आधुनिक तकनीक ने बढ़ाया नौकरियों पर ख़तरा

  • 15 मार्च 2019
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हैरत की बात है कि पिछले महीने मैं जिस एक वीडियो में थी उसे एक करोड़ 80 लाख बार देखा जा चुका है. यह वीडियो करों और अच्छी नौकरियों से संबंधित था.

इसका शीर्षक था- एक न्यायोचित दुनिया की तलाश में हम सभी इन मुद्दों पर संघर्ष कर रहे हैं.

जिन लोगों ने देखा उनमें से 60 प्रतिशत से अधिक 30 वर्ष से कम उम्र के थे. इससे ये उम्मीद बंधी है कि इतने सारे युवाओं में मेरी बात का कुछ असर हुआ है. किसी भी सभ्य समाज में पहचान अच्छी नौकरी से मिलती है लेकिन ये नौकरियां खुद ब खुद नहीं मिलतीं. आज और भविष्य के नेता उचित राजनीतिक, न्यायिक और आर्थिक माहौल बनाकर दुनियाभर में लाखों लोगों का जीवन सुधार सकते हैं.

आज 19 करोड़ 30 लाख लोगों के पास काम नहीं है और 1.4 अरब लोग असुरक्षित नौकरियों में हैं. दुनियाभर में 30 करोड़ मजदूर अत्यन्त गरीबी में रहते हैं. इनमें से 40 प्रतिशत विकासशील देशों में हैं. पिछले वर्ष अरबपतियों की कुल सम्पत्ति 2.5 अरब डॉलर (1.9 अरब पाउंड) प्रतिदिन की दर से बढ़ी जबकि दुनिया की आधी आबादी, 3.8 अरब लोग 50 करोड़ डॉलर प्रतिदिन की दर से और गरीब हुए.

दुनियाभर में 30 करोड़ मजदूर अत्यन्त गरीबी में रहते हैं , इनमें से 40 प्रतिशत विकासशील देशों के हैं.

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विकास का महान इंजन यानी पूंजीवाद असमानता का भी एक महान उपकरण बन गया है. हमारे समाज अब यह उम्मीद खोने लगे हैं कि सभी नागरिकों को इस समृद्धि का उचित हिस्सा मिलेगा. हम अपने लोकतांत्रिक संस्थानों में भरोसा खोने लगे हैं जिससे असुरक्षा, एकाकीपन और लोक-लुभावनपन को बढ़ावा मिल रहा है.

लैंगिक असमानता और शासन

सरकारें जो एक सबसे शक्तिशाली कदम उठा सकती हैं वह है, लैंगिक असमानता कम करना तथा महिलाओं में फैली गरीबी दूर करना (प्रतिदिन महिलाओं द्वारा लाखों घंटे का ऐसा करना जिसके लिए उन्हें कोई भुगतान नहीं मिलता) इससे महिलाओं के लिए शैक्षणिक, राजनीतिक और आर्थिक अवसर बढ़ेगे. यह कोई असंभव कार्य नहीं है. हाल ही में आइसलैंड दुनिया का पहला देश बना जिसमें पुरुष तथा महिलाओं में कानूनी रूप से बराबर वेतन को लागू कर दिया है.

पुरुष महिलाओं की तुलना में दोगुना सम्पत्ति तथा दुनिया की 86 प्रतिशत कंपनियों पर नियंत्रण रखते हैं. अनुपात के विपरीत महिलाओं को ऐसे कार्य में लगा दिया गया है, जिसके लिए भुगतान नहीं होता जैसे बच्चों की देखभाल, साफ-सफाई, खाना पकाना, पानी लाना, इत्यादि. यह काम लगभग 100 खरब अमरीकी डॉलर प्रतिवर्ष की कमाई जितना है लेकिन इसे सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में जोड़ा नहीं जाता.

जब स्कूली शिक्षा मुफ्त हो जाए तो उसका सबसे अधिक फायदा लड़कियों को मिलता है क्योंकि यदि शिक्षा पर खर्च हो रहा हो तो परिवार लड़कियों की शिक्षा पर सबसे अन्त में ध्यान देता है

स्वास्थ्य, शिक्षा तथा जल, और पेंशन, बच्चों के लिए मदद तथा बच्चों की देखभाल जैसे बेहतर सामाजिक सुरक्षाओं को प्रदान कर सरकारें इनमें बदलाव ला सकती हैं. जब स्कूली शिक्षा मुफ्त हो जाए तो उसका सबसे अधिक फायदा लड़कियों को मिलता है क्योंकि यदि शिक्षा पर खर्च हो रहा हो तो परिवार लड़कियों की शिक्षा पर सबसे अन्त में ध्यान देता है.

रियो डी जैनेरियो शहर ने बच्चों की मुफ्त सरकारी देखभाल उपलब्ध कराकर कम आय वाली मांओं के रोजगार दर में 27 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है. केवल स्वच्छ पेयजल उपलब्धता बढ़ाकर ही जिम्बाब्वे के कुछ हिस्सों में महिलाओं पर पड़ने वाले देखभाल के भार में औसतन चार घंटे प्रतिदिन की कमी कर ली गई है.

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बदलाव के लिए भुगतान

हमें इन सभी सुविधाओं के लिए भुगतान करना चाहिए और हम ऐसा कर सकते हैं. विकासशील देशों में कर चोरी से प्रतिवर्ष 170 अरब डॉलर का भार पड़ता है. अब भी कम से कम 76 खरब अमरीकी डॉलर की रकम कर अधिकारियों की नज़र में नहीं आई है. बड़ी कंपनियां और अत्यन्त अमीर लोग पहले के मुकाबले कम दरों पर कर का भुगतान कर रहे हैं. दुनिया के सबसे समृद्ध एक प्रतिशत लोगों पर यदि कर की दर केवल 0.5 प्रतिशत बढ़ा दी जाए, तो इससे इतनी आय होगी कि वर्तमान में स्कूल न जाने वाले प्रत्येक बच्चे को शिक्षित किया जा सकेगा और 30 लाख लोगों को जीवन रक्षक स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकेंगी.

इस तरह की कर पहलों से आर्थिक फायदे भी मिलते हैं. मध्यम आय वाले छह देशों में शोध से पता चलता है कि सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की दो प्रतिशत आय को यदि स्वास्थ्य और देखभाल सेवाओं में लगाया जाए तो इससे एक से तीन प्रतिशत की दर से रोजगार वृद्धि हो सकेगी.

व्यवसाय का नया मॉडल

आज के युग में ऐसे व्यवसायों की कहीं अधिक आवश्यकता है जो एक भिन्न प्रकार की समृद्धि दें.

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1970 के दशक से अधिकांश उद्योग इस बात पर जोर देते थे कि किसी भी कंपनी का मुख्य कर्तव्य अपने शेयर धारकों के लिए अधिक से अधिक लाभ कमाना है. उदाहरण के लिए वर्ष 2018 में ब्रिटेन की कंपनियों ने अपने शेयर धारकों को लगभग 100 अरब पाउंड (129 अरब अमरीकी डॉलर) का रिकॉर्ड भुगतान किया था जबकि एक औसत कर्मचारी की आय उतनी ही रही. जहां बहुत सारी कंपनियां अपने सामाजिक दायित्वों को लेकर सजग रहती हैं, उनका मुख्य उद्देश्य फिर भी लाभ कमाना ही रहता है.

लेकिन इसके कई सफल विकल्प हैं मसलन , सामाजिक उद्यम, कोऑपरेटिव तथा कर्मचारियों और किसानों द्वारा चलाए जाने वाले संगठन. स्पेन का मॉन ड्रैगन अपने दसियों हजार कर्मचारियों के स्वामित्व और उनके निर्णायक फैसलों की वजह से प्रतिवर्ष 10.5 अरब पाउंड का व्यवसाय करता है.

इस कंपनी में सर्वाधिक और न्यूनतम वेतन के बीच केवल आठ गुना का फर्क है. अमरीका और यूरोप में भी इस तरह के सामाजिक उद्यम जीडीपी के 10 प्रतिशत तक का योगदान करते हैं और परम्परागत निजी क्षेत्र की तुलना में दोगुना तेजी से रोजगार उपलब्ध कराते हैं.

लेकिन ऐसे व्यवसाय उन प्रतिद्वन्द्वियों के आगे हार जाते हैं जिनका मुख्य उद्देश्य लाभ कमाना है.

ऐसे में सरकारें उन उद्यमियों पर जुर्माना लगा सकती हैं जो अपने कर्मचारियों या सप्लायरों को उचित भुगतान नहीं करते. जैसे कि इक्वाडोर की सरकार ने केला उद्योग में काम करने वाले मजदूरों और उत्पादकों के लिए ठीक यही किया. सरकार ने सभी कंपनियों पर लाभांश का भुगतान करने से तब तक रोक लगा दी जब तक कि सभी मजदूरों को एक उचित आय न हो जाए. एक्जीक्यूटिव कर्मचारियों तथा मजदूरों के अनुपात में सुधार, तथा उन्हें बोर्ड में सदस्यता देने से कंपनियों तथा मजदूरों के बीच शक्ति संतुलन सुधरेगा.

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अच्छी नौकरियां कैसे मिलेंगी

अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन - आईएलओ द्वारा अनुशंसित सार्वभौमिक मजदूरी की गारंटी आज की मांग है. इसमें मजदूरों के अधिकारों और उनकी आय की सुरक्षा के साथ-साथ उनकी सामाजिक सुरक्षा और अन्य नियम लागू करने का प्रावधान है.

ऐसा करना उन देशों में अधिक महत्वपूर्ण होगा जहां टेक्नोलॉजीके प्रयोग से उथल-पुथल मची हुई है. अमरीका की 45 प्रतिशत और दक्षिण-पूर्व एशिया की 56 प्रतिशत नौकरियों पर टेक्नोलॉजी से होने वाले ऑटोमेशन का खतरा है.

आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, ऑटोमेशन और रोबोटिक्स से नई नौकरियां पैदा तो होंगी लेकिन ये पुरानी नौकरियों को खा जाएंगी. इससे निपटने के लिए लोगों को नई कुशलताएं सीखने और ताउम्र कुछ नया सिखाने में मदद करने की व्यवस्था होनी चाहिए. लेकिन केवल इतना ही पर्याप्त नहीं होगा.

आज के नेताओं को इस संबंध में नियम बनाना होगा कि नई टेक्नोलॉजी/प्रौद्योगिकी का स्वामित्व किसके पास है और इससे किसे फायदा है. तरह-तरह की वेबसाइट और ऐप्स के माध्यम से होने वाले काम एक ऐसी अर्थव्यवस्था को जन्म दे रहे हैं जो 19वीं सदी की परिस्थितियों की याद दिलाता है. नवाचार और उनके सृजनकर्ताओं की सफलता का जश्न तो ठीक है लेकिन हममें इस नई प्रौद्योगिकी के कारण होने वाले सामाजिक नुकसान को भी रोकने की क्षमता होनी चाहिए.

असमानता तथा अच्छी नौकरियों के हल मतदान करने वाले हम जैसे नागरिकों और उपभोक्ताओं की सामूहिक शक्ति में निहित है. हमारी सरकारों को ऐसे नियम बनाने चाहिए जो केवल कुछ का भला न करें बल्कि अधिकतर का भला करें. ऐसे नियम जिनसे सबके लिए और आसानी से उपलब्ध सरकारी शिक्षा दिलायी जा सके और जिसका भुगतान उचित रूप से अमीरों पर कर लगाकर किया जा सके. ऐसे नियम जिनसे मजदूरों को मिलने वाले वेतन बढ़ाए जा सकें तथा पर्यावरण को होने वाला नुकसान रोका जा सके.

यह न तो अपने आप होगा, न ही "जादूई बाजार से" हो सकेगा.

राजनेताओं की एक नई खेप एक भिन्न तथा मानवीय अर्थव्यवस्था के बारे में कल्पनाशील विचार रखती है. इसलिए भविष्य की बेहतर नींव रखने के लिए यह सही समय है.

मतदाताओं, उपभोक्ताओं, मजदूरों को इसके लिए संघर्ष करना होगा.

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