वो तरीके जिनसे भारतीयों का मोटापा हो सकता है दूर

  • 24 नवंबर 2018
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रायन एलेन ने एक पैर अपने साथी के कंधे पर रखा और ग्लासगो के रॉयल एक्सचेंज स्क्वायर पर लगी कांसे की घोड़े की प्रतिमा पर चढ़ गए.

वो कांसे के ड्यूक ऑफ़ वेलिंग्टन की प्रतिमा के पीछे घोड़े की काठी पर खड़े गए. वहां से गुज़रते लोगों ने मोबाइल फ़ोन से उनकी तस्वीरें लीं.

एलेन ने बाद में कहा, "यह जोश में हो गया, वैसे तो यह अवैध है. वहां खड़े होने से राहत और उपलब्धि का अहसास हुआ."

पिछले 30 वर्षों से यहां के शरारती लोग इस स्मारक को ट्रैफिक कोन का ताज पहना रहे हैं. जुलाई 2017 में 'आयरन ड्यूक' की सीट के पीछे से एलेन ने भी ताज पहनाया.

ड्यूक के संघर्ष की भावना के अनुरूप वह भी अपने काम को जरूरी मानते हैं. लेकिन एलेन ने जमीन या आज़ादी के लिए यह नहीं किया.

एलेन ने शक्कर वाले सॉफ्ट ड्रिंक के लिए यह सब किया. उसने ड्यूक को पहनाए कोन को अपनी पसंदीदा स्कॉटिश पेय की तरह नारंगी और नीले रंग में रंगा था और उस पर लिखा था- "असली इर्न-ब्रू को वापस लाओ."

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सॉफ्ट ड्रिंक्स पर टैक्स

तीन महीने पहले ब्रिटिश सरकार ने "मोटापा टैक्स" लगा दिया था. मोटापे पर काबू पाने की कोशिश के तहत चीनी वाले सॉफ्ट ड्रिंक्स पर कई स्तर के टैक्स लगाए गए थे.

पब्लिक हेल्थ इंग्लैंड (PHE) को भरोसा था कि कोका-कोला, पेप्सी और रेडबुल जैसी कंपनियों को अपने उत्पाद सुधारने के लिए तैयार कर लिया जाएगा और चीनी की खपत कम करने के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया जा सकेगा.

अगर ये कंपनियां अपने ड्रिंक्स को 6 अप्रैल 2018 तक बदलने में नाकाम रहतीं तो उन पर टैक्स कानून लागू कर दिया जाता और खुदरा दुकानदारों को कीमत बढ़ाने पर मजबूर होना पड़ता. ज्यादातर कंपनियां अपने पॉपुलर ड्रिंक्स को बदलने के लिए राज़ी हो गईं.

सॉफ्ट ड्रिंक्स इंडस्ट्री पर लगाए गए इस टैक्स को कई लोग "चीनी कर" भी कहते हैं.

ब्रिटेन में कई लोगों के लिए यह एक समझ-बूझ भरा फ़ैसला है. लेकिन एलेन जैसे सॉफ्ट ड्रिंक प्रेमी इसे संस्कृति पर सीधा हमला मानते हैं. उनके लिए प्रतिष्ठित स्कॉटिश ड्रिंक में कम शक्कर का मतलब है बेजान स्वाद.

ब्रिटेन में शक्कर की लत को समझने के लिए ये आंकड़े देखिए. 10-11 साल के 20 फीसदी बच्चे मोटापे के शिकार हैं. वयस्कों में 26 फीसदी को मोटापा है.

सवाल है कि क्या संस्कृति में बदलाव के लिए टैक्स का इस्तेमाल किया जा सकता है? यदि हां, तो इसकी कामयाबी को मापने का सबसे अच्छा तरीका क्या है?

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ख़ौफ़नाक निदान

ब्रिटेन की सरकार ने अगस्त 2016 में "बचपन में मोटापाः कार्ययोजना" शुरू की. इसे पीएचई (PHE) ने तैयार किया था जिसमें मोटापे की महामारी और तंदुरुस्त भविष्य की रूपरेखा बताई गई थी.

पीएचई (PHE) ने पाया कि 2 से 15 साल के एक तिहाई बच्चे मोटापे से ग्रस्त हैं. लोग कम उम्र में ही इस बीमारी के शिकार हो रहे हैं और लंबे समय तक इससे ग्रस्त रहते हैं.

ब्रिटेन में पुलिस, फ़ायर सर्विस और न्यायिक व्यवस्था पर मिलाकर जितना खर्च होता है, उससे ज्यादा मोटापे और मधुमेह के इलाज पर खर्च होता है.

नेशनल हेल्थ सर्विस एक साल में वजन से संबंधित इलाज पर 5.1 अरब पाउंड (6.6 अरब डॉलर) खर्च करती है. 2018 में 6.1 अरब पाउंड या 8 अरब डॉलर खर्च का अनुमान है. यह सारा पैसा करदाताओं का है.

समाधान के रूप में शक्कर वाले पेय पर टैक्स लगाने को कहा गया.

इंग्लैंड के किशोर यूरोप में इस तरह के पेय के सबसे बड़े उपभोक्ता हैं. उनके लिए एक दिन में अधिकतम 330 मिलीलीटर सॉफ्ट ड्रिंक के सेवन को सुरक्षित बताया गया है, लेकिन वे इससे ज्यादा पीते हैं. इसलिए समस्या की जड़ में ही समाधान खोजना जरूरी था.

तत्कालीन चांसलर जॉर्ज ऑसबॉर्न ने 2016 के बजट में टैक्स लगाने का एलान किया. सरकार को इसे लागू करने में दो साल का इंतज़ार करना था. इस दौरान उत्पादक अपने फॉर्मूले को समायोजित कर सकते थे. जो कंपनियां शक्कर का उपयोग कम करने से इंकार करतीं, उन पर दो बैंड में टैक्स लगता.

100 मिलीलीटर पेय में 5 ग्राम से अधिक शक्कर होने पर प्रति लीटर 18 पेन्स (0.23 डॉलर) का टैक्स लगता. 100 मिलीलीटर पेय में 8 ग्राम से ज्यादा चीनी होने पर प्रति लीटर 24 पेन्स या 0.31 डॉलर का टैक्स लगाने का प्रावधान किया गया.

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'बच्चों का मोटापा कम करने में लगाएंगे पैसा'

इस टैक्स से सालाना करीब 50 करोड़ पाउंड (65 करोड़ डॉलर) जुटाने की संभावना जताई गई. पीएचई (PHE) ने कहा कि यह पैसा बच्चों में मोटापा घटाने के कार्यक्रम में लगाया जाएगा.

लोगों को लगता था कि सॉफ्ट ड्रिंक कंपनियां इसका विरोध करेंगी और टैक्स के रूप में धन उगाही का अनुमान धरा रह जाएगा. लेकिन हुआ इसके ठीक उलट.

कंपनियों ने इसे पहले ही भांप लिया था. सॉफ्ट ड्रिंक निर्माताओं ने नये दिशानिर्देशों के अनुरूप अपने उत्पादों को बदलना शुरू किया. चीनी की जगह कृत्रिम मिठास का उपयोग किया गया.

सुपर मार्केट टेस्को, एस्डा और सॉफ्ट ड्रिंक कंपनियों- फैंटा, रिबेना, ब्रिटविक और लकोज़ेड ने अपने ड्रिंक्स में शक्कर की मात्रा घटा दी. कुछ ने तो आधी से ज्यादा की कटौती की.

इर्न-ब्रू ने प्रति 100 मिलीलीटर पेय में शक्कर 10.3 ग्राम से घटाकर 4.7 ग्राम कर दिया. इससे एलेन जैसे वफादार ग्राहक भड़क गए.

एकाध अपवादों को छोड़ दें तो सॉफ्ट ड्रिंक कंपनियों ने अपने नये उत्पादों को अप्रैल 2018 की समय सीमा से पहले ही बाज़ार में उतार दिया.

कोका-कोला और पेप्सी ने टैक्स देना मंजूर किया और चीनी की मात्रा को पहले जितना बनाए रखा.

पेप्सी ने बीबीसी कैपिटल के सवाल पर टिप्पणी करने से मना कर दिया. कोका-कोला के प्रवक्ता ने कहा कि कंपनी ने यह फ़ैसला ग्राहकों को ध्यान में रखकर किया है.

"हमने अपने पेय में कोई बदलाव नहीं करने का फ़ैसला किया है क्योंकि लोग इसे पसंद करते हैं और उन्होंने इसमें बदलाव ना करने को कहा है. हम मानते हैं कि लोगों के पास विकल्प होना चाहिए."

2016 की रिपोर्ट के बाद 100 मिलीलीटर पेय में 5 ग्राम से कम चीनी की मात्रा वाले ड्रिंक्स 32 से बढ़कर 45 हो गए. 2018 में तय सीमा से ज्यादा शक्कर वाले ड्रिंक्स की संख्या 60 से घटकर 49 रह गई.

कंपनियों ने PHE के शुगर स्टैंडर्ड को अपनाना शुरू किया तो 2017 के मध्य तक अनुमानित टैक्स 50 करोड़ पाउंड से घटकर 38.5 करोड़ पाउंड रह गया. नवंबर 2017 तक यह सिर्फ 27.5 करोड़ पाउंड रह गया.

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क्या कामयाब है मोटापा टैक्स?

आज, औपचारिक रूप से टैक्स लगा दिए जाने के सात महीने बाद इससे सिर्फ़ 6.2 करोड़ पाउंड (8 करोड़ डॉलर) का टैक्स मिलता है.

फिर भी ट्रेजरी अधिकारी इस "मोटापा टैक्स" को क़ामयाब मानते हैं. सरकार के लिए कम राजस्व का मतलब है कि कंपनियां सेहत के पैमानों को मान रही हैं. इस मामले में, कम असल में ज्यादा है.

ग्लासगो यूनिवर्सिटी में कार्डियोलॉज़ी और मेडिकल साइंस के प्रोफेसर नावेद सत्तार उन दिनों को याद करते हैं जब वे चीनी के ख़ौफ़ से डरे बिना बड़े हो रहे थे.

1980 के दशक में ब्रिटेन में मोटापे का स्तर 4 से 7 फीसदी था. सत्तार तब अपने पिता की दुकान पर कुछ मदद किया करते थे. वे कई लोगों को दिन में चार-चार लीटर इर्न-ब्रू खरीदते हुए देखते थे.

"बहुत से लोग इर्न-ब्रू पीकर ही बड़े हो गए है. बचपन में मैंने बहुत इर्न-ब्रू पिया है, क्योंकि मुझे इससे बेहतर की जानकारी नहीं थी. तब यही था."

सत्तार का रियलिटी चेक मेडिकल स्कूल में हुआ. 300 लोगों पर हुए परीक्षण में पाया गया कि सत्तार को डायबिटीज़ होने का जोखिम सबसे ज्यादा है.

जब उनका वजन तीन स्टोन (42 पाउंड) बढ़ गया तो उन्हें लगा कि उन्हें शक्कर से छुटकारे की ज़रूरत है.

"मैं चाय में शक्कर के 2 टुकड़े ही लेता था, लेकिन मुझे कटौती करनी पड़ी." यह बदलाव मुश्किल था, लेकिन जल्दी हो गया.

सत्तार ने अपना स्वाद बदल लिया. "अब अगर मेरी चाय में शक्कर डाल देते हैं तो यह बेकार है."

सॉफ्ट ड्रिंक की लत छोड़ना हमेशा आसान नहीं होता. इर्न-ब्रू के आदी एक व्यक्ति को सत्तार के कार्डियो-वेस्कुलर क्लिनिक भेजा गया था. उसके खून में फ़ैट (वसा) की मात्रा ज्यादा थी और उसे हाल में दिल का दौरा भी पड़ा था.

वह नियमित रूप से 6 लीटर इर्न-ब्रू पीता था और रात में भी पीने के लिए उठ जाता था. सत्तार ने उसका इलाज किया तो उसका वजन 8 किलो घट गया और कई साल में पहली बार उसने संतुलित भोजन का आनंद लेना शुरू किया.

सत्तार कहते हैं, "यदि लोग खुद को मौका दें तो अपना स्वाद विकसित कर सकते हैं. वे किसी एक चीज को पसंद करते हैं, इसका यह मतलब नहीं कि थोड़ा समय देकर और कोशिश करके वे खुद को बदल नहीं सकते."

सत्तार चिकित्सा समुदाय और आम लोगों के उस बहुसंख्यक वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं जो अच्छी सेहत के लिए टैक्स को स्वीकार कर रहे हैं. लेकिन वे कहते हैं कि अभी जश्न मनाने का समय नहीं आया है.

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50 हज़ार लोगों की अपील

शक्कर वाले सॉफ्ट ड्रिंक में कटौती अच्छी शुरुआत है, लेकिन विशेषज्ञों को लगता है कि यह मोटापे की बड़ी समस्या का केवल 5 फीसदी हिस्सा है.

चीनी से भरी खाने-पीने की हजारों चीजें अब भी उपलब्ध हैं. इर्न-ब्रू के मुखर प्रशंसकों को लगता है कि टैक्स का फ़ैसला बहुत कड़ा है. बीबीसी कैपिटल के संपर्क करने पर इर्न-ब्रू बनाने वाले कंपनी ने टिप्पणी से इंकार किया.

एलेन ने इसकी निर्माता कंपनी एजी बार को एक याचिका भी डाली जिस पर 50 हजार लोगों ने दस्तखत किए.

एक व्यक्ति असली इर्न-ब्रू जैसे स्वाद का दावा करके एक पेय ले आया. दूसरे व्यक्ति ने शक्कर वाले ड्रिंक का स्टॉक जमा कर लिया और अब वह अवैध तरीके से उसे ऑनलाइन बेच रहा है.

एलेन का कहना है कि वह हफ्ते में चार कैन पीते हैं. इस पर साल में वह 124 पाउंड (161 डॉलर) खर्च करते हैं.

यदि इर्न-ब्रू के निर्माता अपने स्वाद को बदलने से मना कर दें और टैक्स का बोझ एलेन जैसे ग्राहकों पर डाल दें तो एलेन का सालाना खर्च बढ़कर 140 पाउंड (182 डॉलर) हो जाएगा.

वह कहते हैं, "मैं टैक्स देना पसंद करूंगा. यह ब्रांड की आत्महत्या और उन ग्राहकों के साथ धोखा है, जिन्होंने इसे वह बनाया है जो यह है."

एलेन के जुनून की बराबरी करना सबके वश की बात नहीं, फिर भी वह अकेले नहीं है.

मिंटेल के फूड, ड्रिंक और फूड सर्विस रिसर्च की हेड किटी सोनियन के मुताबिक 64 फीसदी लोग कहते हैं कि वे उतना ही सॉफ्ट ड्रिंक पीते हैं, जितना वे पिछले साल पीते थे. 10 फीसदी लोग पहले से ज्यादा पी रहे हैं.

सोनियन कहती हैं कि ज्यादा गर्मी पड़ने से भी खपत पर असर पड़ रहा है. यह एक संकेत है कि ब्रिटेन को अभी लंबा सफ़र तय करना है.

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ग्लोबल एक्शन

शक्कर वाले ड्रिंक्स के खिलाफ ब्रिटेन ने देर से कार्रवाई की है. 80 के दशक में प्रशांत महासागर के द्वीपों से शुरू होकर यह टैक्स सभी महादेशों में फैल चुका है.

मेक्सिको ने 2014 में 10 फ़ीसदी टैक्स लगाकर इसे बढ़ाया. एक साल में मेक्सिको के लोगों की शक्कर वाले ड्रिंक्स की खपत 10 फीसदी कम हो गई. गरीब परिवारों में सबसे ज्यादा कमी देखी गई.

उसी साल पांच अन्य क्षेत्रों में टैक्स लगाया गया. 2015 और 2016 में छह-छह क्षेत्रों में टैक्स लगाए गए. 2017 में 13 क्षेत्रों में ऐसा किया गया.

हंगरी ने टैक्स लगाया तो शक्कर वाले सॉफ्ट ड्रिंक की खपत 40 फीसदी घट गई. बर्कले, कैलिफोर्निया में मामूली टैक्स से 21 फीसदी खपत घट गई.

वर्ल्ड कैंसर रिसर्च फंड के मुताबिक 48 शहरों, देशों और भौगोलिक भूभागों में सॉफ्ट ड्रिंक्स पर टैक्स लगता है.

यह सब आसान से नहीं हो रहा. शिकागो में 2017 में प्रति औंस एक सेंट का टैक्स लगाने के 2 महीने बाद ही उसे वापस लेना पड़ा. यह कदम शहर के 1.8 अरब डॉलर की बजट खाई को भरने के लिए उठाया गया था.

वाशिंगटन पोस्ट के मुताबिक सेहत की चिंता और मोटापे की समस्या से निपटना इसका गौण उद्देश्य था. सॉफ्ट ड्रिंक कंपनियों और सार्वजनिक स्वास्थ्य समूहों के बीच मीडिया की लड़ाई में टैक्स समर्थकों को हार का मुंह देखना पड़ा.

ब्रिटेन में स्वास्थ्य अधिकारियों को सहयोग और स्कूल कार्यक्रमों के प्रति प्रतिबद्धता ने अब तक टैक्स को सफल बनाया है.

कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन में लंबे दौर में सफलता मापने के लिए अलग पैमाने का इस्तेमाल किया गया.

अनुमान है कि ब्रिटेन में टैक्स लगाने से सॉफ्ट ड्रिंक्स की कीमतें करीब 38 फीसदी बढीं और खपत में 26 फीसदी की कमी आई.

शोधकर्ताओं का कहना है कि खपत में इतनी कमी होने से दिल की बीमारियों से होने वाली करीब 370 मौतों को रोका जा सका. इससे 2021 तक 4490 जीवन वर्ष की बचत हुई. 2016 में भारी वजन से जुड़े 6,17,000 मरीजों की अस्पतालों में भर्ती को देखते हुए यह अनुमान वास्तविक लगता है.

सत्तार कहते हैं कि मोटापे से लड़ाई अभी शुरू ही हुई है. हालांकि डिपार्टमेंट ऑफ़ हेल्थ एंड सोशल केयर ने बच्चों के खाने में शक्कर की मात्रा 20 फीसदी घटाने के कार्यक्रम की अच्छे से शुरुआत की है, फिर भी पहले साल चीनी की खपत में 5 फीसदी के लक्ष्य को हासिल नहीं किया जा सका.

इसके लिए नया टैक्स लगाने की संभावना का सिर्फ़ अनुमान लगाया जा सकता है. सॉफ्ट ड्रिंक टैक्स की शुरुआती सफलता को देखते हुए सत्तार का मानना है कि यही सबसे अच्छा तरीका है.

"हमें इन कंपनियों से जरूरी बदलाव कराने के लिए कुछ बुद्धिमान लोगों की जरूरत है. कीमत पर टैक्स को अगर ठीक से लगाया जाए तो यह सही से काम करता है."

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