तकनीक जिससे कचरे के पहाड़ का डर दूर होगा

  • 8 अप्रैल 2019
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दुनिया भर में करीब डेढ़ करोड़ लोग हर दिन कचरे के ऊंचे-ऊंचे ढेर में अपनी रोजी-रोटी तलाशते हैं.

शहरों के बाहर लगे कूड़े के पहाड़ पर वे ऐसी चीज़ें ढूंढते रहते हैं, जिनको बेचकर कुछ पैसे कमा सकें.

लकड़ी, प्लास्टिक और धातु की पुरानी चदरों से झोपड़ियां बनाकर वे वहीं रहते हैं.

मेडिकल और इलेक्ट्रॉनिक कचरे, घरेलू कूड़ा-करकट, टूटे हुए कांच, यहां तक कि ज़हरीले कचरे के पास भी लाखों परिवार बसते हैं.

कूड़े के पहाड़ों पर हमेशा भूस्खलन का ख़तरा रहता है. ये अस्थिर पहाड़ बिना किसी चेतावनी के कभी भी धंसने लगते हैं.

मनीला का पायतास डंप फिलीपींस की सबसे बड़ी "कचरा बस्तियों" में से एक है, जहां लगभग 10 हज़ार लोग रहते हैं.

2000 में कचरे का यह पहाड़ ढह गया जिससे 30 मीटर ऊंचा और 100 मीटर चौड़ा भूस्खलन हुआ था. उस हादसे में 200 से ज़्यादा लोगों की जान चली गई थी.

2015 में इथोपिया की राजधानी के बाहर बना कचरे का विशाल ढेर ढह गया था. आसपास की झोपड़ियां कचरे के नीचे दब गईं और 100 से ज़्यादा लोगों की मौत हो गई थी.

ख़तरनाक और ज़हरीला

ऐसी आपदाओं में फंसे लोगों के बचने की संभावना बेहद कम रहती है. ज़हरीला कचरा और ढेर के नीचे बनने वाली मिथेन गैस उनको ज़िंदा नहीं छोड़ती.

कूड़े-करकट के ढेर लगातार बढ़ रहे हैं. वर्ल्ड बैंक की "व्हाट अ वेस्ट" रिपोर्ट के मुताबिक 2050 तक दुनिया भर के लोग हर साल 340 करोड़ टन कचरा पैदा करेंगे. फिलहाल साल में 201 करोड़ टन कचरा निकलता है.

ऑस्ट्रेलियाई शोधकर्ताओं ने हाल ही में एक सॉफ्टवेयर तैयार किया है जो दो सप्ताह पहले ही संभावित भूस्खलन का पूर्वानुमान लगा सकता है.

इससे कचरा बस्तियों में रहने वालों की जान बचाई जा सकती है और इंजीनियरों को हालात संभालने का मौका मिल सकता है.

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कृत्रिम मेधा पर आधारित यह व्यवस्था अनुप्रयुक्त गणित की मदद से आने वाले ख़तरे के संकेतों को पहचानती है.

कूड़े का पहाड़ फटकर गिरने से पहले उसमें दरारें बनती हैं और छोटी-छोटी हलचलें होती हैं.

उम्मीद है कि मशीनी बुद्धि वाली यह व्यवस्था आने वाले दिनों में कचरे के ढेर की निगरानी करने और आने वाली आपदाओं को रोकने में मददगार होगी.

मेलबर्न में शोध

मेलबर्न यूनिवर्सिटी में विज्ञान की प्रोफेसर और इस अध्ययन की प्रमुख लेखिका एंटोनेट टॉर्डेसिलस कहती हैं, "हम दानेदार सामग्रियों में होने वाली हलचल के डेटा का अध्ययन कर रहे हैं.

उनके प्रयोगशाला प्रयोगों में विभिन्न तरह की दानेदार सामग्रियों (जैसे- रेत, कंक्रीट, सेरामिक, चट्टान वगैरह) को शामिल किया गया. उनके ढेर बनाए गए और यह देखा गया कि कब वह ढेर बिखरने लगा.

टॉर्डेसिलस कहती हैं, "हमने ढेर के ध्वस्त होने से पहले होने वाली हलचलों की लय का पता लगाया है."

उनकी तकनीक सही पैटर्न की पहचान करने वाली कृत्रिम मेधा को तैयार करने में भौतिकी के नियमों का उपयोग करती है.

एल्गोरिद्म से सही डेटा हासिल करने के लिए जमीन की गति, ढेर के बिखरने की गति और भूस्खलन के ट्रिगर्स, जैसे बारिश का ध्यान रखा जाता है.

इस डेटा का इस्तेमाल कूड़े के ढेरों, भूमिगत खदानों और पहाड़ की खड़ी ढलानों पर होने वाले भूस्खलन का पूर्व और वास्तविक अनुमान लगाने में किया जा सकता है.

मिट्टी जैसी पकड़ नहीं

प्राकृतिक ढलान धरती के चट्टानों और मिट्टी से बनते हैं जो हज़ारों साल से एक-दूसरे से बंधे हुए हैं.

इसके उलट, कचरे का पहाड़ ठोस कूड़े जैसे प्लास्टिक, कांच, धातु के टुकड़े, कार्बनिक पदार्थ, कागज और इसी तरह की दूसरी चीज़ों से बनता है.

ये सब एक दूसरे पर पड़े रहते हैं जब तक कि कोई बाहरी ताक़त इन्हें छेड़ न दे.

कचरे के ढेर कई कारणों से अस्थिर हो सकते हैं, जैसे- कूड़े करकट को सही तरीके से न रखना, पानी निकलने का सही इंतजाम न होना, कार्बनिक कचरे का सड़ जाना, नीचे की जमीन में फिसलन होना, नमी बढ़ना, मिथेन गैस के कारण धमाके होना और डिजाइन क्षमता से अधिक कचरे को डंप करना.

नाइजीरिया की कॉन्वेनांट यूनिवर्सिटी में जियोटेक्निकल इंजीनियरिंग के लेक्चरार इसाक अकिनवुमी कहते हैं, "इनमें से कुछ कारक प्राकृतिक ढलानों पर होने वाले भूस्खलन के मुक़ाबले कूड़े के पहाड़ गिरने की भविष्यवाणी को मुश्किल बनाते हैं."

इस तरह के हादसों का पूर्वानुमान लगाने वाली तकनीक विकासशील देशों के लिए ज़्यादा महत्वपूर्ण है.

अमरीका और ब्रिटेन जैसे देशों के कानून जितनी ढलान की इजाजत देते हैं विकासशील देशों में उससे कहीं ज़्यादा तीव्र ढलान होती है.

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कचरे के ढेर अमरीका-ब्रिटेन की तरह दबाकर नहीं रखे जाते और कचरा प्रबंधन करने वाली कंपनियों के लिए वहां की स्थिरता प्राथमिकता नहीं है. ये सब मिलकर भूस्खलन की प्रवृत्ति को प्रभावित कर सकते हैं

अकिनवुमी कहते हैं, "यदि प्रोफेसर टॉर्डेसिलस का उपकरण पूर्व चेतावनी दे सकता है तो यह भूस्खलन आपदाओं को रोकने में बहुत महत्वपूर्ण उपकरण होगा."

वास्तव में, ऐसी तकनीक डेटा को कार्रवाई-योग्य गोपनीय सूचना में बदलने में सक्षम हो सकती है.

इससे मिली सूचना आपातकालीन उपाय करने या लोगों को वहां से हटाने के बारे में फैसला करने में मदद कर सकती है.

चुनौती बाकी है

प्रस्तावित मशीनी मेधा को उपयोग लायक बनाने के लिए शोधकर्ताओं को कचरा प्रबंधन संगठनों के साथ मिलकर वित्तीय, राजनीतिक और नियामक बाधाओं को दूर करना होगा.

उदाहरण के लिए, इंडस्ट्री के विशेषज्ञों को इस बात के सबूत की जरूरत होगी कि यह तकनीक कारगर है.

जोखिम का आंकलन करने और तकनीक को लगाने में पैसे की जरूरत होगी. स्थानीय ऑपरेटर इस ख़र्च को वहन करने के लिए शायद तैयार न हों.

स्थानीय निवासियों का विस्थापन भी मुश्किल हो सकता है.

यह तकनीक कचरे के ढेर से जुड़ी पर्यावरण की दीर्घकालिक समस्याओं को भी ख़त्म नहीं कर सकती.

भूस्खलन के कारण ही कचरा प्रबंधन करने वाले प्रमुख संगठन मांग कर रहे हैं कि इन कूड़े के पहाड़ों को बंद कर दिया जाए और उनकी जगह आधुनिक सुविधाओं वाले या नियंत्रित लैंडफिल्स बनाए जाएं.

उत्तरी अमरीका के सॉलिड वेस्ट एसोसिएशन (SWANA) के सीईओ डेविड बिडरमैन कहते हैं, "यह तकनीक कचरे के पहाड़ पर होने वाले भूस्खलन की बढ़ती समस्या का समाधान दे सकती है या नहीं, इसे देखने के लिए इसका परीक्षण उचित है."

बिडरमैन कचरे के पहाड़ पर बसी बस्तियों की समस्या से परिचित हैं. वह कहते हैं, "डंप साइट्स को बंद करने से पहले यह एक अच्छा अंतरिम समाधान हो सकता है."

अंतरिम समाधान

ठोस कचरा एक बढ़ती हुई समस्या है. यह न सिर्फ़ पास में रहने वाले लोगों को प्रभावित करता है, बल्कि हजारों किलोमीटर दूर बैठे लोग भी इससे प्रभावित होते हैं.

देशों और शहरों की आबादी जैसे-जैसे बढ़ रही है और वे सुखी-संपन्न हो रहे हैं, नागरिकों को ज़्यादा उत्पाद और सेवाएं मिल रही हैं, व्यापार बढ़ रहा है उसी अनुपात में कूड़ा-कचरा भी बढ़ रहा है

नई तकनीक कोई रामबाण नहीं है. यह अभी भी प्रारंभिक चरण में ही है. फिर भी इसमें संभावना है कि वह कचरा आपदा राहत प्रयासों को बदल दे.

भूस्खलन का पूर्वानुमान हो जाए तो उसकी रोकथाम के उपाय किए जा सकते हैं और आपदा की स्थिति में अंतराष्ट्रीय मदद हासिल करने में भी सहूलियत हो सकती है.

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