सालाना अप्रेज़ल क्या बेकार की क़वायद है

  • 28 मई 2019
क्या सालाना अप्रेज़ल व्यर्थ की क़वायद है? इमेज कॉपीरइट Getty Images

बिज़नेस मॉडल चाहे जो भी हो, हर कंपनी अंत में अपने लोगों पर निर्भर करती है- कोई कम कोई ज़्यादा.

छोटे-बड़े हर व्यवसाय में कुछ लीडर होते हैं जो उत्पादकता बढ़ाते हैं और कंपनी के नतीजे बेहतर करते हैं.

उनसे अलग कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने घटिया प्रदर्शन से कंपनी को पीछे खींचते हैं.

कंपनी की कामयाबी और नाकामी कर्मचारियों की गुणवत्ता पर निर्भर करती है. जैसा कि जनरल इलेक्ट्रिक के पूर्व चेयरमैन जैक वेल्च ने एक बार कहा था, "सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों वाली टीम जीतती है."

सीईओ और मैनेजर कामयाब कंपनियां बनाना चाहते हैं, लेकिन उनके सामने एक मुश्किल चुनौती रहती है- बुरे कर्मचारियों में से अच्छे कर्मचारियों को कैसे छांटा जाए.

किसी खिलाड़ी का प्रदर्शन उसके आंकड़ों में झलकता है, लेकिन किसी सेल्स पर्सन ने कैसा काम किया, यह बता पाना कहीं ज़्यादा मुश्किल है.

कंपनियां हर साल लाखों डॉलर और सैकड़ों घंटे ख़र्च करके अपने कर्मचारियों के प्रदर्शन की समीक्षा करती हैं. इसके लिए चेकलिस्ट बनाए जाते हैं.

कारोबार जगत के विद्वानों ने भी इस मुद्दे पर गहनता से अध्ययन किया है. नतीजा क्या रहा है?

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प्रदर्शन में सुधार नहीं

वर्जीनिया की मैनेजमेंट सलाहकार कंपनी PDRI की सीईओ और मैनेजमेंट एक्सपर्ट एलैन पुलकोस का कहना है कि उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर कर्मचारियों का मूल्यांकन करने से न तो उनके प्रदर्शन में कोई सुधार होता है, न ही कंपनी को किसी तरह का प्रतिस्पर्धी लाभ मिलता है.

वह कहती हैं, "यह बेहद ही ख़र्चीली क़वायद है और उत्पादकता पर इसका कोई असर नहीं पड़ता."

कई प्रयासों के बावजूद आज तक वह रेटिंग सिस्टम नहीं बन पया जो यह बता सके कि अमुक कंपनी में बेहतरीन काम करने वाले लोग हैं और अमुक कंपनी में औसत दर्जे के कर्मचारी हैं.

पुलकोस 2012 की एक रिपोर्ट का हवाला देती हैं जिसमें 40 कंपनियों के 23 हजार कर्मचारियों की रेटिंग देखी गई थी और नतीजा निकला था कि रेटिंग का मुनाफ़े या नुक़सान पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता.

वह कहती हैं, "परफॉर्मेंस रेटिंग का कंपनी के प्रदर्शन से कोई लेना-देना नहीं है."

पुलकोस का कहना है कि कर्मचारियों को ग्रेड देने के जितने भी तरीक़े हैं, उनमें से सालाना या छमाही प्रदर्शन समीक्षा संभवतः सबसे नुक़सानदेह है और इससे कोई मदद नहीं मिलती.

"वे असल में विषाक्त हैं और लोग उनसे नफ़रत करते हैं."

ब्रेन इमेजिंग रिसर्च का हवाला देते हुए पुलकोस कहती हैं कि सबसे तेज़तर्रार कर्मचारी भी अप्रेज़ल के समय रक्षात्मक मोड में चले जाते हैं.

जॉर्ज वाशिंगटन यूनिवर्सिटी में मैनेजमेंट के प्रोफ़ेसर और जाने-माने विद्वान हर्मन एग्युनिस का कहना है कि सालाना प्रदर्शन समीक्षा कंपनी की संस्कृति के लिए बेहद नुक़सानदेह हो सकती है.

"यह आत्मा को कुचलने वाली क़वायद है. कर्मचारियों को पता नहीं होता कि उन्हें क्या करना है और मैनेजर इसे कोई भाव नहीं देते. वे सिर्फ़ इसलिए इसे करते हैं क्योंकि एचआर ने उनको ऐसा करने को कहा था."

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भेदभाव और पूर्वाग्रह

एग्युनिस का कहना है कि प्रदर्शन समीक्षा अक्सर अपनी राजनीति साधने का ज़रिया बन जाती है और इससे किसी कर्मचारी की असली ताक़त या क़मजोरियों की सही जांच नहीं होती.

"कुछ मैनेजर जानबूझकर पूर्वाग्रह से भरी रेटिंग देते हैं. मैंने ख़ुद एक सुपरवाइज़र को एक बुरे कर्मचारी को अच्छी रेटिंग देते हुए देखा है जिससे उसे तरक़्क़ी मिल जाए."

फिर भी कुछ एचआर विशेषज्ञ सालाना प्रदर्शन समीक्षा को कारगर मानते हैं.

सुज़ैन लुकास ने फ़रवरी में अपने लोकप्रिय एविल एचआर लेडी ब्लॉग में लिखा है, "यह एकदम बुरी चीज़ नहीं है. औपचारिक रेटिंग से पूरी कंपनी में प्रदर्शन और जुड़ाव का पता चलता है."

"यदि कोई समूह (विभाग, अनुभव स्तर वगैरह) अलग दिखता है तो इससे संकेत मिलता है कि वहां कुछ बहुत अच्छा है या फिर कोई समस्या है."

प्रदर्शन समीक्षा पर हो रहे शोध ने कई कंपनियों को अपने रुख़ के बारे में फिर से सोचने के लिए प्रेरित किया है.

डेल, माइक्रोसॉफ्ट, आईबीएम, गैप, एसेंट्योर और जनरल इलेक्ट्रिक जैसी बड़ी कंपनियों ने इससे पीछा छुड़ा लिया है.

लेकिन 2018 के 'वर्ल्ड एट वर्क' सर्वे में पता चला कि 80 फीसदी कंपनियां अभी भी इससे चिपकी हुई हैं. पुलकोस कहती हैं, "संगठनों के व्यवहार में बदलाव बहुत मुश्किल है."

अप्रेज़ल की प्रक्रिया से छुटकारा पा चुकी कंपनियां अब भी कर्मचारियों पर नज़र रखती हैं.

एग्युनिस कहती हैं, "जो कंपनियां रेटिंग से पीछा छुड़ा लेने के दावे करती हैं, वे अब भी रेटिंग का इस्तेमाल करती हैं. बस वह अलग स्तर पर होता है."

किसी को तरक़्क़ी देने या तनख़्वाह बढ़ाने के लिए मैनेजर के पास कोई आधार होना चाहिए. यदि प्रदर्शन का कोई आंकड़ा न हो तो यह प्रक्रिया अराजक हो सकती है.

कुछ मामलों में, यदि कंपनियां अपने फ़ैसलों को सही साबित नहीं कर पाती हैं तो उनको मुक़दमे का भी सामना करना पड़ सकता है.

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विकल्प क्या है

एग्युनिस का कहना है कि अपने कर्मचारियों को सही से समझने के लिए मैनेजरों को रोजाना के प्रबंधन को दोगुना करना चाहिए.

कर्मचारियों के काम को रोज़ाना देखा जाए और उनको नियमित फ़ीडबैक दिया जाए कि वे कहां अच्छा कर रहे हैं और कहां सुधार की ज़रूरत है.

"प्रदर्शन समीक्षा अगर साल में सिर्फ़ एक बार न होकर नियमित हो तो प्रदर्शन को मापना बहुत आसान हो जाता है."

व्यवस्था के भीतर कई अलग-अलग लोगों से इनपुट लेना अहम है- सहकर्मियों से भी और वरिष्ठों से भी.

वह कहते हैं, "डेटा के सबसे अच्छे स्रोत हमेशा मैनेजर नहीं होते."

लंदन के मैनेजमेंट और एचआर कंसल्टिंग फ़र्म एयॉन के टैलेंट एंड रिवार्ड पार्टनर सेमॉर एडलर का कहना है कि कर्मचारियों की रेटिंग करते समय आसान रास्ता चुनना सबसे अच्छा होता है.

वह अपने करियर के शुरुआती दिनों की एक ग़लती को याद करते हैं जब वह एक टीम का हिस्सा थे जिसने कर्मचारियों की रेटिंग के लिए 40 प्वाइंट का पैमाना बनाया था.

वह कहते हैं, "मेरे ख़याल में उसमें ज़्यादा ही इंजीनियरिंग हो गई थी."

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आंकड़े भ्रामक हो सकते हैं

बिक्री संख्या, अनुपस्थित दिन या ग्राहकों के कॉल जैसे वस्तुनिष्ठ आधार पर कर्मचारियों की रेटिंग करना सही हो सकता है, लेकिन एडलर का कहना है कि ये आंकड़े भ्रामक भी हो सकते हैं.

हो सकता है कि सबसे ज़्यादा बिक्री करने वाला सेल्स पर्सन दूसरों से बेहतर जगह पर हो या प्रतिभा से ज़्यादा अच्छा उसका भाग्य हो.

"आपको उन सभी कारकों के बारे में भी सोचना होगा जो किसी कर्मचारी के नियंत्रण से परे हैं."

दैनिक मूल्यांकन और फ़ीडबैक मुश्किल काम लग सकता है, लेकिन एडलर का कहना है कि ज़्यादातर कर्मचारी निरंतर जांच के बिना ही ठीक काम करते हैं.

"जब मैं कंपनियों के साथ काम करता हूं तो उनको रेटिंग से बचने की सलाह देता हूं. जो कर्मचारी असाधारण हैं उन पर सबसे ज़्यादा ध्यान देने की आवश्यकता होती है."

100 कर्मचारियों में से तीन या चार ही संघर्ष कर रहे होते हैं और उनको मदद या करियर में बदलाव की ज़रूरत होती है.

दूसरी तरफ संभव है कि पांच या छह बेहतरीन कर्मचारी हों जो कंपनी को आगे ले जा रहे हों. उन पर विशेष ध्यान देने की ज़रूरत होती है.

एग्युनिस और सह-लेखक अर्नेस्ट ओ'बॉयल ने 2012 के एक अध्ययन में पाया था कि शीर्ष के एक फीसदी कर्मचारी कंपनी की 10 फीसदी उत्पादकता देते हैं.

बीच के मेहनतकश और सक्षम कर्मचारी, जिनको एडलर "दि माइटी मिडिल" कहते हैं, कंपनी के मुनाफे में बराबर योगदान देते हैं, भले ही प्रदर्शन समीक्षा में वे कम समय दें या ज़्यादा.

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सभी कंपनियां गूगल नहीं

कुछ कंपनियां अपने सुपरस्टार कर्मचारियों का फ़ायदा देती हैं. गूगल के पूर्व एक्जीक्यूटिव लैज़्लो बॉक ने 2015 की अपनी किताब 'वर्क रूल्स' में ख़ुलासा किया था कि कंपनी बेहतरीन प्रदर्शन करने वाले कर्मचारियों को नियमित रूप से उनके सहकर्मियों के मुक़ाबले पांच से छह गुणा या इससे भी ज़्यादा भुगतान करती रही है.

वह एक मिसाल भी देते हैं जिसमें एक कर्मचारी को 10 लाख डॉलर का स्टॉक बोनस दिया गया जबकि दूसरे को सिर्फ़ 10 हज़ार डॉलर का.

बेशक गूगल कई मायनों में अलग है. पुलकोस का कहना है कि कंपनी डेटा पर निर्भर रहती है और इसके पास कर्मचारियों को रेटिंग या रैंकिंग देने के जो तरीक़े हैं वह किसी और के पास नहीं हैं.

हर कंपनी को अपने कर्मचारियों से सर्वश्रेष्ठ लेने के लिए ख़ुद के तरीक़े खोजने होंगे.

वह कहती हैं, "आपको अपने स्वयं के रणनीतिक लक्ष्यों का मूल्यांकन करना होगा. गूगल में जो तरीक़ा कारगर है वही सभी के काम नहीं आएगा."

कारोबार की दुनिया में सार्वभौम सत्य नहीं होते. लेकिन यह सच है कि सालाना प्रदर्शन समीक्षा सबसे ख़राब है.

(यह लेख मूल रूप से नोएबल मैग्जीन में छपा है, जिसे क्रिएटिव कॉमन लाइसेंस के तहत दोबारा बीबीसी कैप्टिल पर प्रकाशित किया गया है. मूल लेख अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.

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