एक पुल जिसने दो मुल्कों की तकदीर बदल दी

  • 30 नवंबर 2018
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स्वीडन के लोग इसे Öresundsbron कहते हैं और डेनमार्क के लोग Øresundsbroen. दुनिया के कई लोग इसे सिर्फ़ 'द ब्रिज' के नाम से जानते हैं.

यह नाम कई पुरस्कार जीत चुके उस नॉर्डिक नोयर ड्रामा से लिया गया है जिसका मंचन 100 से ज्यादा देशों में हो चुका है.

यह पुल विशाल है. 82 हजार टन वजन का यह पुल 204 मीटर लंबे धातु के दो खंभों पर टिका है.

यह समुद्र सतह के ऊपर भी है और नीचे भी. सुरंग सहित इसकी लंबाई 16 किलोमीटर है और यह यूरोप के सबसे बड़े पुलों में से एक है.

यह पुल स्वीडन के तीसरे सबसे बड़े शहर माल्मो को डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन से जोड़ता है. इसने ओरेसंड की खाड़ी में लंबी नौका यात्रा या विमान सेवा की ज़रूरत को खत्म कर दिया है.

'द ब्रिज' नाटक के चौथे सीजन में काम कर चुके 31 साल के एक्टर पोंटस टी पैग्लर माल्मो के उत्तर में एक कस्बे में रहते हैं. वह उन दिनों को याद करते हैं जब इस पुल का निर्माण हो रहा था.

"हम माल्मो तक जाते थे, लेकिन आज की तरह डेनमार्क नहीं जा पाते थे. यह बहुत दूर था और बड़ी लंबी यात्रा होती थी."

1990 के दशक में स्वीडन में बुनियादी सुविधाओं में निवेश स्टॉकहोम और गुटेनबर्ग जैसे बड़े शहरों में सीमित था. पैग्लर जैसे लोग उपेक्षित महसूस करते थे.

सन् 2000 में ओरेसंड ब्रिज खुल जाने से यहां की आर्थिक स्थिति बदलने लगी. सीमा के पार आना-जाना आसान हो गया. सफ़र में कम समय लगने लगा.

नाव के लिए करीब घंटे भर कतार में लगने की मजबूरी खत्म हो गई. लोग कार से सिर्फ़ 10 मिनट में सफ़र पूरी करने लगे. सेंट्रल माल्मो और सेंट्रल कोपेनहेगन के बीच ट्रेन से यह सफ़र सिर्फ़ 34 मिनट का है.

यह पुल जल्द ही यूरोपीय सीमा-पार सहयोग का प्रतीक बन गया.

पैग्लर कहते हैं, "यह सचमुच बहुत तेज़ है. आप वहां जाकर उसी दिन लौट सकते हैं. मेरे खयाल से यह सबसे बड़ा बदलाव है. आप वहां वीकेंड पर या किसी और वजह से रूकना चाहें तो भी बहुत आसान है."

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कितने मुसाफ़िर

2017 में औसत रूप रोजाना 20,361 गाड़ियां इस ब्रिज पर चलीं और करीब 14 हजार लोगों ने रोजाना ट्रेन से सफ़र किया.

पहली छमाही में शुरू की गई अस्थायी पहचान जांच से सफ़र में समय ज्यादा लग रहा था. इसके बावजूद मुसाफ़िरों की यह तादाद रिकॉर्ड की गई.

पुल खुलने से पहले करीब 6000 लोग रोज नाव से यह सफ़र करते थे.

माल्मो में रहने वाली 43 साल की निकोले फ्रीबर्ग एक आईटी कंपनी में मैनेजिंग डायरेक्टर हैं. वह पिछले 12 साल से कोपेनहेगन में काम करने जाती हैं.

फ्रीबर्ग कहती हैं, "मुझे लगता है कि अगर यह पुल न होता तो मेरा करियर बहुत सुस्त होता."

"मैंने जिन कंपनियों में काम किया है वे इंटरनेशनल हैं. मैं खुद भी मल्टी-कल्चरल हूं- आधी पेरू की, आधी स्वीडन की. दिन में मैं माल्मो से ज्यादा बड़े और व्यस्त शहर में रहती हूं और रात में शांति और सुकून के लिए घर लौट आती हूं."

पुल पर चलने वाले ज्यादातर लोग स्वीडन के हैं, लेकिन यह डेनमार्क के लोगों को भी मौका देता है कि वह स्वीडन जाएं और वहां के लोगों से मिलें.

34 साल के नील मरे कोपेनहेगन में रहते हैं. वह सभी नॉर्डिक देशों के स्टार्ट-अप्स में निवेश करते हैं और ओरेसंड की खाड़ी के दोनों तरफ बिजनेस मीटिंग करते हैं.

मरे कहते हैं, "दुनिया में ऐसी कोई दूसरी जगह नहीं होगी जहां सिर्फ़ आधे घंटे की दूरी पर दो ताक़तवर इको सिस्टम मौजूद हों. मैं इस पुल की वजह से दो अलग देशों के स्टार्ट-अप्स को देख पाता हूं, जिसका मुझे लाभ होता है."

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इंतज़ार का फल

ओरेसंड पुल के बनने में लंबा इंतज़ार करना पड़ा और ढेरों चुनौतियां आई.

इंजीनियर 1936 से ही स्वीडन और डेनमार्क की सरकारों को पुल या सुरंग बनाने के प्रस्ताव दे रहे थे. दोनों सरकारों ने 1991 में माल्मो और कोपेनहेगन के बीच एक पुल बनाने के समझौते पर दस्तखत किए.

स्वीडन का लक्ष्य यूरोप के दूसरे हिस्सों से सहयोग बढ़ाना था (यह 1995 में यूरोपीय संघ में शामिल हुआ). डेनमार्क कोपेनहेगन के कैस्ट्रप एयरपोर्ट पर एयर ट्रैफिक बढ़ाना चाहता था.

दोनों देशों ने ओरेसंड क्षेत्र में व्यापार और शैक्षणिक संस्थानों को बढ़ाकर क्षेत्रीय पहचान को सहारा दिया.

माल्मो में पारंपरिक कपड़ा और जहाज निर्माण उद्योग के बिखर जाने के बाद उसे नये व्यापार की सख्त जरूरत थी.

1989 से 2003 के बीच शहर के स्ट्रैटेजिक डेवलमेंट डायरेक्टर रहे क्रिस्टर पेर्सन कहते हैं, "माल्मो को बहुत ही सुस्त शहर समझा जाता था. यहां के नेताओं में बहुत निराशा भरी थी."

पेर्सन अब ओरेसंड ब्रिज के असर पर किताब लिख रहे हैं. वह माल्मो यूनिवर्सिटी में गेस्ट लेक्चरार भी हैं.

"सरकार ने पड़ताल की और इस निष्कर्ष पर पहुंची कि पुल बनाने का समय आ गया है क्योंकि उसी से बदलाव आ सकता है."

उन्होंने एक परंपरागत औद्योगिक शहर को मॉडर्न सिटी में बदलने की सोची, जहां आईटी, डिजाइन और बायो-टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में छोटी और मंझोली कंपनियां हों.

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साहसिक कदम

बड़े लक्ष्य की कीमत भी बड़ी थी. पुल और उससे जुड़ी बुनियादी सुविधाएं जैसे सड़क और स्टेशन वगैरह को बनाने की लागत थी 30 अरब दानिश क्रोन (4.3 अरब डॉलर या 3 अरब पाउंड).

लोगों पर टैक्स का बोझ कम करने के लिए दोनों सरकारों ने सार्वजनिक सहयोग का रास्ता चुना. पुल का मुख्य हिस्सा बनाने के लिए कर्ज लिया गया, जिसे दोनों सरकारों ने वहन किया. इस कर्ज को टोल फीस लगाकर 30 साल में चुकता करना है.

डेनमार्क के इंजीनियर स्मेदेगार्ड एंडरसन पढ़ाई पूरी करने के बाद ऐसी कंपनी में काम करने लगे जो पुल निर्माण में लगी थी. वह कहते हैं, "ऐसे प्रोजेक्ट पर काम करना शानदार था."

एंडरसन की टीम पर जिम्मेदारियों का भारी बोझ था. उन्हें यह सुनिश्चित करना था कि पुल इतना ऊंचा ना हो जाए, जिससे नीची उड़ान भर रहे विमानों को ख़तरा हो. पुल अगर नीचा रह जाता तो पानी के जहाजों का रास्ता रोक देता.

"पहले किसी ने इस तरह का प्रोजेक्ट नहीं बनाया था, जहां पास में एक एयरपोर्ट भी हो और दो देशों के बीच एक व्यस्त जलमार्ग भी."

पुल निर्माण में रुकावटें भी आईं. निर्माण कार्य के दौरान दूसरे विश्वयुद्ध के 16 बम मिले जो फट नहीं पाए थे. दो बार भीषण सर्दियां पड़ीं, जिनमें माल ढुलाई मुश्किल हो गई.

पर्यावरणवादियों ने प्रोजेक्ट का विरोध किया और स्वीडन के पर्यावरण मंत्री ओलोफ जोहानसन ने अपनी आपत्तियों के चलते इस्तीफ़ा दे दिया.

एंडरसन कहते हैं, "पूरे बाल्टिक के पर्यावरण संतुलन पर बहस हुई. हर दिन नई चुनौतियां सामने आती थीं."

आलोचकों को विस्तृत जवाब देने के प्रयास किए गए. मुसाफ़िरों को कार की जगह ट्रेन के इस्तेमाल के लिए प्रेरित करने का अभियान चलाया गया.

ईल को ध्यान में रखकर मोटरवे की प्रकाश-व्यवस्था को समायोजित किया गया. पक्षियों को टक्कर से बचाने के लिए कोहरे में खंभों की लाइट को बंद रखने का फ़ैसला हुआ.

समय पर काम पूरा करने की स्कैंडिनेविया देशों की दक्षता को साबित करते हुए निर्माण कार्य 5 साल में खत्म कर लिया गया. तब शेड्यूल में कई महीने बचे थे.

पुल पर आम लोगों के लिए विशेष दौड़ और साइकिल चलाने जैसे कई आयोजन हुए. उद्घाटन समारोह में स्वीडन और डेनमार्क के शाही परिवारों ने हिस्सा लिया.

उस मौके पर एंडरसन से दानिश टीवी नेटवर्क टीवी2 के लिए कमेंट्री की थी. "जब पहली कार और मोटरसाइकिल वहां से गुजर रही थी, तब मैं बोल रहा था. वाकई वह शानदार अनुभव था."

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ज्यादा ट्रैफिक नहीं

पुराने दिनों को याद करके क्रिस्टर पेर्सन बताते हैं कि शुरुआत में चिंता यह थी कि पुल पर ज्यादा ट्रैफिक नहीं होगा, जिससे दोनों देशों को कर्ज चुकाने में दिक्कत होगी.

सन् 2000 के पतझड़ में रोजाना 7,000 से 10,000 गाड़ियां गुजरती थीं. गर्मी की छुट्टियों में यह संख्या 14 हजार तक पहुंची थी.

लोग पेर्सन से पूछते थे कि अगर आपने इतने बड़े प्रोजेक्ट में निवेश किया है जो 100 साल तक खड़ा रह सकता है तो आप क्या सचमुच 30 साल में सारा कर्ज चुका देंगे? अगर कर्ज चुकाने की अवधि ज्यादा होती तो कीमत (टोल फीस) को कम रखा जा सकता था.

उस साल पुल पर एक बार कार से गुजरने के लिए 255 स्वीडिश क्रोनोर (17 पाउंड) देना पड़ता था. यातायात बढ़ाने के लिए इसे अस्थायी रूप से आधा करके 140 क्रोनोर कर दिया गया. लोगों की रुचि बढ़ी तो टोल फीस फिर बढ़ा दी गई.

अभी एक सिंगल कार ट्रिप के लिए 515 क्रोनोर (45.78 पाउंड या 56.68 डॉलर) लगता है. नियमित मुसाफ़िरों को और एडवांस में ऑनलाइन टिकट खरीदने वालों को छूट मिलती है. ट्रेन टिकट 111 क्रोनोर (9.60 पाउंड या 12.28 डॉलर) से शुरू होता है.

पुल का स्वामित्व दानिश-स्वीडिश संगठन ओरेसंडब्रो कॉन्सोर्टिएट के पास है। उसका अनुमान है कि तय शेड्यूल से चार साल पहले ही 2033 तक सारा कर्ज चुकता कर दिया जाएगा.

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सीमा पर तनातनी

स्वीडन सरकार ने जनवरी 2016 से मई 2017 के बीच पुल से गुजरने वाले यात्रियों के लिए फोटो आई-कार्ड की जांच जरूरी कर दी थी. मुसाफ़िरों के लिए यह अब तक की सबसे बड़ी चुनौती थी.

स्वीडन सरकार शरणार्थियों की संख्या सीमित करना चाह रही थी. 2015 में 1,63,000 लोग शरण मांगने स्वीडन पहुंचे थे, जो 2016 में घटकर 29,000 रह गए.

सीमा पर इस नियंत्रण की वजह से यात्रा का समय 30 मिनट बढ़ गया. कई बार तो सर्विस रोकनी पड़ी.

दानिश ट्रेन ऑपरेटिंग कंपनी डीएसबी (DSB) के मुताबिक 2016 में रेल मुसाफ़िरों की संख्या 13 फीसदी गिरी.

स्वीडन की ट्रांसपोर्ट अथॉरिटी ने एक सर्वे जारी किया जिसके मुताबिक हर तीन में से दो स्वीडिश मुसाफ़िर तनाव से गुजर रहे थे और या तो नौकरी छोड़ देने या डेनमार्क में ही शिफ्ट हो जाने की सोच रहे थे.

निकोले फ्रीबर्ग उन दिनों को याद करके कहती हैं, "यह जानना असंभव था कि आप कब काम पर पहुंचेंगे या कब घर लौट पाएंगे."

फ्रीबर्ग कोपेनहेगन जाने के लिए ट्रेन पकड़ने की जगह अपने सहकर्मियों के साथ एक मिनीबस शेयर करने लगीं. मई 2017 में आई-डी जांच बंद होने के बाद भी वह इसी तरह आती-जाती हैं.

स्वीडन की रीज़नल रेल कंपनी स्केनट्रैफिकेन के टिकट बिक्री के ताज़ा आंकड़ों के आधार पर कहा है कि जिन मुसाफ़िरों ने वैकल्पिक तरीके खोजे थे, वे फिर से ट्रेन पकड़ने लगे हैं. अक्टूबर 2018 में रेल यात्रियों की तादाद वापस 2015 के स्तर पर पहुंच गई.

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स्वीडन की कामयाबी?

इकोनॉमिक जियोग्राफपर मैग्नस एंडरसन के मुताबिक मुसाफिरों की तादाद बताती है कि स्वीडन डेनमार्क के सर्विस सेक्टर के गैप को भरने में मदद कर रहा है.

पुल के आर्थिक प्रभाव को दिखाने वाले दो अन्य प्रमुख संकेत हैं. पहला, सन् 2000 से अब तक विभिन्न क्षेत्रों की 60 कंपनियों ने माल्मो में अपना नॉर्डिक हेडक्वार्टर या स्पेशलिस्ट ऑफिस खोला है. 1990 में स्वीडन की सरकार ने शहर को बदलने का जो लक्ष्य तय किया था, उसमें मदद मिली है.

दूसरा, इस पुल ने लोगों की निजी ज़िंदगियों का स्तर ऊंचा किया है. डेनमार्क के लोग दक्षिणी स्वीडन में सस्ते घर खरीद सकते हैं. मुद्रा में अंतर के कारण वे सस्ती खरीदारी कर सकते हैं और दक्षिणी स्वीडन के समुद्र तटों और जंगलों का मज़ा ले सकते हैं.

स्वीडन के लोग डेनमार्क की राजधानी के मशहूर खान-पान और डिजाइन इंडस्ट्री का लुत्फ उठा सकते हैं और डेनमार्क के विशाल इंटरनेशनल एयरपोर्ट कैस्ट्रप का भी इस्तेमाल कर सकते हैं.

एंडरसन कहते हैं, "कोपेनहेगन से सिर्फ माल्मो नहीं जुड़ा है, बल्कि इस पुल ने स्वीडन को शहरों को ग्लोबल नेटवर्क से जोड़ दिया है. जब मैं माल्मो के भविष्य के बारे में सोचता हूं तो इस लिंक को सबसे महत्वपूर्ण समझता हूं."

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नॉर्डिक नॉयर पर्यटन

ब्रिज और एयरपोर्ट, दोनों विदेशी सैलानियों को लुभाते हैं. पिछले साल कोपेनहेगन को यूरोप का सबसे तेज़ी से उभरते छुट्टी-केंद्र चुना गया था.

सन् 2000 में 36 लाख विदेशी सैलानी रात में कोपेनहेगन में रुके थे. 2017 में यह तादाद बढ़कर 70 लाख हो गई.

माल्मो में भी बड़ा बदलाव आया है, खासकर हाल के साल में. 2008 में यहां 4,80,000 विदेशी सैलानी रात में रुके थे. 2017 में यह संख्या 8,20,000 हो गई.

कोपेनहेगन टूरिस्ट बोर्ड 'वंडरफुल कोपेनहेगन' के प्रवक्ता जोनास लवशैल-वेडेल कहते हैं कि पर्यटन बढ़ने का टीवी सीरीज़ 'द ब्रिज' से क्या संबंध है, यह आंक पाना मुश्किल है.

वंडरफुल कोपेनहेगन ने 'एक ट्रिप, दो देश' का स्लोगन बनाया है, जिससे संकेत मिलता है कि इस पुल का कितना प्रभाव है.

"द ब्रिज" के एक्टर पोंटस टी पैग्लर से मिलने के लिए ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के फैन्स जिस क़दर उमड़ पड़ते हैं उससे वे चौंक जाते हैं.

"जब लोग आपकी संस्कृति या आपके पर्यावरण के बारे में अच्छी-अच्छी बातें करते हैं तो अजीब लगता है. लेकिन मैं सोचता हूं कि यह ठीक है. स्वीडन के दक्षिणी हिस्से को बढ़ावा मिला है जो पहले नहीं था."

ओरेसंड ब्रिज से दक्षिण कोरिया और चीन के बीच इसी तरह के इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट शुरू करने की प्रेरणा मिली.

2028 तक डेनमार्क के लोलैंड द्वीप को जर्मनी के फेहमर्न द्वीप से सुरंग से जोड़ने का डिजाइन तैयार किया गया है, जिसे जर्मनी की मंजूरी का इंतज़ार है.

किम स्मेदेगार्ड एंडरसन इस सुरंग के डिप्टी टेक्निकल डायरेक्टर हैं. उनके पास ओरेसंड लिंक के साथ-साथ डेनमार्क के जीलैंड द्वीप और फ़नने को जोड़ने वाले द ग्रेट बेल्ट ब्रिज पर काम करने का भी अनुभव है.

"हम जानते हैं कि मंजूरी लेने में समय लगता है. हमने द ग्रेट बेल्ट और ओरेसंड प्रोजेक्ट से सीखा है. हम समझते हैं कि सरकारें क्या चाहती हैं और हम अपनी परियोजनाओं के विकास में उसका इस्तेमाल करते हैं."

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पहचान की संकट

आर्थिक सफलताओं के बावजूद कई पर्यवेक्षकों को लगता है कि इस क्षेत्र को एक नई पहचान देने में ओरेसंड ब्रिज की सफलता सीमित है.

क्रिस्टर पेर्सन कहते हैं कि पुल चालू हो जाने के बाद कंपनियों और संस्थानों ने सीमा के आर-पार जैसी परियोजनाओं शुरू कीं, वह "बहुत जल्दी बहुत कुछ" होने जैसा रहा. कई प्रोजेक्ट कुछ साल में ही बंद हो गए.

माल्मो और कोपेनहेगन विश्वविद्यालयों ने छात्रों को यह सुविधा दी थी कि वह खाड़ी के दोनों तरफ पढ़ सकें, लेकिन यह नहीं चल पाया.

पेर्सन कहते हैं, "उम्मीदें बहुत बड़ी थीं, लेकिन उनको पूरा करना मुश्किल था."

दोनों देशों की शिक्षा व्यवस्था में अंतर है. वैश्वीकरण की रफ़्तार भी तेज़ है. "दुनिया के अन्य हिस्सों के संस्थानों की जगह सीमा के दूसरी तरफ के संस्थानों से तालमेल करने में लोगों की रुचि कम हो गई."

हाल में पूरे ओरेसंड क्षेत्र को ग्रेटर कोपेनहेगन के रूप में री-ब्रांड करने की एक विवादित कोशिश हुई. इसके समर्थकों का कहना था कि इससे अंतरराष्ट्रीय मेहमानों के सामने एक साझा पहचान पेश करने में सहूलियत होगी.

मैग्नस एंडरसन का कहना है कि लोगों को अपनी मौजूदा पहचान से आगे सोचने के लिए मनाना चुनौतीपूर्ण रहा.

"कोपेनहेगन के लोगों को डेनमार्क का होने और राजधानी में रहने का अभिमान है. स्वीडन के लोगों को भी अपनी क्षेत्रीय पहचान पर गर्व है. इन दो पहचानों को मिला देना आसान नहीं है."

इन सबके बावजूद यह पुल स्कैंडिनेविया के लोगों को करीब लेकर आया है.

"सीनियर हाई स्कूल में मेरे कुछ दोस्तों ने इस पुल के ख़िलाफ प्रदर्शन किए थे. आज हम उनका मज़ाक उड़ाते हैं. हम हंसते हैं क्योंकि हम इस पुल के बिना ज़िंदगी की कल्पना नहीं कर पाते."

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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