कितनी प्रैक्टिस से आप बन सकते हैं बेस्ट

  • 31 मार्च 2019
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किसी काम को करने में आप जितना समय लगाते हैं, जरूरी नहीं कि काम की गुणवत्ता वैसी ही हो.

एक ही रास्ते पर जॉगिंग करने और हर हफ्ते बराबर समय में दौड़ पूरी कर लेने से आप विश्व स्तर के एथलीट नहीं बन जाते, भले ही आप कितने ही लंबे समय तक इसे जारी रखें.

हममें से कुछ लोग महारत हासिल करने की कोशिश करते हैं, लेकिन अधिकतर लोगों के लिए ट्रेनिंग में और प्रतिबद्ध होने के बारे में सोचना भी कठिन है.

क्या हो अगर बेहतर बनने के लिए इतने ज़्यादा समय के निवेश की जरूरत ही न हो?

क्या शीर्ष पर पहुंचने के लिए ख़ास गुणों की जरूरत होती है जो दूसरों में न हों?

बीबीसी कैपिटल ने एक स्वर्ण पदक विजेता ओलंपिक कोच, एक रिकॉर्डधारी फुटबॉल मैनेजर और एक सुपर लर्नर से यही पूछा.

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गलतियां न दोहराएं

फ़्लोरिडा स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एंडर्स एरिक्सन के मुताबिक किसी काम में ध्यान लगाए बिना लंबे समय तक लगे रहने से अच्छा है कि 60 मिनट के लिए उसे सही तरीके से किया जाए.

उन क्षेत्रों की पहचान करना, जहां काम करने की आवश्यकता है और फिर उन्हें दुरुस्त करने के लिए योजना बनाना महत्वपूर्ण है. एरिक्सन इस प्रक्रिया को "सुविचारित अभ्यास" कहते हैं.

एरिक्सन ने तीन दशकों तक अपने समय का बड़ा हिस्सा यह विश्लेषण करने में बिताया है कि संगीतकार से लेकर सर्जन तक अपने क्षेत्र के शीर्ष पर पहुंचे लोग कैसे सफल हुए.

उनका कहना है कि सही मानसिकता का विकास करना कच्ची प्रतिभा से ज़्यादा अहम है.

"हमेशा यह कहा जाता है कि अच्छा होने के लिए आपको खूबियों के साथ पैदा होना चाहिए क्योंकि उच्च-स्तरीय प्रदर्शन करने वालों को तैयार करना मुश्किल था, जो कि गलत है."

सुविचारित अभ्यास करने वाले लोग अक्सर स्कूल में पढ़ाई के तरीके की आलोचना करते हैं.

उदाहरण के लिए, संगीत के शिक्षक अपने शिष्यों को नोट्स, कुंजी और संगीत के बुनियादी तत्व सिखाने से शुरुआत करते हैं.

अगर आपको अपने छात्रों को ग्रेड देने हों तो सरल और वस्तुनिष्ठ पैमानों पर उनकी तुलना करनी होगी.

इस तरह से पढ़ाने पर ग्रेड देना आसान हो जाता है. लेकिन इससे उन प्रशिक्षुओं की रुचि ख़त्म हो सकती है जो संगीत के अंतिम लक्ष्य तक पहुंचने की कल्पना नहीं कर सकते, क्योंकि वे ऐसे कार्य कर रहे हैं जो उनके लिए बेमतलब हैं.

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Image caption शतरंज में ग्रैंडमास्टर मैग्नस कार्लसन

सीखने में महारत

26 साल के मैक्स ड्यूश तेज़ी से सीखने में माहिर हैं. वह कहते हैं, "मुझे लगता है कि सीखने का सही तरीका उल्टा है."

सैन फ्रांसिस्को में रहने वाले ड्यूश ने 2016 में बेहद ही ऊंचे पैमाने के साथ 12 नये कौशल सीखने का लक्ष्य बनाया था, एक महीने में एक.

उनका पहला लक्ष्य था सिर्फ़ 2 मिनट में ताश के पत्तों की पूरी गड्डी के क्रम को याद करना और आखिरी लक्ष्य था शतरंज का खेल सीखना और एक गेम में ग्रैंडमास्टर मैग्नस कार्लसन को हराना.

ड्यूश कहते हैं, "अपने लक्ष्य से शुरुआत करें. यह जानें कि लक्ष्य पाने के लिए क्या सीखना है या क्या करना है? फिर योजना बनाएं और उस पर टिके रहें."

"पहले दिन जब मैंने एलान किया कि मैं यह करने जा रहा हूं तो मैंने हर दिन के लिए काम निश्चित कर लिया."

"मतलब यह कि मैंने दोबारा नहीं सोचा कि मुझमें ऐसा करने की ऊर्जा है या नहीं या क्या मैं इसे बंद कर दूं. मैंने इसे पहले ही तय कर लिया था इसलिए यह दिन का अनिवार्य हिस्सा बन गया."

ड्यूश ने पूर्णकालिक नौकरी करते हुए यह चुनौती ली थी. हर दिन उनका एक घंटा आने-जाने में लगता था और वह 8 घंटे की नींद भी लेते थे.

उनके लिए एक महीने तक हर दिन 45 से 60 मिनट की प्रैक्टिस चुनौती पूरी करने के लिए पर्याप्त थी. वह कहते हैं, "80 फीसदी मेहनत योजना की संरचना ने की."

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Image caption ह्यू मैकचिन अमरीकी पुरुष वॉलीबॉल टीम के हेड कोच थे, जिसने 2008 के बीजिंग ओलंपिक खेलों में 20 साल बाद स्वर्ण पदक जीता था.

10 हज़ार घंटे का अभ्यास

मैल्कम ग्लैडवेल ने 10 हज़ार घंटे का एक नियम बनाया था. एरिक्सन के शुरुआती रिसर्च पेपर के मुताबिक अपने क्षेत्र में श्रेष्ठता पाने के लिए टॉप परफॉर्मर 10 हज़ार घंटे या करीब 10 साल का अभ्यास करते हैं.

लेकिन यह सोचना भ्रामक होगा कि कोई व्यक्ति अगर 10 हज़ार घंटे तक किसी चीज़ का अभ्यास करे तो वह विश्व स्तर का बन जाएगा.

एरिक्सन कहते हैं, "आपको उद्देश्य के साथ अभ्यास करने की जरूरत होती है. कुछ विशेष तरह के मनोविज्ञान वाले लोग ही यह कर पाते हैं."

"अभ्यास में कितना समय लगाया इससे मतलब नहीं है. इसे छात्र की प्रतिबद्धता के साथ मेल खाना चाहिए."

एरिक्सन इस बात से हैरान होते हैं कि आखिर लोगों को ऐसा क्यों लगता है कि ज़्यादा अभ्यास करने से या बार-बार एक जैसी गलतियां दोहराने से वे बेहतर हो जाएंगे.

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महारत पर ध्यान

खेल जगत ने एरिक्सन के सुझाए कई तरीकों को अपनाया है. रोजर गुस्ताफ़्सन कहते हैं, "काम खिलाड़ियों को करना होता है. शीर्ष स्तर के खिलाड़ी बनने के लिए उनको बहुत दृढ़ होना पड़ता है."

गुस्ताफ़्सन पूर्व फुटबॉलर से कोच बने हैं. 1990 के दशक में उन्होंने आईएफके गोटबॉर्ग को 5 बार लीग चैंपियन बनवाया था.

स्वीडन के लीग फुटबॉल इतिहास में दूसरे किसी मैनेजर के पास यह उपलब्धि नहीं है. गुस्ताफ़्सन 60 साल के हो चुके हैं, फिर भी क्लब के युवा खिलाड़ियों की ट्रेनिंग से जुड़े रहते हैं.

वह कहते हैं, "हमने सुविचारित अभ्यास के जरिये 12 साल के बच्चों को बार्सिलोना पासिंग ट्राएंगल समझाने की कोशिश की और 5 हफ्तों में ही उन्होंने महारत हासिल कर ली. वे उतने ही ट्राएंगल बनाने लगे जितना बार्सिलोना टीम प्रतियोगी मुक़ाबलों में बनाती थी."

"यह तो नहीं कहा जा सकता कि वे बार्सिलोना टीम की तरह ही दक्ष हो गए, लेकिन यह देखना अविश्वसनीय था कि उन्होंने इसे फटाफट सीख लिया था."

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वीडियो फ़ीडबैक

वीडियो तुरंत फ़ीडबैक देने का सबसे कारगर साधन है. गुस्ताफ़्सन कहते हैं, "अगर आप खिलाड़ी को सिर्फ़ कुछ बताते हैं तो हो सकता है कि उसे आपकी पूरी बात समझ न आए. उसे ख़ुद देखना होगा और अलग तरीके से करने वाले खिलाड़ी से तुलना करनी होगी."

युवा खिलाड़ी वीडियो फ़ीडबैक के साथ बहुत सहज होते हैं. वे अपने और साथियों के वीडियो बनाते रहते हैं.

गुस्ताफ़्सन का कहना है कि कोच के रूप में सबको अलग-अलग फ़ीडबैक देना मुश्किल होता है, क्योंकि टीम में 20 खिलाड़ी होते हैं.

सुविचारित अभ्यास उनको ख़ुद से अपना फ़ीडबैक देने के लिए सशक्त बनाता है.

कोच जितनी जल्दी अपना फ़ीडबैक दे सकते हैं, उतना ही अच्छा. प्रशिक्षण में गलतियां सुधारने से गलत चीजें करने में समय कम बर्बाद होता है.

यूनिवर्सिटी ऑफ़ मिनेसोटा में वॉलीबॉल के हेड कोच ह्यू मैकचिन कहते हैं, "सबसे अहम है एथलीट का इरादा.

एथलीट को यह महसूस करना होगा कि गलतियां करने के लिए वे सुरक्षित हैं और संभव है कि बेहतर होने के लिए वे बदतर हो जाएं."

"इससे लापरवाह प्रशिक्षु बाहर हो सकते हैं, लेकिन तकनीकी महारत कठिन है. हर खेल में ऐसा ही है. तकनीकी महारत ही सर्वश्रेष्ठ बनाती है और इसके लिए बड़ी प्रतिबद्धता की जरूरत होती है."

मैकचिन अमरीकी पुरुष वॉलीबॉल टीम के हेड कोच थे, जिसने 2008 के बीजिंग ओलंपिक खेलों में 20 साल बाद स्वर्ण पदक जीता था.

फिर वह महिला टीम के कोच बने और 2012 के लंदन ओलंपिक खेलों में उसे रजत पदक दिलाया.

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सीखने का संघर्ष

वह कहते हैं, "हमारे ऊपर सिखाने की जिम्मेदारी है और उन पर सीखने की जिम्मेदारी है. यह इनपुट-आउटपुट जैसा नहीं है. आपको संघर्ष करना पड़ता है."

"जो लोग इस संघर्ष के आगे जाते हैं उन्होंने अपनी गलतियों से पार पाया है. रातोंरात कायापलट नहीं होती और आप विशेषज्ञ नहीं बन जाते."

"प्रतिभाशाली लोग बहुत हैं. प्रतिभा दुर्लभ नहीं है. जो दुर्लभ है वह है प्रतिभा और महारत हासिल करने पर फ़ोकस और प्रेरणा."

संरचना क्यों मायने रखती है?

ड्यूश ने जो चुनौतियां ली थीं, उनमें से कुछ को सीखने के पूर्व-निर्धारित तरीके थे. जैसे ताश के पत्तों को याद करने का 90 फीसदी तरीका पहले से निर्धारित है.

ड्यूश सुविचारित अभ्यास से अपने लिए नई रणनीति विकसित करना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने न्यूयॉर्क टाइम्स की शनिवार की क्रॉसवर्ड पहेली को चुना.

शब्दों की ये पहेलियां इतनी जटिल समझी जाती हैं कि व्यवस्थित तरीके से उनको सुलझाना मुश्किल होता है.

ड्यूश ने सोचा कि वह पिछली चुनौती से सीखी अपनी तरकीबें लगा सकते हैं.

वह कहते हैं, "अगर मैं 6,000 सबसे सामान्य संकेतों को जानता हूं तो मैं पहेली सुलझाने के करीब हो जाऊंगा. आसान पहेली हो तो आप उसे हल करने के करीब पहुंच जाते हैं."

शनिवार की पहेली में आप बहुत आगे तक नहीं जा पाते, फिर भी आपको मदद मिलती है. ड्यूश ने यही किया.

डेटा पाने के लिए उन्होंने एक वेबसाइट को स्क्रैप किया और एक भाषा सीखने की पिछली चुनौती के आधार पर उनको याद करने के लिए एक प्रोग्राम का इस्तेमाल किया.

एक हफ्ते में ही ड्यूश ने 6,000 उत्तर जान लिए. विभिन्न पहेलियों के हल के साथ अभ्यास करके वह सभी सामान्य संकेतों को समझ गए. इसके बाद ड्यूश ने पहेलियों की संरचना पर ध्यान दिया.

कुछ अक्षर संरचनाएं दूसरों का अनुसरण करती है. इस तरह यदि ग्रिड का कोई अंश पूरा हो जाता है तो वह बाकी बची जगहों पर भरे जाने वाले संभावित शब्दों को छांट सकते हैं.

शब्द भंडार बढ़ाना क्रॉसवर्ड में महारत पाने का आखिरी चरण था.

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लगन हो तो मुश्किल आसान

ड्यूश का कहना है कि आम तौर पर हम समय के छोटे हिस्से में क्या हासिल कर सकते हैं, इस पर ध्यान नहीं देते और किसी काम में लगने वाले समय के बारे में गलत आंकलन कर लेते हैं.

ड्यूश ने अपने 12 में से 11 टास्क पूरे किए. शतरंज में ग्रैंडमास्टर कार्लसन को हराने का उनका लक्ष्य पूरा नहीं हुआ.

वह कहते हैं, "एक संरचना बनाकर आप मानसिक शोर को दूर कर सकते हैं."

सुविचारित अभ्यास के लिए महीने भर तक दिन का एक घंटा निकालना बहुत ज़्यादा समय नहीं है.

याद कीजिए कि किसी एक काम में आपने मन से 30 घंटे कब लगाए थे.

(यह लेख बीबीसी कैपिटल की कहानी का अक्षरश: अनुवाद नहीं है. हिंदी पाठकों के लिए इसमें कुछ संदर्भ और प्रसंग जोड़े गए हैं. मूल लेख आप यहांपढ़ सकते हैं. बीबीसी कैपिटल के दूसरे लेख आप यहां पढ़ सकते हैं.)

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