मुल्क जहां कोई नहीं बनना चाहता कसाई

  • 24 जुलाई 2019
फ़ाइल फ़ोटो इमेज कॉपीरइट Getty Images

जर्मनी के व्यंजनों में सॉसेज की ख़ास जगह है, लेकिन ब्रैटवुर्स्ट (बारीक कटे हुए मांस से बना सॉसेज) बनाने की पारंपरिक कला जल्द ही अतीत की बात हो सकती है.

पूरे जर्मनी में कसाई अपनी दुकानें बंद कर रहे हैं. यहां पिछले दो दशकों में मांस की दुकानें करीब-करीब आधी रह गई हैं.

जर्मन बुचर्स एसोसिएशन (DFV) के मुताबिक 1998 में मांस की 21,160 दुकानें थीं जो 2018 में 12,000 से भी कम रह गईं.

बर्लिन में रहने वाले 37 लाख लोगों के लिए सिर्फ़ 108 कसाई की दुकानें हैं. केंद्रीय प्रांत थुरिंगिया से तुलना करें तो अंतर साफ-साफ दिखता है.

वहां 21.5 लाख आबादी के लिए करीब 400 कसाई दुकानें हैं.

दक्षिणी प्रांत बावरिया के 1 करोड़ 30 लाख लोगों के लिए मांस की करीब 3,300 दुकानें हैं.

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बिक्री बढ़ी, रुचि घटी

कसाई दुकानें बंद होने का संबंध मुनाफे़ से नहीं है. DFV के मुताबिक, जर्मनी के लोग अब भी परंपरागत रूप से बनाए गए मांस उत्पादों को बड़े चाव से खरीदते हैं.

पिछले दो दशकों में मांस दुकानों की औसत सालाना बिक्री 60 फीसदी से ज़्यादा बढ़ी और 2018 में यह 14 लाख यूरो (15.7 लाख डॉलर या 12.6 लाख पाउंड) के पार पहुंच गई.

तो फिर अगर मांग बरकरार है तो जर्मनी की कसाई दुकानें बंद क्यों हो रही हैं? बर्लिन के पुराने कसाई जॉर्ग लिटगॉ के पास इसका सीधा जवाब है- युवा पीढ़ी में इस पेशे की अपील नहीं रह गई है. वह कहते हैं, "यह मेहनत का काम है. अब इसे कोई नहीं करना चाहता."

लिटगॉ 1995 से अपना व्यवसाय चला रहे हैं. वह पांचवी पीढ़ी के कसाई हैं. उनकी सुबह साढ़े चार बजे शुरू होती है. दुकान के पीछे उनका प्रोडक्शन एरिया है, जहां वह दिन के 14 घंटे बिताते हैं.

यहां सॉसेज बनाने के पारिवारिक मसालों से मांस के उत्पाद तैयार किए जाते हैं. वह कहते हैं, "हम ख़ुद के मसाला मिश्रण बनाते हैं. कुछ दूसरी दुकानों में पहले से तैयार मसालों का इस्तेमाल होता है, लेकिन हमारे यहां वह चीज नहीं मिलेगी."

एक शांत सी गली में उनकी दुकान के आगे उनकी मेहनत टंगी रहती है- गोमांस के करीने से कटे टुकड़े, छोटे सुअर के मांस से तैयार सॉसेज जो मिर्च पाउडर मिलाने से चटख लाल रंग के हो जाते हैं और भूरे लिवरवर्स्ट के लंबे सिलेंडर.

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खानदानी पेशा

लिटगॉ कहते हैं, "मेरे माता-पिता ने यह काम किया. मेरे दादा-दारी ने भी यही काम किया. मेरे नाना-नानी ने 1934 में इस जगह अपनी दुकान खोली थी."

लेकिन अब उनके परिवार का कोई भी सदस्य या रिश्तेदार इस काम में नहीं लगना चाहता, इसलिए लिटगॉ को चिंता है कि उनके काम छोड़ने के बाद परिवार की परंपरा जारी नहीं रह पाएगी.

"मैंने पिछले कुछ सालों में कई प्रशिक्षुओं को रखा, लेकिन अब मैं वह काम नहीं करता."

"वे यह काम करने के लिए तैयार नहीं हैं. वे ऐसा काम नहीं करना चाहते जिसमें बहुत ज़्यादा समय और शारीरिक मेहनत लगती है."

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सीखने वाले नहीं आते

यह बदलाव जर्मनी की राजधानी तक सीमित नहीं है. हालिया अनुमानों के मुताबिक जर्मनी के दो-तिहाई कसाई 50 साल से ऊपर के हैं और उनकी जगह लेने के लिए कोई नहीं है.

तीन साल के कसाई प्रशिक्षण कार्यक्रमों में दाखिला लेने वालों की तादाद बहुत घट गई है. इन प्रशिक्षण कार्यक्रमों में तकनीकी शिक्षा के साथ-साथ व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया जाता है.

DFV के मुताबिक 1999 में 10 हजार से भी ज़्यादा प्रशिक्षु कसाई थे, लेकिन 2017 में उनकी तादाद घटकर तीन हजार रह गई.

मांस की दुकानों में सेल्समैन बनने के लिए भी तीन साल की ट्रेनिंग ज़रूरी है. यह ट्रेनिंग लेने वालों की तादाद और घट गई है.

1999 में करीब 14 हजार सेल्स ट्रेनी थे. 2017 में यह तादाद घटकर 3,700 से भी नीचे पहुंच गई.

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बर्लिन बुचर्स गिल्ड के निदेशक क्लाउस गेरलाक कहते हैं, "हम न केवल प्रशिक्षित कसाइयों की कमी से जूझ रहे हैं, बल्कि दुकानों के लिए भी स्टाफ नहीं मिल रहे."

मांस की दुकानें बंद होने और प्रशिक्षु कसाइयों की कमी ने सबसे ज़्यादा राजधानी बर्लिन को परेशान किया है.

जुलाई 2018 में बर्लिन बुचर्स गिल्ड ने घोषणा की कि वह शहर के एकमात्र टेक्निकल बुचरी कॉलेज में प्रशिक्षुओं को पढ़ाने का कार्यक्रम बंद कर देगा.

गेरलाक कहते हैं, "24 साल पहले जब यह टेक्निकल कॉलेज खोला गया था तब बर्लिन और ब्रैंडेनबर्ग में 1,250 प्रशिक्षु थे. पिछले साल उनकी तादाद सिर्फ़ 145 थी."

कसाई और बिक्री, दोनों प्रशिक्षण कार्यक्रमों के दौरान प्रशिक्षु बर्लिन में दुकानों पर काम कर सकते हैं.

लेकिन क्लासरूम में होने वाली पढ़ाई, जिसमें वे नई मशीनों और दूसरे तरीकों के बारे में सीखते हैं- उनको 200 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में लीपज़िग के टेक्निकल कॉलेज जाना पड़ता है.

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नया नजरिया

नये युवा प्रशिक्षुओं को आकर्षित करने के लिए क्या किया जा सकता है? गेरलाक का कहना है कि बेहतर वेतन और सुविधाओं से कुछ काम बन सकता है.

बर्लिन में ट्रेनी महीने में अधिकतम 700 यूरो (785 डॉलर या 635 पाउंड) वेतन पा सकते हैं, जिसे स्थानीय मजदूर संगठनों ने तय किया है.

देश के दूसरे हिस्सों में उनके साथी 1,000 यूरो (1,120 डॉलर या 905 पाउड) से अधिक कमा सकते हैं.

गेरलाक कहते हैं, "हमें याद रखना होगा कि वे सिर्फ़ सहायक कर्मचारी नहीं हैं, वे हमारे कारोबार के भविष्य हैं."

कसाई की पारंपरिक दुकानों को बचाए रखने के लिए सिर्फ़ नकदी काफी नहीं है.

फूड एक्टिविस्ट और बर्लिन की कसाई दुकान कंपेल एंड क्यूले के सह-संस्थापक हेंड्रिक हासे के मुताबिक इस क्षेत्र के प्रति लोगों का नजरिया बदलने की ज़रूरत है.

"इन दिनों लोग ज़्यादा जानकार हैं. भोजन के बारे में उनके कई सवाल हैं. क्या मांस खाना ठीक है? इसका जलवायु पर क्या असर पड़ता है? जानवर कहां से आते हैं?"

इन विषयों पर सार्थक चर्चा में शामिल होने से मांसाहार छोड़ रहे समाज में इस परंपरा को जीवित रखने में मदद मिल सकती है.

चर्चा के लिए जगह बनाना

35 साल के हासे पेशे से संचार सलाहकार और डिजाइनर हैं. 31 साल के जोर्ग फोर्स्टेरा के साथ मिलकर उन्होंने 2015 में कंपेल एंड क्यूले खोली थी.

पारदर्शिता शुरुआत से ही उनके बिजनेस मॉडल के केंद्र में रही है. वह न सिर्फ़ उत्पाद की उत्पत्ति के बारे में पूरी जानकारी देते हैं, बल्कि उसे तैयार करते हुए भी दिखाते हैं.

फोर्स्टेरा और टीम के अन्य सदस्य एक विशाल कांच की खिड़की के पीछे मांस काटते हैं और सॉसेज तैयार करते हैं, जहां ग्राहक उनको देख सकते हैं.

हासे कहते हैं, "लोग घोटालों और सुपरमार्केट में बिकने वाले मांस से तंग आ चुके हैं. वे अपने पैसे अच्छे खाने पर ख़र्च करना चाहते हैं और खेत से उनके टेबल तक के सफ़र के बारे में जानना चाहते हैं."

हासे का कहना है कि कसाइयों को अपने कारोबार में इस तरह का खुलापन लाने के रास्ते तलाशने होंगे.

युवाओं को लाना ज़रूरी

सोशल मीडिया, प्रोडक्शन वर्कशॉप और अन्य तरह से लोगों से संपर्क करने से न सिर्फ़ ग्राहकों को जोड़ा जा सकता है, बल्कि इससे इस क्षेत्र में संभावित नये प्रशिक्षुओं को भी आकर्षित किया जा सकता है.

लेकिन अगर जर्मनी के कसाई नई चीजों को नहीं अपनाएंगे तो सदियों पुरानी परंपरा दांव पर लग सकती है.

हासे कहते हैं, "सॉसेज या लेबरकेसे बनाने का नुस्खा आम तौर पर किताबों में नहीं लिखा जाता. वे लोगों के दिमाग में होते हैं."

"यदि वे हार मान लेंगे तो हम अपने खानपान की विरासत खो देंगे. जैसे-जैसे वे अपनी दुकानें बंद कर रहे हैं हम अपनी परंपराओं को खो रहे हैं."

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