तनाव कम करते हैं 'छड यार' जैसे मुहावरे

  • 26 अप्रैल 2019
'छड्ड यार' जैसे मुहावरे हर संस्कृति में हैं इमेज कॉपीरइट Alamy

जीवन में अक्सर बुरी चीजें होती रहती हैं- जैसे आप ट्रैफिक में फंसकर लेट हो रहे हों या अपना बटुआ घर भूल आए हों या आपकी नई कार में खरोंच लग गई हो.

इन हालात में लोगों की प्रतिक्रियाएं अलग-अलग हो सकती हैं. कई लोगों को गुस्सा आ जाता है, वे गालियां देने लगते हैं और इस हालात से निकलने में जान लगा देते हैं.

जापान में, मुमकिन है कि उनकी प्रतिक्रिया एक मुहावरे की शक्ल में बाहर आए- शॉ गा नाइ.

ये जापान का सर्वव्यापी मुहावरा है जिसके कई मतलब हो सकते हैं.

ये मुहावरा या इसका औपचारिक संस्करण "शिकटा गा नाइ" अक्सर उन हालात में इस्तेमाल किए जाते हैं जो आम तौर पर नकारात्मक होते हैं, लेकिन वहां से निकलने के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं होता.

इस मुहावरे का ढीला-ढाला अनुवाद है- "कुछ नहीं किया जा सकता या कोई रास्ता नहीं है."

रोशेल कोप्प जापानी और ग़ैर-जापानी कंपनियों को बेहतर संवाद करने में मदद करती हैं. उनका इस मुहावरे से कई बार सामना हुआ है.

वह कहती हैं, "जापानी कंपनी में मेरे एक सहयोगी का काम और उसकी जगह बार-बार बदल दी जाए तो उसकी प्रतिक्रिया होगी- शॉ गा नाइ."

"मैं चाहकर भी इसे नहीं बदल सकती, जैसे मैं धरती को घूमने से नहीं रोक सकती."

अमरीकी सांस्कृतिक नजरिये से कोप्प को लगता है कि इन परिस्थितियों में "लोग ऐसे समय में पीछे हट जाते हैं जबकि उनको लड़ना चाहिए."

यह जापानी मुहावरा सिर्फ़ जापानी संस्कृति की अवधारणा नहीं है. स्टैंडफोर्ड यूनिवर्सिटी में एंथ्रोपोलॉजी की एसोसिएटेड प्रोफेसर मियाको इनो का कहना है कि यह सार्वभौमिक मनोभाव को व्यक्त करता है.

"अमरीका में रोज़मर्रा की ज़िंदगी में मैं लोगों को यही मनोभाव ज़ाहिर करते हुए सुनती हूं- जो हो गया सो हो गया या चलो छोड़ो जाने दो."

क्या शॉ गा नाइ जैसे मुहावरे के अर्थ में कुछ भी उपयोगी है?

निराशा भरे हालात में खीझ मिटाने की जगह क्या यह अच्छा न हो कि उससे निकलने के लिए संघर्ष किया जाए?

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शांति पाने का तरीका

शॉ गा नाइ जैसे मुहावरे दुनिया भर की संस्कृतियों में हैं. मिसाल के लिए अंग्रेजी में लोग कहते हैं, "इट इज़ व्हाट इट इज़- जो है सो यही है."

फ्रेंच में यही भाव बताने के लिए कहा जाता है- "सेस्ट ला विए" यानी यही जीवन है.

हिंदी में "चलो जाने दो" और पंजाबी में "छड यार" से ऐसे ही मनोभावों को व्यक्त किया जाता है.

हर संस्कृति की ख़ास बारीकियां और संदर्भ होते हैं. लेकिन हर संस्कृति में एक चीज सामान्य होती है- पीछे हट जाने की भावना- यह जानना कि कब हालात बदलने के लिए संघर्ष करने की बजाय भाग्य को मंजूर करना है.

कुछ अध्ययनों से पता चला है कि कुछ बुरी चीजों को भी स्वीकार कर लेने से बेचैनी कम करने में मदद मिलती है.

मिसाल के लिए, टोरंटो यूनिवर्सिटी और बर्कले की कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के 2017 के अध्ययन में पाया गया कि जो लोग आदतन अपनी नकारात्मक भावनाओं को स्वीकार करते हैं, वे कम नकारात्मक भावनाएं अनुभव करते हैं. इससे मनोवैज्ञानिक सेहत बेहतर होती है.

बर्कले स्टडी में काम कर चुकी मनोविज्ञान की एसोसिएट प्रोफेसर आइरिस मौस का कहना है कि ख़राब हालात को स्वीकार कर लेना एक प्रकार की संज्ञानात्मक रीफ्रेमिंग है, जो फ़ायदेमंद हो सकती है.

वह कहती हैं, "यदि आप रोज़ाना की उन (तनावपूर्ण) घटनाओं को इस तरह से सोच पाते हैं जिससे उनका भावनात्मक असर कम हो तो आप अपना भला कर रहे हैं."

"जब आप 'छोड़ो यार' कहना सीख लेते हैं तो अधिक शांति महसूस करते हैं. आप अपने संसाधनों और कोशिशों को हालात बदलने में लगाते हैं जिसे आप सचमुच बदल सकते हैं."

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हताशा से लड़ाई

हताशा के भरे हालात में एक कदम पीछे हटिए और ख़ुद से पूछिए कि मैं किसलिए इतना तनाव ले रहा हूं.

क्या मैं इसे बदल सकता हूं? यदि नहीं बदल सकता- तो टेंशन लेने की ज़रूरत ही क्या है? और क्या यह हताशा से निपटने की कारगर रणनीति हो सकती है?

विशेषज्ञों का कहना है कि यह हालात पर निर्भर करता है. यदि यह एक बार की घटना है और इसका परिणाम महत्वपूर्ण नहीं है तो इसे नज़रअंदाज़ करना ही ठीक है.

मिशिगन यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान की प्रोफेसर स्टेफनी प्रेस्टन कहती हैं, "यदि यह व्यवस्थागत समस्या है- जैसे आपके बॉस आप पर रोज चिल्लाते हों और आपको डराकर रखते हों या आपका पार्टनर गाली-गलौज़ करने वाला हो तो इन स्थितियों में आपको समस्या के निदान की जरूरत है."

उनका कहना है कि इन मुहावरों के पीछे की भावनाएं एक समान हो सकती हैं. इस परिघटना को सामाजिक हार कहते हैं.

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चूहों पर परीक्षण

चूहों पर अक्सर इसका परीक्षण किया गया है. बड़े और आक्रामक चूहों के पिंजरे में एक छोटे चूहे को डाल देने पर छोटा चूहा बेचारगी में रहना सीख लेता है.

बड़े चूहे से हिंसक लड़ाई होने पर छोटे चूहे का व्यवहार अवसाद से भर जाता है और वह पिंजरे की सामाजिक व्यवस्था के आगे हार मान लेता है.

अच्छी बात यह है कि इंसान चूहे नहीं हैं. वह ख़राब परिस्थितियों से बाहर आने की कोशिश कर सकते हैं, जैसे- वे नौकरी बदल सकते हैं या पार्टनर से रिश्ते तोड़ सकते हैं.

फिर भी, यह संदर्भ का मामला है. कुछ हालात प्रतिरोध और बदलाव की मांग करते हैं.

प्रेस्टन का कहना है कि इसी तरह बड़ी सामाजिक क्रांतियां शुरू हो सकती हैं. लेकिन रोज़मर्रा की चीजों का क्या करें, जैसे किसी तरह मुश्किल से सरक रहे ट्रैफिक जाम का?

कभी-कभी कंधे झटककर "शॉ गा नाइ" कहना ही बेहतर होता है.

हालात से समझौता

बर्कले और सैन फ्रांसिस्को में प्राइवेट प्रैक्टिस करने वाली मनोविश्लेषक सची इनो कहती हैं, "लोग हालात से समझौता कर लेते हैं क्योंकि यह तनावपूर्ण हालात में भिड़े रहने से आसान होता है."

"पीछे हट जाने की भावना के पीछे आपकी अपने बारे में समझ होती है. आपको पता होता है कि आपकी सीमाएं क्या हैं. यह इंसानों की अद्वितीय क्षमता है जो आपको अच्छा महसूस कराने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है."

इनो का कहना है कि इसीलिए "शॉ गा नाइ" जैसे मुहावरे अच्छे और बुरे दोनों अर्थों में इस्तेमाल किए जा सकते हैं.

जापान में रहने वाले विदेशी कर्मचारियों के बीच लोकप्रिय साइट GaijinPot में जापानी भाषा की शिक्षक युमी नकाता इस मुहावरे के "सौंदर्य और बोझ" के बारे में बताती हैं.

वह बचपन में अपने पिता को नौकरी से वापस घर लौटकर यह मुहावरा बोलते हुए सुनती थी, लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ी हुईं, इसे लेकर उनका नज़रिया बदल गया.

वह लिखती हैं, "कई चीजें हम नियंत्रित नहीं कर सकते, लेकिन अपनी प्रतिक्रियाओं पर हमारा नियंत्रण होता है."

"मैं 'शिकटा गा नाई' रवैये को पूरी तरह ख़ारिज़ करती थी लेकिन अब मैं इसे पसंद करती हूं. ज़िंदगी के अन्याय और असुविधा के प्रति मेरी स्वाभाविक प्रतिक्रिया को नियंत्रित करने के लिए मैं यह बोलती हूं."

तो अगली बार जब इस ऐसी स्थितियों में फंस जाएं या धीमी रफ्तार से सरक रही लंबी कतार में खड़े हों तो इन बातों को ध्यान में रखें.

(मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी कैपिटल पर उपलब्ध है.)

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