एयरलाइंस कंपनियों को नहीं भाते सस्ते टिकट

  • 16 मार्च 2019
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दिन में ठीक आपकी नाक के नीचे ही हवाई यात्रा करने में लोग ऐसी समझदारी दिखा रहे हैं जिससे आम के आम और गुठलियों के दाम वाली कहावत सच साबित हो रही है.

आपको शायद पता न हो लेकिन यात्रियों की थोड़ी-सी समझदारी से उनके लिए हवाई किराए में काफी बचत हो जाती है. विमानन कंपनियां यात्रियों की इस समझदारी को हर कीमत पर रोकना चाहती हैं.

इस तरकीब को स्किपलैगिंग के नाम से जाना जाता है. मान लीजिए कोई यात्री हवाई जहाज से बोस्टन से ह्यूस्टन जाना चाह रहा हो और उसे किराया बहुत अधिक लग रहा हो तो वह उसी रास्ते पर आगे पड़ने वाले लॉस एंजिल्स तक का टिकट लेगा तथा ह्यूस्टन में उतर जाएगा.

ऐसा इसलिए क्योंकि बोस्टन से ह्यूस्टन का हवाई किराया बोस्टन से लॉस एंजिल्स के हवाई किराए से कहीं सस्ता है.

इस तरह लॉस एंजिल्स का टिकट ख़रीदकर यात्री टिकट के एक हिस्से का इस्तेमाल नहीं करता.

इसका अर्थ यह हुआ कि हकीकत में उस टिकट पर यात्रा पूरी नहीं की जाती और इस तरह यात्री किराए का पैसा भी बचा लेते हैं.

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'स्किपलैगिंग' एयरलाइंस कंपनियों की ही देन

इस तरह की यात्रा पिछले महीने सुर्खियों में तब आई यात्री ने जर्मनी की विमानन कंपनी, लुफ्थांसा, में इस तरह के ख़रीदे गए टिकट पर यात्रा करते हुए कुछ पैसे बचाए.

विमानन कंपनियों को ये सहन नहीं होता कि यात्री उन्हें चूना लगाएं. अतीत में हुए मुकदमों में विमानन कंपनियों की हार के बावजूद, लुफ्थांसा ने उस यात्री पर 2000 डॉलर से अधिक का मुकदमा कर दिया है. हालांकि एक ओर विमानन कंपनियां यात्रियों द्वारा हिडेन-सिटी टिकटिंग के माध्यम से सस्ते किराए पर रोक लगाने की कोशिश कर रही हैं लेकिन विमानन उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों को इन कंपनियों से कोई हमदर्दी नहीं है.

यात्रा संबंधित सलाह देने के लिए खोली गई कंपनी ऐटमोस्फियर रिसर्च के संस्थापक हेनरी हार्टेवेल्ट का मानना है कि दरअसल स्किपलैगिंग या हिडेन-सिटी टिकटिंग विमानन कंपनियों की ही देन है.

हार्टेवेल्ट कहते हैं, "एक विमानन विशेषज्ञ और कारोबारी व्यक्ति के रूप में मुझे इस बात की पूरी समझ है कि विमानन कंपनियां यात्रियों से इतना किराया क्यों वसूलती हैं. दरअसल यही तो व्यापार है. लेकिन जब कोई विमानन कंपनी बहुत अधिक पैसा वसूलने की कोशिश करते हुए किसी एक स्थान के लिए आसमान छूते किराए की घोषणा करती है तो वह स्वयं ही हिडेन-सिटी बुकिंग को आमंत्रण देती है."

मामला दूरी का नहीं, गंतव्य का है

हार्टेवेल्ट कहते हैं कि किराया तय करने में इस्तेमाल किया जाने वाला तर्क यात्रियों की समझ से बाहर लग सकता है.

समझाने के लिए वे बताते हैं कि यदि कोई विमानन कंपनी किसी कम किराए वाले प्रतिद्वंद्वी के मुक़ाबले खड़ी हो रही है तो उसकी कोशिश यही होगी कि किराए लगभग बराबर हों, यदि ऐसा नहीं हो पाता तो वह अधिक किराया लेती है.

दरअसल सब कुछ बाज़ार पर निर्भर करता है और इसीलिए विमानन कंपनियां कुछ स्थानों के लिए कम किराया लेती हैं जबकि अन्य के लिए ऐसा नहीं करतीं.

कंपनियों से चर्चा में ये बात सामने आई कि वे किसी भी तरह से हवाई यात्रियों में अपनी हिस्सेदारी कम नहीं होने देना चाहतीं और इसके लिए कुछ ख़तरे उठाने को तैयार रहती हैं.

एमआईटी के इंटरनेशनल सेंटर फॉर एयर ट्रांसपोर्टेशन के प्रमुख शोध वैज्ञानिक पीटर बेलोबाबा बताते हैं कि पूरी दुनिया में इस तरह के किराए का प्रचलन है.

उनका कहना है, "बोस्टन से लास वेगास के हवाई मार्ग को किराए के लिहाज से बहुत संवेदनशील माना जाता है क्योंकि इस मार्ग पर यात्रा करने वाले यात्री मौजमस्ती के लिए जाते हैं जबकि बोस्टन से ह्यूस्टन का हवाई मार्ग उद्योग से संबंधित है जिसका अर्थ ये हुआ कि किराए बढ़ जाते हैं. प्रतिद्वंद्विता और किराए की संवेदनशीलता के मामले में दोनों अलग बाज़ार हैं."

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विमान से यात्री को घसीटकर उतारा

वो कहते हैं, "आर्थिक लिहाज से देखा जाए तो लास वेगास ह्यूस्टन से अधिक दूर होते हुए भी बोस्टन से लास वेगास का किराया कम रखना ही बुद्धिमानी है, खासतौर से तब जबकि आपका प्रतिद्वंद्वी बिना बीच में रुके आपको 199 डॉलर में वहां तक पहुंचा दे रहा है."

विमानन शोध कंपनी एयर इंटलिजेंस के सीईओ और क्वांटास विमानन कंपनी के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री टोनी वेबर बताते हैं कि जिस तरह का मुक़दमा लुफ्थांसा ने दायर किया है उसका एक उद्देश्य यात्रियों को डराना है.

वेबर समझाते हैं कि स्किपलैगिंग के कारण विमानन कंपनियां अपना राजस्व अधिक से अधिक नहीं बढ़ा पाती क्योंकि यदि यात्रियों को खाली सीटें सीधे बेची जाएं तो शायद उन्हें किराया अधिक मिल जाए. लेकिन हिडेन-सिटी टिकटिंग के कारण प्रत्येक सीट से होने वाली आय कम हो जाती है.

लेकिन हार्टेवेल्ट तर्क देते हैं कि ऐसे मामलों में विमानन कंपनियां सीटों से अधिक टिकटें बेच देती हैं क्योंकि उन्हें मालूम होता है कि कुछ यात्री आगे नहीं जाएंगे और इस तरह यात्रा में एक भी सीट खाली नहीं बचेगी.

नैतिक प्रश्न

बार-बार हवाई यात्रा करने वाले यात्री यानी फ्रीक्वेंट फ्लायर्स को विमानन कंपनियों की समस्याओं से बहुत कुछ लेना-देना नहीं रहता क्योंकि उन्हें तो किराए, ख़राब सेवा, देरी या फिर उड़ानें रद्द किए जाने की समस्याओं से जूझना पड़ता है.

आमतौर पर स्किपलैगर्स यानी लम्बी दूरी का टिकट लेकर बीच के किसी हवाई अड्डे पर उतरने वाले यात्री विमानन कंपनियों के सबसे अच्छे ग्राहक और सबसे समझदार यात्री होते हैं. इस तरह के यात्रियों की संख्या के बारे में जानकारी बड़ी आसानी से स्किपलैग्ड नामक उस वेबसाइट से मिल जाती है जिसे हवाई यात्रा करने वाले यात्रियों को हिडेन-सिटी टिकट के फायदे उठाने के लिए ही बनाया गया है.

वेबसाइट के संस्थापक अख्तरेर ज़मान ने बीबीसी द्वारा पूछे गए कई प्रश्नों का कोई उत्तर नहीं दिया. लेकिन ऐसा लगता है कि उनके समर्थक बहुत अधिक हैं. वर्ष 2015 में जब यूनाइटेड एयरलाइन्स ने उन पर मुकदमा किया और असफल हुई तो उनके समर्थन में 80 हज़ार डॉलर से अधिक रकम जमा कर ली गई थी.

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क्या कदम उठाए जा सकते हैं?

कहीं ऐसा तो नहीं कि यात्री एक ऐसी व्यवस्था को चूना लगा रहे हों जो उनके लिए हितकर नहीं है? विमानन कंपनी ने एक मूल्य पर टिकट बेचा और उसे उसका मूल्य प्राप्त हो गया.

द न्यूयॉर्क टाइम्स एथिसिस्ट कॉलम में स्किपलैगिंग को समस्या नहीं माना गया. इस मुद्दे पर सभी विश्लेषकों की राय ये थी कि टिकट ख़रीदने का अर्थ ये नहीं कि आप उसका प्रयोग भी करें.

नेट सिल्वर ने द टाइम्स में लिखा कि आंशिक रूप से यह समस्या विमानन कंपनियों के एकाधिकार के कारण भी है.

इस मुद्दे पर वेबर कहते हैं, "बेशक विमानन कंपनियों को टिकट का पैसा मिल गया लेकिन जिस हवाई मार्ग पर यात्री ने जानबूझकर यात्रा नहीं की, उसके लिए विमानन कंपनी को अलग से टिकट बेचने पर और अधिक आय हो सकती थी."

दरअसल किसी भी विमानन कंपनी और यात्री के बीच में टिकट ख़रीदते समय होने वाला करार जो कि आमतौर पर विमानन कंपनियों के पक्ष में होता है, अक्सर हिडेन-सिटी टिकटिंग की अनुमति नहीं देता.

उसमें यह भी प्रावधान होता है कि यदि उसका उल्लंघन यात्री करता है तो क्या-क्या कदम उठाए जा सकते हैं.

यह बात समझ आती है कि यात्री इस तरह के करार को पसन्द क्यों नहीं करते.

जब कुछ गड़बड़ हो जाती है तो विमानन कंपनियां इन्हीं करारों के आधार पर बहुत सारी सुविधाएं उपलब्ध नहीं करातीं.

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हिडेन-सिटी टिकटों को पकड़ना असंभव

जैसा कि हाल के मुकदमे में साबित होता है कि यह आदत यात्रियों के लिए भी जोखिम भरी हो सकती है. यदि आप ऐसा करते हैं तो आपको किसी हवाई अड्डे पर रोका भी जा सकता है.

हार्टेवेल्ट कहते हैं, "ऐसा करने के लिए वक्त और मेहनत चाहिए होती है. सामान्य यात्रा न रखने पर लोगों शक पैदा होता है और फिर आप पर नज़र रखी जा सकती है. ऐसा भी हो सकता है कि आपको कोई चिट्ठी थमा दी जाए या गेट पर रोक लिया जाए. विमानन कंपनी का उद्देश्य आपको डरा-धमकाकर खोई हुई आय वापस पाना है."

लेकिन वेबर का मानना है कि हिडेन-सिटी टिकटों को पकड़ पाना लगभग असंभव है. फिर भी नई प्रौद्योगिकी/टेक्नोलॉजी को अपनाने के बाद ऐसा बहुत लम्ब समय तक नहीं रहेगा.

विमानन कंपनियों के पास फ्रीक्वेंट फ्लायर्स रिकॉर्ड्स से बहुत सारी जानकारी उपलब्ध हो जाती है.

कई बार तो विमानन कंपनियां आने वाली उड़ान से ही यात्रियों को लेकर उनकी हवाई यात्रा के अगले चरण पर रवाना कर देती हैं.

जोखिम भरा कारोबार

हार्टेवेल्ट यह भी कहते हैं कि ऐसा करते हुए पकड़े जाने पर आपको ऐन वक्त पर टिकट ख़रीदना पड़ सकता है जो काफी महंगा हो सकता है.

इसके अलावा हिडेन-सिटी टिकट बेचने वाली यात्रा एजेन्सियों/ट्रेवल एजेन्सियों का लाइसेंस भी रद्द किया जा सकता है.

ऐसे यात्रियों का नाम विमानन कंपनियां दूसरी कंपनियों को भी दे सकती हैं जिससे यात्रा पर पूरी तरह प्रतिबंध लग सकता है.

लेंडिंगट्री नामक ऑनलाइन क्रेडिट कार्ड कंपनी तथा यात्राओं पर लिखने वाली बेनेट विल्सन कहती हैं कि ऐसा करना अपने जोखिम पर होता है, "यह बात समझ आती है कि विमानन कंपनियों द्वारा तय किए गए किराए से ऐसा लगता है कि वो आपका ख़ून चूसना चाह रही हों. लेकिन सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि आप रहते कहां हैं. यदि आप किसी मुख्य शहर में रहते हैं तो हवाई किराये बहुत अधिक होते हैं. इसे ही पूंजीवाद कहते हैं. इससे बचने की इच्छा तो होती है लेकिन आपको यह भी ध्यान रखना होगा कि आप पर मुक़दमा हो सकता है, और आप अपने फ्रीक्वेंट फ्लायर्स माइल्स भी गवां सकते हैं. इसके अतिरिक्त कंपनियां आपकी सदस्यता भी समाप्त कर सकती हैं."

उनके अनुसार, "बुरे से नहीं बुराई से घृणा करो."

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