नेटवर्क बनाने से डरते हैं तो ये हैं तरीके

  • 24 अप्रैल 2019
नेटवर्क बनाने में घबराते हैं तो कीजिए ये उपाय इमेज कॉपीरइट Alamy

दोस्त और परिवार के लोग चाहे जितने अच्छे हों, यह ज़रूरी नहीं कि जिन्हें आप पहले से जानते हैं वे कोई अच्छी नौकरी या कोई बड़ा काम दिलाने में आपकी मदद करें.

इसलिए हमें अपने परिचित दायरे से बाहर के लोगों से संपर्क बनाना पड़ता है.

बहुत सारे व्यक्तियों के संपर्क में रहने वाले कुछ बहिर्मुखी लोगों को भी इस तरह पेशेवर संपर्क बनाना अच्छा नहीं लगता.

जिस तरह की नेटवर्किंग के बारे में हम बात कर रहे हैं वह अंतर्मुखी या एकाकी लोगों के लिए ख़ास तौर पर चुनौतियों से भरा हो सकता है.

ज़रुरी बैठकों, भोजन या कॉफी पर किसी से मुलाकात करने में उनको भारी परेशानी हो सकती है.

नेटवर्किंग का एक दूसरा रूप भी है जिसे आप अपने तरीके से और अपनी रफ़्तार से कर सकते हैं. मैं इसे "लूज़ टच" कहती हूं.

यह संपर्क बनाने और उसे बचाए रखने को लेकर आपकी सोच को पूरी तरह बदल सकता है.

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कमज़ोर रिश्ते से जुड़ना

आप जितने लोगों के बारे में सोचते हैं असल में उससे कहीं ज़्यादा लोगों को जानते हैं, क्योंकि कई लोगों से आपके "ढीले रिश्ते" होते हैं.

ये वैसे संपर्क होते हैं जिनके बारे में आप बस थोड़ा जानते हैं और शायद उनके बारे में कभी सोचते नहीं.

हो सकता है कि आप आते-जाते कहीं उनसे मिलते हों या कुछ दिनों के लिए साथ में काम किया है.

यह भी हो सकता है कि आपने किसी क्लास या कांफ्रेंस में एक साथ हिस्सा लिया हो.

वे आपके दोस्तों के दोस्त भी हो सकते हैं, पूर्व सहयोगी या स्कूल के साथी भी हो सकते हैं.

आम तौर पर आप उनके संपर्क में नहीं होते. लेकिन आपके नेटवर्क पर उनका बड़ा असर हो सकता है.

70 के दशक में हुए एक समाजशास्त्रीय अध्ययन के मुताबिक जिन लोगों के साथ आपके प्रत्यक्ष या मज़बूत संबंध नहीं होते उनके अलग सामाजिक दायरों में रहने और अलग तरह की सूचनाओं तक उनकी पहुंच होने की संभावना ज़्यादा रहती है.

इसलिए अगर हम नये विचारों, सुरागों या परिचय की तलाश कर रहे हों तो अपने सामान्य दायरे से बाहर निकलने पर क़ामयाबी की संभावना बढ़ जाती है.

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संपर्क ज़िंदा रखना

मैं एक उदाहरण देती हूं. वर्षों पहले मैं एक क्रिएटिव एजेंसी की छोटी टीम का हिस्सा थी. पिछले साल मैं उन दिनों की एक डिजाइनर से मिली.

हम एक-दूसरे के बहुत करीब नहीं थे, लेकिन पुरानी पहचान पर भरोसा करके उसने मुझे बताया कि वह नई नौकरी की तलाश में है.

उसे नेटवर्क बनाना पसंद नहीं था और वह यह भी नहीं समझ पा रही थी कि वह किससे मदद मांगे.

मैंने उसे याद दिलाया कि उसे नये सिरे से शुरुआत नहीं करनी है. मैंने उसे हमारे पुराने समूह के कुछ नाम बताए, जिससे उसका चेहरा खिल उठा.

ये वे लोग थे जिन्हें वह पसंद करती थी. उन सबको संपर्क में रहने का नोट भेजने में उसे कोई आपत्ति नहीं थी.

कुछ महीनों बाद मैं उससे दोबारा मिली तो वह कुछ पुराने (और अब मौजूदा) सहयोगियों के साथ नये प्रोजेक्ट पर काम कर रही थी.

ढीले संबंधों के जरिये उसने अपना रास्ता बना लिया था.

"लूज़ टच" में रहना

मुझे उम्मीद है कि अब उसने अपने पूर्व सहयोगियों के साथ लूज़ टच में रहने की आदत बना ली होगी.

अगली बार यदि उसे कोई ज़रूरत होगी तो वह उन लोगों से संपर्क करने में नहीं हिचकेगी, जो मदद करने के लिए तैयार हैं.

बिज़नेस प्रोफेसर डेविड बर्कस ने अपनी नई किताब "फ्रेंड ऑफ़ ए फ्रेंड" में इस बात पर ज़ोर दिया है कि जिन लोगों को आप पहले से जानते हैं वे आपकी मदद करने के लिए सबसे उपयुक्त हैं.

शर्मीले लोगों को शायद यह बात अच्छी लगे, लेकिन यह नेटवर्क बढ़ाने की उनकी कोशिशों को रोक सकता है.

बर्कस कहते हैं, "जब हमारे करियर को झटका लगता है तब हम करीबी मित्रों को ही इसके बारे में बताते हैं. वे हमारी मदद करने में सक्षम हो सकते हैं या नहीं भी हो सकते हैं."

"इसकी जगह हमें उन लोगों से संपर्क करना चाहिए जिनसे हमारे नजदीकी रिश्ते न हो. उनको अपने बारे में बताएं और देखें कि उनके पास क्या मौके हैं."

इससे भी बेहतर यह है कि हम ऐसे निष्क्रिय संबंधों को फिर से सक्रिय करने का नियमित अभ्यास शुरू करें.

दूसरे शब्दों में, आपको सामाजिक तितली होने की ज़रूरत नहीं है जो लंबी-लंबी बैठकें करे और संपर्क बढ़ाए. आपको बस अपने संबंधों को बचाए रखना है.

"लूज़ टच" में रहने का यही मतलब है. इसी तरीके से मैं वर्षों पहले मिले लोगों ढेरों लोगों से जुड़ी हुई हूं.

यदि हम ट्विटर, लिंक्डइन, इंस्टाग्राम पर पहले से जुड़े हों तो मैं उन्हें प्राइवेट मैसेज़ भी भेज सकती हूं.

उसमें कोई न्यूज़ स्टोरी भी हो सकती है जिसमें उनकी रुचि हो सकती है. मैं कोई वीडियो, कार्टून या छोटा अभिवादन भी भेज सकती हूं (जैसे- क्या चल रहा है? क्या नया-ताज़ा है?).

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जुड़े रहने का अहसास

यह एकतरफा नहीं होता. मुझे खुशी है कि मुझे इसके जवाब भी मिलते हैं. इससे जुड़े होने का अहसास होता है और आम तौर पर इसके फॉलो-अप की जरूरत नहीं होती.

लेकिन यदि आपको सलाह या मार्गदर्शन की जरूरत है तो ये वे लोग हैं जो प्रतिक्रिया देंगे क्योंकि आपने इनके साथ एक दोस्ताना बना रखा है.

साझा हितों या साझा रुचि के लिए जुड़ना ऐसे संबंधों को मज़बूत करता है. इसे एक उदाहरण से समझिए.

मेरी एक पूर्व सहकर्मी एरिका उपभोक्ता अनुभव के क्षेत्र में सलाहकार हैं. हम दोनों को कुत्तों से प्यार है.

हम स्लैक और ट्विटर पर जुड़े हैं और हर कुछ हफ्तों में एक-दूसरे को कुत्ते का कोई GIF भेजते हैं या ग्राहक सेवाओं को धोखा दे रही कंपनियों के बारे में कोई स्टोरी शेयर करते हैं.

हमारे संदेशों में कभी-कभार किसी सलाहकार कार्यशाला या इस क्षेत्र में नये अवसरों की ख़बर भी हो सकती है.

आप चाहे बहिर्मुखी हों या अंतर्मुखी, जब आप इन ढीले रिश्तों तक पहुंच बनाते हैं और उनसे जुड़े रहते हैं तो याद रखिए कि मदद और समर्थन की आपकी आभासी दुनिया एक जैविक प्रक्रिया से चलती है.

आप रातोंरात कोई नेटवर्क नहीं बना सकते. आप अपने संपर्कों को किसी बगीचे की तरह लंबे समय में तैयार करते हैं.

कुछ परिचितों को अभिवादन भेजने या कोई स्टोरी शेयर करने से बड़े काम बन सकते हैं. इसमें जोखिम भी नहीं है. सबसे शर्मीला व्यक्ति भी यह काम कर सकता है.

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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