पुरुषों से ज़्यादा महिलाएँ इसका इस्तेमाल क्यों करती हैं?

  • 26 जून 2019
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नमस्ते! उम्मीद करती हूं कि आप सकुशल होंगे! आपसे बातें करके अच्छा लगा!

मैं अपनी खुशमिजाजी के लिए जानी जाती हूं. बुरे से बुरे दिनों में भी करीबी दोस्तों और सहयोगियों के दायरे से बाहर के लोगों से बात करते समय मेरे चेहरे पर मुस्कान रहती है.

ईमेल में, मेरा यह व्यवहार विस्मयादिबोधक चिह्नों में झलकता है. मैं हर दूसरे वाक्य के अंत में विस्मयादिबोधक चिह्न लगाती हूँ.

मुझे यह मानने में जरा भी संकोच नहीं है, क्योंकि इस बात की पूरी संभावना है कि आप भी अपने ईमेल में इनका प्रयोग करते होंगे.

आपने पीछे जो मैसेज भेजे हैं, जरा उन पर एक नज़र डालिए. यदि आप मेरी तरह हैं तो उनमें विस्मयाधिबोधक चिह्नों को ज़रूर देखेंगे.

"आख़िरी परिणाम देखने को उत्सुक!"

"मैं आपसे बात करने के लिए उत्साहित हूं!"

"मुझे मदद करने में खुशी हो रही है!"

आप दिन में चाहे कुछ ही ईमेल भेजते हों या कई दर्जन ईमेल करते हों, आप ईमेल पाने वाले के लिए संबोधन लिखते समय, विराम चिह्न लगाते समय और अपने विचारों को स्पष्ट करते समय ये सूक्ष्म-निर्णय लेते रहते हैं.

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यहां दशकों का भाषा-ज्ञान काम नहीं आता, पसंद किए जाने की बेचैनी हावी रहती है.

ख़ास तौर पर महिलाओं के लिए, जो पुरुषों की तुलना में विस्मयादिबोधक चिह्नों का ज़्यादा इस्तेमाल करती हैं.

महिलाओं का गुण

2006 के एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पेशेवर चर्चा समूहों में इस्तेमाल किए गए 200 विस्मयादिबोधक चिह्नों का विश्लेषण किया था.

यह पाया गया कि महिलाओं ने 73 फीसदी विस्मयादिबोधक चिह्नों का इस्तेमाल किया.

इस अध्ययन का निष्कर्ष निकला कि महिलाएं इन चिह्नों का इस्तेमाल अक्सर पुरुषों से अधिक करती हैं. पेशेवर बातचीत में इनके ज़रिए वे मित्रता जाहिर करती हैं.

मेरे लिए संकट यह है कि मैं भी इसका हद से ज़्यादा इस्तेमाल करती हूं, क्योंकि मैं संदेश पाने वाले की भावनाओं का सम्मान करने का दबाव महसूस करती हूं.

मैं आम तौर पर जोश में रहती हूं, भले ही हालात इसके अनुकूल हों या न हों.

दयालु होना

काम के दौरान महिलाएं दयालुता पर ज़ोर देती हैं. इसके कारण भी हैं.

मैकिंसे की 2018 की वूमेन इन दि वर्कप्लेस रिपोर्ट के मुताबिक़ हमें वरिष्ठ पदों पर नौकरी मिलने या प्रोमोशन दिए जाने की संभावना कम होती है.

महिलाओं पर हमेशा दबाव रहता है कि वह पुरुष सहयोगियों की तुलना में ज़्यादा सक्षम होने के सबूत देती रहें.

और, महिलाओं को इसमें कोई हैरानी नहीं होगी कि हमारी विशेषज्ञता के क्षेत्र में हमारे फ़ैसलों पर सवाल उठने की संभावना अधिक होती है.

क्या इसी वजह से मैं जोश में दिखना चाहती हूं?

मुझे डर है कि मुझे वह नहीं मिलेगा जो मैं चाहती हूं या जिसकी मुझे ज़रूरत है, इसलिए मैंने अपने लहजे को नर्म किया.

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मैं दोस्ती का एक अतिरिक्त मुलम्मा चढ़ाती हूं ताकि मुझे उदासीन न समझ लिया जाए.

मेरे वाक्यों में लगे हर विस्मयादिबोधक चिह्न में यह गुजारिश होती है कि कृपया मुझे पसंद करें और कृपया मेरी बात को मंजूर करें.

बदलाव की शुरुआत

यह मेरे ईमेल तक सीमित नहीं. जहां पुरुष और महिलाएं दोनों हों, वहां मेरी आवाज़ हमेशा सबसे तेज़ नहीं होती और मैं किसी की बात में हस्तक्षेप करने में भी संकोच करती थी.

मैं अपनी भावनाएं और विशेषज्ञता जाहिर करने और उनके लिए खड़ी रहने में डरती थी ताकि दूसरे लोगों को जो श्रेय चाहिए, वे ले सकें.

इसका मतलब यह था कि मेरा योगदान उदारता के नाम पर कुर्बान हो जाता था, किसी को उसका पता भी नहीं चल पाता था.

महिलाओं को उदार और मददगार बनाया गया है. उनको इस तरह तैयार किया गया है कि वे अपने लिए कुछ नहीं मांगतीं.

समय की बर्बादी

जब मैंने विराम चिह्नों को कम करना शुरू किया तो मैंने देखा कि मेरे रोजमर्रा के जीवन में भी वही बेतुका उत्साह झलकता था.

मैंने पाया कि अपने लहजे को समायोजित करने के लिए मैं जितना समय ख़र्च करती हूं उसमें मेरी ऊर्जा ख़त्म होती है.

दूसरे लोगों की भावनाओं का प्रबंधन करना थका देने वाला काम है. इसका दूसरा पहलू यह है कि इसकी ज़रूरत भी नहीं है.

हक़ीक़त यह है कि मैं हमेशा अनजान लोगों से बातचीत करने के प्रति उत्साहित नहीं रहती.

मैं हमेशा खुशी-खुशी मदद करने को भी तैयार नहीं रहती, क्योंकि मेरे पास करने के लिए अपने काम हैं.

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जिस ऊर्जा को मैं रचनात्मक परियोजनाओं और पेशेवर लक्ष्यों को हासिल करने में लगा सकती हूं, वह ऊर्जा इस तरह दूसरों के लिए समायोजन में ख़र्च हो जाती है.

मैंने महसूस किया कि यह सारा व्याकरणिक उत्साह खुलेपन की नीति की ओर संकेत करना शुरू कर देता है.

निश्चित रूप से लोग सोचेंगे कि मैं अच्छी हूं, लेकिन इस प्रक्रिया में मैं क्या त्याग कर रही हूं?

मैं सिर्फ़ विराम चिह्न नहीं हूं. यह बैठकों में मेरे बोलेने का तरीका है. यह असहमत होते हुए भी किसी चीज के लिए सहमत हो जाने का तरीका है.

यह अपने समय के लिए ख़ुद मेरे द्वारा सीमारेखा तय करने (या तय नहीं करने) का तरीका है.

यदि मैं दूसरों को समायोजित करन के लिए अपनी ज़रूरतों और अपने काम को पीछे करती हूं तो मैं ख़ुद को और अपनी टीम को नाकाम कर रही हूं.

बनावटीपन बंद

अब जबकि मैंने अपने विराम चिह्नों पर नियंत्रण रखना सीख लिया है, मैंने पाया कि मैं समायोजन करने की जगह इसका बेहतर तार्किक इस्तेमाल कर सकती हूं.

एक अच्छी मुस्कान की तरह, एक सोचा-विचारा विस्मयादिबोधक चिह्न मुझे उन लोगों से जोड़ता है जिनसे मैं संवाद करती हूं, वे चाहे मेरे करीबी दोस्त हों या ईमेल पर जुड़ने वाले अजनबी.

अब मैं अपने शब्दों को आगे बढ़ाती हूं. मैं कभी-कभी ही विस्मयादिबोधक चिह्नों का उपयोग करती हूं जब यह मुझे ईमानदार और प्रमाणिक लगता है, न कि असुरक्षा की किसी भावना से.

अगर मुझे सही छाप छोड़नी है तो विस्मयादिबोधक चिह्न के अलावा भावनात्मक रिश्ते बनाने के और भी कई तरीके हैं.

मैं किसी के नये काम की तरीफ करती हूं या उनको पसंद आने वाला कोई शानदार लेख भेजती हूं.

अब मैं गैरज़रूरी विस्मयादिबोधक चिह्नों की जगह पूरी निर्दयता से पूर्ण विराम लगा देती हूं.

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बदलाव अच्छा है

पूर्ण विराम मेरी रफ़्तार धीमी कर देते हैं लेकिन वे मेरे शब्दों को दृढ़ता देते हैं, जो कहते हैं कि हां मुझे पता है कि मैं क्या कह रही हूं और मुझे क्या चाहिए.

मैं अपने इनबॉक्स को अधिक सोच-विचार के साथ मैनेज करती हूं. मैं यह सोचकर अपना समय बचाती हूं कि क्या मुझे किसी ईमेल का जवाब भेजना चाहिए. यदि हां तो क्यों.

जब मुझे लगता है कि ईमेल से कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा तो मैं ईमेल नहीं लिखती.

मेरा मौखिक संचार भी पहले से गंभीर हो गया है. जब मेरा भरोसा नहीं बनता तो मैं सवालिया लहजे में बात करती हूं.

मैं अपनी ज़रूरतों को निर्देशों की बजाय सवालों में पिरो देती हूं और यहां भी पूर्ण विराम का इस्तेमाल करती हूं.

हमारी राय पर विचार किया जाए, इसके लिए भोलेपन से पूछने की ज़रूरत नहीं होती. हमारे विचार और हमारे योगदान सच्चे हैं तो वे अपनी जगह बना लेंगे.

मैं विराम चिह्नों का मुखौटा हटा रही हूं जो मेरी ऊर्जा सोखते हैं. अपने समय और ऊर्जा को बचाने के लिए मैं सख़्ती बरत रही हूं.

दयालुता की तरह विस्मयादिबोधक चिह्न एक कीमती संसाधन है. मैं इसका सही इस्तेमाल करूंगी. पूर्ण विराम.

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