उड़ान को लंबा करने में एयरलाइंस कंपनियों का कैसा फ़ायदा?

  • 14 अप्रैल 2019
उड़ान को लंबा करने में एयरलाइंस कंपनियों का कैसा फ़ायदा? इमेज कॉपीरइट Getty Images

1960 के दशक में न्यूयॉर्क से लॉस एंजिल्स की उड़ान पूरी करने 5 घंटे लगते थे. न्यूयॉर्क से वाशिंगटन डीसी पहुंचने में सिर्फ़ 45 मिनट लगते थे.

आज न्यूयॉर्क से लॉस एंजिल्स पहुंचने में 6 घंटे से ज़्यादा लगते हैं. न्यूयॉर्क से वाशिंगटन डीसी की उड़ान 75 मिनट की हो गई है, जबकि हवाई अड्डों की दूरी वही है.

इसे "पैडिंग" कहते हैं. एयरलाइंस कंपनियां नहीं चाहतीं कि आप इस रहस्य को जानें, ख़ास कर पर्यावरण पर पड़ रहे इसके असर के बारे में.

पैडिंग वह अतिरिक्त समय है जो ये कंपनियां एक शहर से दूसरे शहर पहुंचने के लिए ख़ुद को देती हैं.

दशकों से यह अनुभव किया जा रहा था कि उड़ान में देर हो रही है. एयरलाइंस कंपनियों ने परिचालन सुधारने की जगह उड़ान का शेड्यूल ही बदल दिया.

मुमकिन है कि यात्रियों को इसमें कुछ भी गलत न दिखे. देर से टेक-ऑफ़ करने पर भी विमान यदि समय से पहले मंजिल तक पहुंच जाए तो भला किसे अच्छा नहीं लगेगा.

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लंबा सफ़र

इस ग्लोबल ट्रेंड में कई समस्याओं के बीज छिपे हैं. एक तो मुसाफिरों का सफ़र लंबा हो रहा है, दूसरे एयरलाइंस कंपनियों के वक़्त का पाबंद होने का भ्रम पैदा होता है.

इस भ्रम की वजह से उन पर दक्षता बढ़ाने का दबाव नहीं रहता. इसका मतलब है कि हवाई मार्गों पर भीड़ और कार्बन उत्सर्जन लगातार बढ़ते रहना.

अमरीकी परिवहन विभाग की एयर ट्रैवल कंज्यूमर रिपोर्ट का हवाला देते हुए एयरलाइंस सलाहकार कंपनी एटीएच समूह के अध्यक्ष कैप्टन माइकल बायडा कहते हैं, "पैडिंग के बावजूद औसत रूप से 30 फीसदी से ज़्यादा उड़ानें 15 मिनट से अधिक की देरी से पहुंचती हैं."

यह आंकड़ा 40 फीसदी का हुआ करता था. लेकिन पैडिंग के कारण समय पर पहुंचने वाले विमानों की तादाद बढ़ गई.

बायडा कहते हैं, "पैडिंग के जरिये एयरलाइंस कंपनियां आपको बेवकूफ बना रही हैं."

पैडिंग की तरकीब अपनाने की जगह अगर कंपनियों ने परिचालन को सुधारा होता तो मुसाफिरों को सीधा फायदा होता.

पैडिंग के कारण ईंधन की लागत बढ़ती है, शोर ज़्यादा होता है और कार्बन डाय-ऑक्साइड का उत्सर्जन भी ज़्यादा होता है. इसकी जगह अगर दक्षता बढ़े तो लागत घटेगी और पर्यावरण का भी भला होगा.

बेशक, एयरलाइंस कंपनियों को मालूम है कि हवाई मुसाफिर वक़्त की पाबंदी को अहमियत देते हैं.

अमरीकी परिवहन विभाग के मुताबिक डेल्टा एयरलाइंस हमेशा यह कोशिश करती है कि उसकी उड़ानें समय से मंजिल तक पहुंचें.

डेल्टा ने विमानों के नये बेड़े, केबिन और हवाई अड्डे की सुविधाओं पर 2 अरब डॉलर का निवेश किया है. यह कंपनी इस बात पर भी जोर देती है कि वक़्त की पाबंदी अपनाकर उसने किराया बढ़ाया है.

तो यदि वक़्त का ख्याल रखने से मुसाफिरों और एयरलाइंस कंपनी, दोनों का फायदा है तो कंपनियां उड़ान का समय बढ़ाने की बजाय दक्षता बढ़ाने पर काम क्यों नहीं करतीं?

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कितनी देर को देर माना जाए?

किसी भी उड़ान का अंतिम लक्ष्य होता है A0 (ए-ज़ीरो) यानी ठीक समय से मंजिल तक पहुंचना.

यदि कोई उड़ान समय से पहले या देरी से है तो वह कई अन्य चीजों को बाधित कर सकती है, जैसे दरवाजे की उपलब्धता, हवाई अड्डे की क्षमता वगैरह.

उड़ान समय पर है या नहीं, इसे बताने के लिए एक भाषा भी है. उड़ान में जितने मिनट की देरी होती है, उतनी संख्या A0 से जुड़ जाती है.

मिसाल के लिए A15 का मतलब है कि उड़ान 15 मिनट की देरी से है. अमरीका का परिवहन विभाग A0 से लेकर A14 तक को देर नहीं मानता.

आधुनिक डेटा और संचार के आगमन से पहले अमरीकी परिवहन विभाग के इसी मानक से ग्लोबल स्टैंडर्ड बना.

मतलब यह है कि भीड़भाड़ वाले स्लॉट में आने पर भी एयरलाइंस कंपनियों के पास "समय पर" पहुंच जाने का एक मौका रहता है.

एयर ट्रैफिक कंट्रोल हवाई अड्डे पर विमानों की भीड़ कम करने के लिए उनके आगमन को समायोजित करता है. व्यस्त समय में वह विमानों के उतरने की रफ़्तार घटा देता है.

अमरीकी एयरलाइंस कंपनियों के संगठन एयरलाइंस फ़ॉर अमरीका के मुताबिक दुनिया भर की बड़ी कंपनियों ने विमानों के उड़ान पथ को कुशल बनाने के लिए तकनीक पर अरबों डॉलर का निवेश किया है.

लेकिन इससे उड़ान में होने वाली देरी को कम नहीं किया जा सका. अब भी 30 फीसदी विमान देरी से ही पहुंचते हैं.

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कई वजहों से देरी

किसी उड़ान में देर होने की कई वजहें हो सकती हैं, जैसे- शेड्यूल, एयरपोर्ट पर उतरने के लिए लगी विमानों की कतार, विमान उपलब्धता, गेट उपलब्धता, रखरखाव और चालक दल की वैधता.

बायडा का मानना है कि इसके लिए जिम्मेदार 80 फीसदी कारकों पर एयरलाइंस कंपनी का नियंत्रण होता है. लेकिन विमान हवा में हो तो वे सब कुछ एयर ट्रैफिक कंट्रोल पर छोड़ देते हैं.

वह कहते हैं, "एक बार जब विमान उड़ान भर लेते हैं तो उनके अगले एयरपोर्ट पर पहुंचने तक एयरलाइंस कंपनियां उनके बारे में भूल जाती हैं."

बायडा एक बेहतर तरीका सुझाते हैं. उनका कहना है कि कंपनियां विमानों को ट्रैक कर सकती हैं और उड़ान के दौरान भी परिचालन को समायोजित कर सकती हैं. विमानों की रफ़्तार और एयरपोर्ट पर उनकी कतार का प्रबंधन भी किया जा सकता है.

इससे एयर ट्रैफिक कंट्रोल को सिर्फ़ विमानों के सुरक्षित परिचालन पर ध्यान केंद्रित करना होगा.

रिटायर एयरलाइन एक्जीक्यूटिव टॉम हेंड्रिक्स बीबीसी कैपिटल से कहते हैं, "समस्या का एक हिस्सा उड़ान शेड्यूल में है जिसे एयरलाइंस कंपनियां एकदम आदर्श स्थिति के लिए तैयार करती हैं."

"लेकिन किसी भी दिन मौसम, एयर ट्रैफिक कंट्रोल और कंपनी नेटवर्क का व्यवधान हो सकता है."

हेंड्रिक्स का मानना है कि ज़्यादातर दिनों में एयरलाइंस कंपनियां अपने विमानों को कुशलता के साथ मंजिल तक पहुंचाने में लगी रहती हैं क्योंकि यह उनकी आर्थिक क़ामयाबी का अभिन्न हिस्सा है.

एक अन्य विकल्प विमानों की संख्या घटाने का हो सकता है. लेकिन उड़ान शेड्यूल उपभोक्ताओं की मांग पूरी करने के लिए बनाए जाते हैं. इसलिए अगर उड़ानों की तादाद कम होगी तो किराये बढ़ेंगे.

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मंजिल तक पहुंचना जरूरी

समाधान क्या है? एक मान्यता यह है कि एयर ट्रैफिक कंट्रोल को आधुनिक बनाने से समस्या का समाधान होगा.

2016 की ब्लूमबर्ग रिपोर्ट के मुताबिक अरबों डॉलर के निवेश के बाद 2007 से एयर ट्रैफिक कंट्रोल की वजह से होने वाली देरी आधी हो गई है, लेकिन एयरलाइंस कंपनियों की वजह से होने वाली देरी बढ़ गई है.

बायडा बिजनेस बेस्ड फ्लो मैनेजमेंट (BBFM) का सुझाव देते हैं, जिसमें एयरलाइंस कंपनियां एयर ट्रैफिक कंट्रोल के साथ मिलकर विमानों की कुशलता बढ़ाते हैं.

2012 में परीक्षण के बाद इस मॉडल को 5 हवाई अड्डों पर अपनाया गया. इससे उड़ानों की देरी में कमी हुई, ईंधन की खपत घटी, शोर और कार्बन डायऑक्साइड का उत्सर्जन कम हुआ और हवाई अड्डों के ऊपर मंडराने वाले विमानों की भीड़ भी घटी.

डेल्टा ने सिर्फ़ ईंधन में 7.4 करोड़ डॉलर बचाए. कार्बन उत्सर्जन में 63.5 करोड़ पाउंड की बचत हुई.

सवाल है कि लागत घटाने, मुनाफा बढ़ाने और पर्यावरण पर बुरे प्रभाव को सीमित करने का दबाव झेल रही एयरलाइंस कंपनियां एयर ट्रैफिक कंट्रोल के साथ काम क्यों नहीं कर रही हैं?

हेंड्रिक्स कहते हैं, "कंपनियों ने मिश्रित परिणामों से पहले नई तकनीक पर निवेश किया है. अपने निवेश को लेकर वे बहुत सतर्क हैं. वे ग्लोबल एयर ट्रैफिक कंट्रोल के आधुनिकीकरण के लिए जरूरी तकनीक पर भारी निवेश कर रहे हैं."

हेंड्रिक्स उन दिनों डेल्टा के साथ काम कर रहे थे, जब यह कंपनी बायडा की टेक्नोलॉजी का परीक्षण कर रही थी. तब वह इसकी सफलता को लेकर सशंकित थे.

जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी के विश्लेषणों से भी उनकी शंका का पूरा समाधान नहीं हुआ.

उनका कहना है कि तकनीक को कभी भी पूरी तरह एकीकृत नहीं किया गया, न ही पूरे एयर ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम के तहत उसका परीक्षण किया गया.

हालांकि वह मानते हैं कि इसमें बड़ी संभावनाएं हैं, फिर भी उनको लगता है कि BBFM को उस परीक्षण की जरूरत है.

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हर्जाने से बचने की तरकीब

इन सबसे मुसाफिरों का क्या फायदा? एयरलाइंस कंपनियों के मौजूदा मॉडल में उड़ान का समय बढ़ता है, क्योंकि ज़्यादा से ज़्यादा विमान हवा में होते हैं.

यात्री अधिकार संगठन एयरहेल्प की प्रवक्ता पलोमा सैल्मेरन कहती हैं, "एयरलाइंस कंपनियों के लिए पैडिंग आम बात हो गई है."

इस तरकीब से न सिर्फ़ उन्हें वक़्त का पाबंद होने का दावा करने का मौका मिलता है, बल्कि वे अधिकतम तीन घंटे की देरी की सीमा से भी बच निकलते हैं.

यूरोपीय संघ के कानूनों के मुताबिक उड़ान में तीन घंटे से ज़्यादा की देरी होने पर हवाई यात्री हर्जाने का दावा कर सकते हैं.

"एयरलाइंस कंपनियां यात्रियों के दावे को मुश्किल बनाती हैं. उड़ान का समय बढ़ा देना ऐसी ही एक तरकीब है."

एयरलाइंस सलाहकार बॉब मन कहते हैं, "दक्षता बढ़ाने के लिए कंपनियां बहुत कुछ कर सकती हैं. बायडा का समाधान उनमें से एक है."

"देरी और भीड़भाड़ के लिए एयरलाइंस कंपनियां एयर ट्रैफिक कंट्रोल को जिम्मेदार ठहराती हैं, जबकि ऐसा नहीं है."

बॉब मन का कहना है कि उनको शिकायत करनी बंद कर देनी चाहिए और इस बारे में कुछ करना चाहिए. इससे उनके उपभोक्ताओं, कर्मचारियों, निवेशकों और उन समुदायों को लाभ होगा जिनकी सेवा वे करते हैं.

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैप्टिल पर उपलब्ध है.)

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