां सीमित हैं, वहां फ़ैसला लेना ज्यादा मुश्किल है.

जहां लोगों के पास सुरक्षा के बेहतर साधन हैं, जैसे बचत, संपत्ति या पेशेवर योग्यता, वहां उनके लिए सैलरी के साथ समझौते करना आसान है.

बदलाव लाना

एक व्यावहारिक उपाय यह है कि शुरुआत से ही वैसे काम चुने जाएं जो व्यक्तिगत मूल्यों के अनुकूल हों.

एकैडमिक और इंडस्ट्रियल, दोनों तरह के रिसर्च बताते हैं कि मिलेनियल्स ऐसे लोगों के साथ काम करना चाहते हैं जो नैतिक हों, विविधता के प्रति समर्पित हों और जो इस दुनिया को बेहतर बनाने में अपनी भूमिका निभा रहे हों.

काराहर के मुताबिक पिछली पीढ़ियां कभी सवाल नहीं करती थीं और उन्हें जो कहा जाता था वह कर देती थीं. मगर, युवा कर्मचारी अपने नियोक्ता के मूल्यों और संगठन में उनकी भूमिका की समझ रखना चाहते हैं.

"वे अपने काम में अहमियत चाहते हैं. वे टीम पर क्या असर छोड़ते हैं यह जानना चाहते हैं."

मनोवैज्ञानिकों ने पाया है कि कर्मचारियों के मूल्य उनके नियोक्ता के मूल्यों से जितना मेल खाएंगे, नौकरी से उनकी संतुष्टि और कंपनी का मुनाफा उतना ही ज़्यादा होगा.

कुछ कंपनियां, खास तौर पर बड़ी कंपनियां, अपने मूल्यों के प्रचार पर बड़ी मेहनत करती हैं. बैर्ट्राम कहते हैं कि ब्रैंड मज़बूत हो तो कंपनी के लिए योग्य लोगों को आकर्षित करना आसान होता है.

छोटी कंपनियों को कुछ हटकर करना पड़ता है. सबके कारगर तरीका यह है कि वे लोगों को बताएं कि उन्होंने समाज पर कैसा सकारात्मक प्रभाव छोड़ा है.

अच्छी बात यह है कि कर्मचारियों का दबाव वास्तविक बदलाव ला सकता है. कई बड़ी कंपनियां परोपकार या कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व के जरिये इन मांगों को पूरा कर रही हैं.

काराहर कहते हैं कि सही और ग़लत में भेद करने का मौका देना युवा टैलेंट को आकर्षित करने में महत्वपूर्ण होता जा रहा है.

जो भी हो, गूगल मामले ने कुछ उम्मीदें जगाई हैं. कर्मचारियों के विरोध के बाद कंपनी ने मावेन प्रोजेक्ट को रिन्यू नहीं किया और पेंटागन के फ़ायदेमंद कांट्रैक्ट को ना बोल दिया.

गूगल ने बयान जारी करके कहा कि यह प्रोजेक्ट उसके 'एआई प्रिंसिपल्स' (AI Principles) से मेल नहीं खाते.

यह एक बलिदान था. लेकिन गूगल जैसी बड़ी कंपनी ने यह कर लिया. कंपनी के कुछ कर्मचारियों ने भी अपने मूल्यों को वरीयता दी. उनकी आजीविका पर कोई संकट नहीं था और दूसरी जगहों पर उनके रोज़गार की संभावना अच्छी थी.

लेकिन ऐसे ज़्यादातर लोग जिनको लगता है कि उनके काम उनके मूल्यों से टकरा रहे हैं, उनके लिए 'बदलाव लाना' या अपने 'जुनून को पूरा करना' रोजी-रोटी से जुड़े फ़ैसले हैं. वे आपके सामने एक स्पष्ट समझ और वास्तविक नंबर के साथ उपस्थित होते हैं.

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